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अध्ययन में सुझाव: विलो की जगह बांस से बनने चाहिए क्रिकेट के बैट, जानिए फायदे

Mon, 10 May 2021 07:53 PM IST
गौरव पाण्डेय स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, कैम्ब्रिज

सार

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की ओर से किए गए एक अध्ययन में सामने आया है कि बांस के बने क्रिकेट बैट अधिक मजबूत होते हैं और इस बैट से खेलते समय बल्लेबाज को बेहतर 'स्वीट स्पॉट' मिलता है। परीक्षण में यह भी सामने आया है कि बांस के बने बैट से पारंपरिक विलो से बने बैट के मुकाबले बॉल को ज्यादा ताकत से खेला जा सकता है।
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Representative Image - फोटो : iStock
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विस्तार
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अध्ययन में कहा गया है कि बांस, क्रिकेट को दुनिया के गरीब इलाकों में तेजी से लोकप्रिय और अधिक पर्यावरण हितैषी बना सकता है। यह अध्ययन 'जर्नल ऑफ स्पोर्ट्स इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी' में प्रकाशित हुआ है। विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर नेचुरल मैटेरियल इनोवेशन के शोधार्थियों ने कहा कि विलो पर लेदर की आवाज ने भले ही क्रिकेट प्रेमियों का दशकों से मनोरंजन किया हो, लेकिन अब इस लोकप्रिय खेल में बैट के ब्लेड्स को अब बांस से बनाने पर विचार किया जाना चाहिए। 

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डॉ. दर्शील शाह और बेन टिंकलर-डेवियस ने खास तौर पर बांस से बनाए गए क्रिकेट बैट के प्रोटोटाइप के प्रदर्शन की तुलना पारंपरिक विलो बैट से की। इस काम में माइक्रोस्कोपिक एनालिसिस, वीडियो कैप्टचर तकनीक, कम्यूटर मॉडलिंग और कम्प्रेशन टेस्टिंग आदि तरीकों का इस्तेमाल किया गया। इस अध्ययन में यह भी पता चला है कि अच्छी गुणवत्ता की विलो की कमी हो रही है। उल्लेखनीय है कि बेहतर गुणवत्ता की विलो को तैयार होने में आम तौर पर करीब 15 साल लगते हैं।

तेज शॉट लगाने में मिलेगी मदद

अध्ययन में सामने आया कि बांस विलो के मुकाबले काफी मजबूत होता है। बांस से बने बैट विलो के मुकाबले अधिक पतले और अधिक मजबूत साबित हो सकते हैं। इससे बल्लेबाज को भी मदद मिलेगी क्योंकि हल्के ब्लेड के साथ वह शॉट लगाने के लिए अधिक तेजी से बल्ला घुमा सकेगा और अधिक ताकतवर शॉट लगा सकेगा।  अध्ययन में यह भी सामने आया कि विलो के मुकाबले बांस का बैट 22 फीसदी तक कड़ा होता है और यह बल्ले पर गेंद लगने के बाद गेंद की रफ्तार बढ़ा सकता है।

अध्ययन के सह लेखक डॉ. दर्शील शाह ने कहा, 'शुरुआती तौर पर देखें तो बांस के बैट का स्वीट स्पॉट एक यॉर्कर गेंद को चौके में बदलना आसान कर सकता है। हालांकि, यह सभी तरह के स्ट्रोक के लिए उत्साहजनक है। हमें केवल अपनी तकनीक को सुधारने की जरूरत होगी, जिससे हम इस बैट का अधिक से अधिक फायदा उठा पाएं। इसके अलावा बैट के डिजाइन में भी कुछ बदलाव करने जरूरी हैं।' बता दें कि डॉ. शाह थाईलैंज की अंडर-19 राष्ट्रीय क्रिकेट टीम का हिस्सा रह चुके हैं।
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कच्चे माल की बर्बादी भी होगी कम

क्रिकेट बैट बनाने के लिए सबसे अधिक उपयुक्त बांस की दो प्रजातियां हैं- मोसो (Moso) और गुआडुआ (Guadua)। ये चीन, दक्षिण एशिया और दक्षिण अमेरिका में बहुतायत से उगते हैं। ये बांस विलो की तुलना में दोगुनी तेजी से तैयार होते हैं और बैट बनाने के दौरान बांस की बर्बादी विलो के मुकाबले काफी कम होती है। उल्लेखनीय है कि विलो से बैट बनाने में करीब 30 फीसदी विलो बर्बाद होती है। शोधार्थियों का मानना है कि ये सभी बातें बांस के बैट को, विलो का बेहतर प्रतिद्वंद्वी बनाती हैं।

अध्ययन में सामने आया है कि बांस का सेल स्ट्रक्चर (कोशिकीय संरचना) प्राकृतिक रूप से विलो के मुकाबले अधित घनत्व वाली होती है, जो कहीं ज्यादा बेहतर होती है। बता दें कि 19वीं शताब्दी में क्रिकेट बैट निर्माता विभिन्न तरह की लकड़ियों पर प्रयोग करते थे। लेकिन 1890 के बाद वह बैट के ब्लेड के लिए एक हल्की रंगीन विलो, सैलिक्स अल्बा का ही उपयोग करने लगे।  यह अधिक कड़ी, कम घनत्व वाली होती है। वहीं, क्रिकेट में बेंत का इस्तेमाल बैट के हैंडल और पैड तक सीमित हो गया।

डॉ. शाह ने कहा, परंपरा महत्वपूर्ण है लेकिन यह सोचिए कि क्रिकेट बैट, पैड, ग्ल्व्स और हेलमेट में पहले के मुकाबले कितना बदलाव आ चुका है। समय के दौरान बैट की चौड़ाई और मोटाई में काफी परिवर्तन हुआ है। इसलिए अगल हम बांस से बने बैट का इस्तेमाल करते हैं और प्रदर्शन बेहतर कर सकते हैं तो इसमें गलत क्या है। वहीं, डेवियस ने कहा कि हमारा बांस का बना पहला प्रोटोटाइप बैट, सामान्य बैट के मुकाबले करीब 40 फीसदी भारी है, हमें इसका वजन कम करने पर काम करना होगा।
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