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जीत के जश्न में टीम इंडिया रहे सावधान! इन चार कमजोरियों पर करना ही होगा काम

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भारतीय टीम की कमजोर कड़ी - फोटो : सोशल मीडिया
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भले ही बॉक्सिंग-डे टेस्ट अपने नाम कर भारत ने चार मैच की टेस्ट सीरीज 1-1 से बराबरी पर लाकर खड़ी कर दी, लेकिन इस जीत के बावजूद भारतीय टीम को सावधान रहना होगा। साल 2020 के अंत में यह जीत नए साल का जश्न तो लेकर आएगी, लेकिन अगर रहाणे जोश में होश खो बैठे तो उनकी समझदारी पर बट्टा भी लग जाएगा। 

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पहले मैच में अंतिम एक घंटे को छोड़ दिया जाए तो दोनों ही पारियों में भारत की फिल्डिंग घटिया ही रही थी। कई आसान कैच टपकाए गए थे, जिसका नुकसान हुआ। मगर दूसरे मैच में जीत के बावजूद टीम इंडिया की बल्लेबाजी और गेंदबाजी दोनों में ही पड़ता दरार साफ देखा नजर आ रहा है। टीम मैनेजमेंट को इन्हें जल्द से जल्द भरना होगा, वरना बॉर्डर-गावस्कर सीरीज में कब्जा सपना ही समझो।

कमजोर हुई भारत की 'दीवार'

चेतेश्वर पुजारा - फोटो : Social Media
चेतेश्वर पुजारा अपने करियर के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं। जिस खिलाड़ी के बूते पिछली बार सीरीज फतह हुई हो, अगर वह ही लगातार फेल हो तो चिंता लाजमी है। 32 वर्षीय पुजारा के बल्ले से पिछली 17 पारियों में एक भी शतक नहीं निकला है। आखिरी बार दो साल पहले 2018 में पिछले ऑस्ट्रेलिया दौरे पर ही उन्होंने सेंचुरी जड़ी थी। 'पुजी' क्रीज पर टिकते तो हैं, लेकिन रन नहीं बना पा रहे। बॉक्सिंग-डे टेस्ट में उन्होंने 20 (17, 3) तो एडिलेड में हुए पहले टेस्ट में 43 (43,0) रन का ही योगदान दिया।

मयंक अग्रवाल की जगह रोहित की वापसी?

मयंक अग्रवाल - फोटो : सोशल मीडिया
नंबर तीन की जिम्मेदारी खराब शुरुआत को संभालने की होती है, लेकिन अगर सलामी जोड़ी ही दमखम दिखाए तो गेंद पुरानी करने का जिम्मा अगले बल्लेबाज पर क्यों आए। मयंक अग्रवाल बतौर ओपनर लगातार फेल हो रहे। आईपीएल से वह अच्छा फॉर्म लेकर ऑस्ट्रेलिया आए थे, लेकिन लगता है कि उनकी कमजोरी विरोधियों ने अच्छी तरह पकड़ ली है। पहले टेस्ट में 26 रन तो (17,9) दूसरे मैच की पहली पारी में तो उनका खाता भी नहीं खुल पाया। 70 रन के छोटे लक्ष्य का पीछा करने के दौरान उम्मीद थी कि वह अपनी खोई लय हासिल करेंगे, लेकिन वह दूसरी पारी में भी स्टार्क का ही शिकार हुए और पांच रन पर चलते बने।

संकटमोचक नहीं रहे हनुमा

2018 में ही इंग्लैंड दौरे पर हनुमा विहारी का डेब्यू हुआ। टीम उस वक्त मुश्किल में थी। सलामी बल्लेबाजी से लेकर मध्यक्रम और निचले क्रम पर भी बल्लेबाजी कर चुके विहारी ने उनकी प्रतिभा का लोहा मनवाया। तकनीकी रूप से मजबूत यह बल्लेबाज भी रंग में नहीं दिख रहा। दो मैच की तीन पारियों में हैदराबाद के इस बल्लेबाज के नाम महज 45 रन ही दर्ज हुए हैं। हर उस मौके पर उन्होंने निराश किया जब उनकी जरूरत थी। पहले टेस्ट में 16 और 8। दूसरे टेस्ट की पहली पारी में वह 21 रन बनाकर आउट हुए। यानी हर बार उन्हें भी शुरुआत मिली, जिसे वह बड़े स्कोर में नहीं बदल पा रहे।
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विरोधी पुछल्ले बल्लेबाज

जसप्रीत बुमराह - फोटो : ट्विटर @BCCI
यह समस्या कोई नई नहीं। भारतीय गेंदबाज विरोधियों का शीर्ष क्रम तो तहस-नहस कर देता है, लेकिन उन्हें ऑलआउट करने में विफल रहता है। इंग्लैंड दौरे में मिली 1-4 की टेस्ट हार का विश्लेषण किया जाए तो भारत ने कई मैच इसलिए गंवाए क्योंकि पुछल्ले बल्लेबाज क्रीज पर टिक गए। इस सीरीज में भी वही देखने को मिल रहा है। पहले टेस्ट में यही हुआ। दूसरे मैच में तो भारत तीसरे ही दिन एक पारी से जीत सकता था। 99 रन पर छह विकेट खोने के बावजूद ऑस्ट्रेलिया के पुछल्ले बल्लेबाज चौथे दिन स्कोर 200 तक ले गए। कैमरोन ग्रीन (45) और पैट कमिंस (22) ने सातवें विकेट के लिए 57 रन जोड़े। दोनों ने 192 गेंदों में 50 रन की साझेदारी की।
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