भारत को भारत में हराने का ख्वाब लिए आए कप्तान क्लार्क ने शायद इस तरह की परिस्थितियों की उम्मीद तो नहीं की होगी।
टीम इंडिया ने चेन्नई टेस्ट जीतने के बाद हैदराबाद टेस्ट में भी ऑस्ट्रेलिया के जीतने की संभावनाओं को लगभग खत्म कर दिया है। ऑस्ट्रेलियन टीम की इस हालत के लिए कप्तान क्लार्क की रणनीति का बहुत बड़ा रोल है।
तेज गेंदबाजों पर जरूरत से ज्यादा भरोसा
चेन्नई टेस्ट में स्पिनरों का दबदबा देखने के बावजूद क्लार्क ने दूसरे टेस्ट में भी केवल एक ही स्पिनर उतारा। ऑस्ट्रेलिया जैसी टीम के कप्तान से इस तरह के फैसले के उम्मीद नहीं थी।
भारतीय उपमहाद्वीप की पिचें स्पिनरों को सपोर्ट करती हैं शायद ही दुनिया का कोई खिलाड़ी इस बात को न जानता हो! ऐसे में क्लार्क का केवल एक स्पिनर के साथ मैदान में उतरना उनकी काबिलियत पर संदेह पैदा करता है।
बल्लेबाजी बनी मुसीबत
ऑस्ट्रेलिया की पहली पारी में 237 रनों के जवाब में भारतीय टीम ने 503 रनों का विशाल स्कोर खड़ा कर क्लार्क को मुसीबत में डाल दिया है।
तेज गेंदबाजों के भरोसे भारत को हराने आए कंगारू कप्तान क्लार्क की टीम बल्लेबाजी में भी फिसड्डी साबित हो रही है।
भारतीय स्पिन पिचों पर जिस तरह कंगारू बल्लेबाज लड़खड़ा रहे हैं उसके बाद तो यही लगता है कि ऑस्ट्रेलियन टीम स्पिन गेंदबाजी को बहुत ही हल्के में लेकर खेल रही है।
हैदराबाद टेस्ट की पहली पारी में क्लार्क को छोड़ सभी खिलाड़ियों ने जिस तरह टीम इंडिया के गेंदबाजों के आगे सरेंडर किया उसके बाद तो यही लगता है कि यह टीम भारत को भारत में हराने का ख्वाब लिए ही वापस चली जाएगी।
क्लार्क पहली बार भारत दौरे पर 2004-05 में आए थे। इसी दौरे पर अपने डेब्यू टेस्ट मैच में क्लार्क ने 151 रनों की शानदार पारी खेली थी।
क्लार्क भारत में भारत के खिलाफ 12 टेस्ट में 938 रन बना चुके हैं। इस सीरीज में क्लार्क के बल्ले से रन निकल रहे हैं लेकिन उनकी किस्मत ने साथ देना छोड़ दिया है।
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