वर्ष 1983 में भारत की सफलता ने क्रिकेट को दो तरीक़ों से लोकतांत्रिक बनाया। पहला, विश्वकप के आयोजन में रोटेशन की नीति बनाकर और दूसरा, अन्य टीमों में जीत के लिए खेलने की भावना भरकर।
1983 के बाद हुए तीन टूर्नामेंटों में तीन अलग-अलग विजेता बने। सह आयोजक होने के नाते, इनमें से कम से कम दो में तो भारत के जीतने की उम्मीद की जा रही थी, लेकिन ऑस्ट्रेलिया, पाकिस्तान और श्रीलंका को जीत मिली।
वर्ष 2011 में दूसरी जीत मिलने के बाद और ऑस्ट्रेलिया में त्रिकोणीय सिरीज़ से पहले भारत ने 95 एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैच खेले। इनमें भारत ने 57 मैचों में जीत हासिल की और किसी अन्य टीम के मुक़ाबले 5.57 का बेहतर रन रेट हासिल किया। (फोटोः सभी बीबीसी से)
वर्ल्ड कप में भारत-पाकिस्तान का मैच सबसे यादगार
विश्वकप में टीमों को दो पूलों में बांटा गया है। हर टीम अपने पूल की दूसरी टीमों से खेलेगी और हर पूल से शीर्ष चार टीमें क्वार्टरफ़ाइनल में पहुंचेगी। इसका मतलब यह हुआ कि भारत एकाध मैच ख़राब खेलकर भी अंतिम आठ में पहुंच सकता है। वर्ष 2007 में भारतीय टीम बांग्लादेश से हारने के बाद दबाव में आ गई थी और नॉकआउट दौर में नहीं पहुंच पाई।
जब भारतीय उपमहाद्वीप में पहली बार विश्वकप हुआ तो भारत और पाकिस्तान को इस उम्मीद में अलग-अलग ग्रुपों में रखा गया था कि वे फ़ाइनल में पहुंचेंगे।
बाद में भारत और पाकिस्तान विश्वकप में जब भी भिड़े तो लोगों ने इन मैचों में सबसे ज़्यादा दिलचस्पी दिखाई और सर्वाधिक टेलीविज़न दर्शक जुटे। इसे देखते हुए प्रशासकों को भारत और पाकिस्तान को एक ही ग्रुप में रखना व्यावहारिक लगा ताकि दोनों के बीच कम से कम एक मैच तो हो सके।
इस बार नॉकआउट राउंड के लिए कोई दिक्कत नहीं
इस बार भारत के पूल में दक्षिण अफ़्रीका, पाकिस्तान, वेस्टइंडीज़, जिम्बाब्वे, आयरलैंड और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की टीमें हैं। भारत की जगह क्वार्टर फ़ाइनल में पक्की लग रही है। इसके बाद क्वार्टरफ़ाइनल और सेमीफ़ाइनल, यानी दो अच्छे मैच और भारत फ़ाइनल में पहुंच जाएगा।
काग़जों पर तो यह सबकुछ आसान और उत्साहजनक है। यह तर्क शीर्ष आधा दर्जन टीमों के लिए तो अच्छा है। लेकिन क्रिकेट मैच काग़ज़ पर नहीं मैदान में खेला जाता है और यहीं भारत की कमज़ोरी सतह पर आती है।
उछाल वाली आस्ट्रेलियाई पिचों और सीम को मददगार न्यूज़ीलैंड की पिचों पर भारत का आत्मविश्वास डगमगा सकता है। लेकिन यही वो टीम है जिसने विदेशी पिचों पर टेस्ट में अपनी नाकामी को वर्षों पहले पीछे छोड़ते हुए छोटे प्रारूपों के लिए आत्मविश्वास अर्जित किया है।
धोनी की टीम में अतीत का बोझ कम
