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B'Day Spcl: इंडिया का वह बॉलर, जिसने पोलियो से सूख चुकी बाजू को बना लिया अपना हथियार

Fri, 17 May 2019 04:23 PM IST
अंशुल तलमले अंशुल तलमले, नई दिल्ली
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भागवत चंद्रशेखर - फोटो : सोशल मीडिया
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यदि इरादा मजबूत और दिल में कुछ कर गुजरने की ललक हो तो दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं। अपनी शारीरिक कमजोरी को किस खूबी से गुण में तब्दील किया जा सकता है यह कोई चंद्रशेखर से सीखे।

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कर्नाटक के मैसूर में 17 मई 1945 को जन्में भागवत सुब्रमण्यम चंद्रशेखर का दाहिना हाथ बचपन से ही पोलियो से ग्रस्त होने के कारण कमजोर और लचीला हो गया था। मगर उन्होंने इस कमजोरी को अपनी ऐसी ताकत बनाई जो विरोधियों के लिए अभिशाप बन बैठा। यदि लाजवाब और बेमिसाल होना कला का आवश्यक गुण है तो भागवत चंद्रशेखर यकीनन एक कलाकार थे।

सुभाष गुप्ते के बाद चंद्रशेखर, आजाद भारत के दूसरे ऐसे गेंदबाज थे जिनकी गेंदबाजी का लोहा सभी बल्लेबाज मानते थे। अपने दम पर अकेले मैच का रुख पलटने की ताकत रखने वाले इस खिलाड़ी को कभी पोलियोग्रस्त होने का इल्म नहीं रहा।
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गुप्ते और चंद्रशेखर थे तो दोनों स्पिन गेंदबाज, लेकिन गेंदबाजी में जमीन आसमान का फर्क। गुप्ते की गेंदों में स्पिन थी। फ्लाइट थी। विविधता थी। चंद्रशेखर एक 'फ्रीक' बॉलर थे। उनकी विशेषता स्पिनरन होकर गति यानी 'रफ्तार' और 'बाउंस' थी। चंद्रा की गेंदबाजी पश्चिमी बल्लेबाजों के लिए हमेशा रहस्य का जीता-जागता नमूना रही।

मुकेश के गमगीन गीत और चंद्रा का मैदान में जोश

भागवत चंद्रशेखर (बाएं), मुकेश (दाएं) - फोटो : सोशल मीडिया
60 के दशक में भारत की मशहूर स्पिन चौकड़ी (चंद्रा, बेदी, प्रसन्ना, वेंकटराघवन) में से एक रहे चंद्रा लंबी बाउंसिंग रन-अप के बाद तेज गुगली फेंकते थे। उन्हें लेग स्पिनर कहा गया, लेकिन गेंदबाजी की गति और तेजी से हाथ घुमाकर फ्लाइट न कराने की शैली लेगस्पिन तकनीक के विपरित थी।

चंद्रशेखर अधिकतर गेंदें ऑफ ब्रेक फेंका करते इसलिए उन्हें तेज गति का गुगली गेंदबाज कहा जाए तो ज्यादा फिट होगा। पोलियो की वजह से कलाई गेंद फेंकते वक्त ज्यादा मुड़ जाती थी, जो उन्हें सामान्य स्पिनरों से अलग करती थी।

58 टेस्ट में 15963 गेंद फेंककर 29.74 की औसत से 242 विकेट चटकाने वाले चंद्रशेखर को पोलियो ग्रस्त हाथ से गेंदबाजी करने और लाइन-लेंथ को नियंत्रित करने के लिए कितने अभ्यास की जरूरत पड़ी होगी इसका अंदाजा हम शायद ही लगा पाए। 

कर्नाटक की ओर से रणजी ट्रॉफी खेलने वाले इस खिलाड़ी को हिंदी नहीं आती थी, मनमौजी और शायराना तबीयत के चंद्रशेखर मुकेश के गमगीन गीतों के बेहद शौकीन थे और बेगम अख्तर की गजलें भी खूब सुना करते थे। इस शौक में विश्वनाथ उनका बराबरी से साथ देते। इन्हीं गम भरे गीतों को सुनकर उनमें दोगुना जोश भर आता और बढ़कर गेंदबाजी करते, ऐसा किस्सा आज भी क्रिकेट के पुराने जानकार बताते हैं।

