2007 में आईसीसी टी-20 वर्ल्ड कप ट्रॉफी जीतने के बाद अपनी नेतृत्व क्षमता को लेकर सुर्खियों में आए महेंद्र सिंह धोनी को उसी साल राहुल द्रविड़ की जगह वनडे टीम का भी कप्तान नियुक्त कर दिया गया। भारतीय क्रिकेट के कर्णधारों का उन पर विश्वास बढ़ता गया और एक साल बाद 2008 में उन्हें टेस्ट टीम की कप्तानी भी सौंप दी गई। इत्तेफाक यह है कि जिस बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी में टीम के खराब प्रदर्शन के बाद उन्हें टेस्ट कैरियर को अलविदा कहना पड़ा उसी बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी से उन्होंने जीत के साथ अपने कप्तानी कैरियर की शुरुआत की थी।
शुरुआती तीन साल हारे ही नहीं धोनी
जिस धोनी को आज विदेशी जमीन पर टेस्ट क्रिकेट में असफलता के कारण टेस्ट से संन्यास लेना पड़ा उसी धोनी का बतौर टेस्ट कप्तान आगाज शानदार रहा। धोनी ऐसे विजय रथ पर सवार हुए कि लगातार तीन साल तक हारे ही नहीं। इस क्रम में न केवल घर में बल्कि बाहर भी उस समय के कई दिग्गज टीमों को धूल चटाई और टीम को टेस्ट में बेस्ट, यानी नंबर वन बनाया।
सबसे पहले बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी में अनिल कुंबले के साथ दो टेस्ट में कप्तानी संभाली और दोनों में टीम को जीत दिलाई। अगली सीरीज में इंग्लैंड को अपनी मेजबानी में 1-0 से मात दी और फिर न्यूजीलैंड को न्यूजीलैंड में 1-0 से पीट आए। इसके बाद लगातार दो सीरीज में श्रीलंका को 2-0 से और बांग्लादेश को बांग्लादेश में 2-0 से हराया।
फिर लगातार दो सीरीज ड्रॉ खेली जिसमें दक्षिण अफ्रीका को 1-1 से और श्रीलंका को 1-1 की बराबरी पर रोका। फिर बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी में ऑस्ट्रेलिया को 2-0 से हराकर ट्रॉफी बरकरार रखी। अगला शिकार न्यूजीलैंड बना और फिर दक्षिण अफ्रीका को दक्षिण अफ्रीका में 1-1 की बराबरी पर रोका। जीत का सिलसिला यहीं नहीं रुका और वेस्टइंडीज को उसके घर में घुसकर 1-0 से मात दी।