चार साल पहले विश्व कप जीतने वाली टीम इंडिया में इस बार केवल चार सदस्य मौजूद हैं जो इस बात का संकेत है कि महेंद्र सिंह धोनी के नेतृत्व वाली यह टीम युवा है और इस पर अतीत का कम बोझ है।
केवल धोनी और स्टुअर्ट बिन्नी ही क्रमशः 33 और 30 वर्ष के हैं। विराट कोहली के रूप में टीम के पास शानदार बल्लेबाज़ है जो मौजूदा समय में दुनिया के तीन बेहतरीन बल्लेबाज़ों में से एक है।
एकदिवसीय मैच में 264 रन की विश्व रिकॉर्ड पारी खेलने वाले रोहित शर्मा वनडे में अलग ही रंगत में नज़र आते हैं। यह बात अलग है कि टेस्ट प्रारूप में उनका आत्मविश्वास डगमगा जाता है।
इस प्रारूप में सुरेश रैना विश्व स्तरीय खिलाड़ी हैं। शिखर धवन, शर्मा, कोहली, रैना, धोनी और अजिंक्य रहाणे (या अंबाती रायडू) का यह बल्लेबाजी क्रम दुनिया का सबसे बेहतरीन है।
खराब गेंदबाजी है चिंता का सबब
गेंदबाज़ी भारत के लिए चिंता का सबब है। ऑफ़ स्पिनर रविचंद्रन अश्विन उन चार खिलाड़ियों में शामिल है जो पिछले विश्वकप में खेले थे। चूंकि टीम इंडिया के तेज़ गेंदबाज़ प्रभावित नहीं कर पा रहे हैं, इसलिए अश्विन ही भारतीय गेंदबाज़ी की अगुवाई करेंगे।
हालांकि, जब अधिकतम 10 ओवर गेंदबाज़ी करनी हो, विकेट हासिल करना अहम न हो और ज्यादा गेंदबाजी से आराम की गारंटी हो तो इशांत शर्मा, मोहम्मद शमी और भुवनेश्वर कुमार अलग किस्म के गेंदबाज़ हैं।
टेस्ट जहां गेंदबाज़ों की बदौलत जीते जाते हैं वहीं एकदिवसीय मैच बल्लेबाज़ों की बदौलत जीते जाते हैं और इसमें भारत की स्थिति मजबूत है।
टीम में थकावट का संकेत साफ
रवींद्र जडेजा चोट से उबर रहे हैं और इंग्लैंड एवं ऑस्ट्रेलिया के अतिव्यस्त दौरे के कारण कुछ अन्य खिलाड़ी भी थके हुए दिख रहे हैं। ऐसे में भारत के लिए फ़िटनेस चिंता का एक मुख्य विषय हो सकती है।
लेकिन गेंदबाज़ी की कमज़ोरी की भरपाई के लिए बल्लेबाज़ों को हर मैच में उम्दा प्रदर्शन करना होगा। यह एक बड़ी बात जरुर है लेकिन असंभव नहीं।
अपने घर में खेल रही चार बार की चैंपियन ऑस्ट्रेलियाई टीम ख़िताब की सबसे प्रबल दावेदार है। वर्ष 1992 से विश्वकप में शामिल हुई दक्षिण अफ़्रीकी टीम की कोशिश 'चोकर्स' की छवि से पीछा छुड़ाने की होगी। यह टीम ऐसा करने में सक्षम है।
कोई भी टीम विश्वकप में उतनी बार सेमीफ़ाइनल में नहीं पहुंची है जितनी बार न्यूज़ीलैंड। कीवी टीम छह बार अंतिम चार में पहुंची है। इस साल उसका प्रदर्शन शानदार रहा है और वह निरंतर अच्छा प्रदर्शन करने वाली टीमों में से एक है।
भारत, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ़्रीका और न्यूज़ीलैंड में से कोई भी टीम जीत सकती है। पाकिस्तान और श्रीलंका भी शीर्ष छह टीमों में शामिल हैं।