अंग्रेजों के घर में घुसकर पहली जीत

भागवत चंद्रशेखर - फोटो : सोशल मीडिया
भारत अंग्रेजों का गुलाम रहा। क्रिकेट भी भारत में अंग्रेजों की गुलामी के चलते ही आया ऐसे में उन्हीं के खेल में फिरंगियों को हराने का सुखद अहसास हिंदुस्तान को सबसे पहले 1971 में मिला। जब भारत ने ओवल टेस्ट में जीत की नई इबारत लिखी।

यह इंग्लैंड की धरती पर पहली टेस्ट सीरीज जीत थी। चंद्रा ने 38 रन देकर 6 विकेट हासिल किए, जिससे इंग्लैंड की दूसरी पारी 101 रन पर सिमट गई। उस दिन चंद्रशेखर अपने पूरे शबाब पर थे। ऐसा लग रहा था मानो उस दिन अंग्रेज बल्लेबाज इस भारतीय की उंगलियों पर नाच रहे थे। चंद्रशेखर की गेंदबाजी का विश्लेषण था 18.1-3-38-6। 

इंग्लैंड के खिलाफ ही 1972-73 में जब बिशन सिंह बेदी 96, वेंकट राघवन 82 और चंद्रशेखर 75 टेस्ट विकेट पर थे तब सभी को यही लग रहा थी कि इन तीनों में में बेदी सबसे पहले टेस्ट विकेटों का शतक पूरा करेंगे। राघवन के फैंस उनका नाम भी ले रहे होंगे, लेकिन पोलियो पीड़ित यह गेंदबाज किसी की जुबां पर निश्चित तौर पर नहीं चढ़ा होगा। 

यकीनन श्रृंखला में 25 विकेट लेने से आसान तो 4 विकेट लेना ही था। मगर हुआ क्या? इन तीन स्पिनर्स में से चंद्रा ने ही अपने 100 टेस्ट विकेट पूरे किए। चंद्रशेखर कुछ भी कर सकते थे। अति संपन्न लोगों के करिश्में होते ही ऐसे हैं जिन्हें तर्क की कसौटी पर परखा ही नहीं जा सकता।

चंद्रशेखर ने अपना एकमात्र वन-डे न्यूजीलैण्ड के खिलाफ खेला जिसमें उन्होंने 3 विकेट लिए। इनके बेहतरीन प्रदर्शन के लिए उन्हें 1972 में विज्डन क्रिकेटर ऑफ द ईयर का अवॉर्ड दिया गया।

1974-75 में वेस्टइंडीज के भारत दौरे पर कप्तान टाइगर पटौदी ने जिस तरह चंद्रशेखर का इस्तेमाल किया, उस पर एक अलग लेख लिखा जा सकता है।
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संन्यास से लेकर जानलेवा सड़क हादसे तक

भागवत चंद्रशेखर - फोटो : सोशल मीडिया
1977-78 तक चंद्रशेखर कुछ तो क्रिकेट की अधिकता और कुछ 10 साल पहले लगी चोट के कारण चुके-चुके से लगने लगे थे। पाकिस्तान के दौरे में वे कुछ खास नहीं कर सके और उनका प्रदर्शन अपेक्षा की परिपाटी पर फिट नहीं बैठा।

टेनिस की गेंद से क्रिकेट खेलने की शुरुआत करने वाले चंद्रशेखर अपनी इच्छा शक्ति और प्रतिभा के बल पर भारत के प्रमुख 'स्ट्राइक' गेंदबाज भी बन गए। कभी वे गेंदबाजी की शुरुआत भी किया करते। नई गेंद से गति मध्यम तेज हो जाती। जिस वर्ष भारत की जूनियर क्रिकेट टीम में चुने गए उसी साल सीनियर टीम में भी एंट्री पा ली। ऐसा भला कितने क्रिकेटर कर पाए?

चंद्रशेखर चयनकर्ता भी रहे, लेकिन जितने अच्छे खिलाड़ी थे उतनी बेहतरी से यह काम नहीं कर पाए। 1978 में खेल को अलविदा कहने वाला यह योद्धा 1990 में एक बार फिर क्रिकेट में वापसी करता है। पेशेवर क्रिकेट के इस फॉर्मेट मे वे अगले साल भी खेलते, लेकिन 1991 में अभ्यास के दौरान घर लौटते वक्त ट्रक की टक्कर से बाएं पैर ने काम करना बंद कर दिया।

अमेरिका में कई ऑपरेशन हुए। मगर अब जिंदगी भारी जूते पहनकर कुर्सी में बीत रही है। हाथ की मजबूती ने जहां चंद्रशेखर को और शक्तिशाली बनाया तो पैर की चोट आज भी कई खिलाड़ियों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही है।
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