15 अगस्त की शाम जहां सारा देश आजादी के जश्न में डूबा हुआ था तब भारतीय क्रिकेट टीम के एक पूर्व कप्तान आखिरी सांस ले रहे थे। बुधवार रात मुंबई के जसलोक हॉस्पिटल में अजित वाडेकर का निधन हो गया। 1 अप्रैल 1941 को जन्मे वाडेकर 77 साल के थे। वाडेकर विदेश में सीरीज जीतने वाले भारतीय कप्तान थे।
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बचपन से इंजीनियर बनने की चाहत रखने वाले वाडेकर की क्रिकेटर बनने की कहानी बेहद दिलचस्प है। एक सुखद हादसे ने न सिर्फ इस 'मुंबईकर' को क्रिकेट की तरह मोड़ दिया बल्कि बाद में उन्होंने इंडीज और इंग्लैंड को उन्हीं के घर में हराकर इतिहास भी रच दिया। अगली स्लाइड में जानिए उनके इंजीनियर से क्रिकेटर बनने का सफर...
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वाडेकर एक बार अपने सीनियर और पड़ोसी बालू गुप्ते के साथ बस से कॉलेज जा रहे थे। बालू कॉलेज की क्रिकेट टीम में थे। टीम में एक खिलाड़ी कम था। इस कमी को पूरा करने के लिए उन्होंने अजित से कॉलेज की टीम में 12वें खिलाड़ी बनने की पेशकश की। मैच फीस 3 रुपए मिलनी थी। उस वक्त तीन रुपए भी बड़ी रकम होती थी।
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अजित इस ऑफर को ठुकरा नहीं सके और कॉलेज की क्रिकेट टीम में शामिल हो गए। बाद में सुनील गावस्कर के चाचा माधव मंत्री ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। मंत्री के कहने पर वाडेकर को भारतीय टीम में जगह मिल गई।
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1971 में भारतीय टीम वाडेकर की कप्तानी में वेस्टइंडीज गई। पहले टेस्ट में भारत ने दिलीप सरदेसाई के दोहरे शतक की मदद से वेस्टइंडीज को फॉलोऑन के लिए मजबूर किया। हालांकि, यह टेस्ट ड्रॉ रहा। दूसरे टेस्ट में भारत ने सरदेसाई के शतक की मदद से कैरीबियंस को 7 विकेट से रौंदा।
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अगले तीन टेस्ट ड्रॉ कर भारत ने सीरीज 1-0 से अपने नाम कर ली। यह विदेश में भारत की पहली जीत थी। इसी साल टीम इंडिया वाडेकर की कप्तानी में इंग्लैंड दौरे पर गई। यहां उसने इंग्लैंड को 2-0 से हरा दिया।
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अजहर, सचिन, कुंबले जैसे क्रिकेटर्स के लिए पितातुल्य रहें वाडेकर ने अपने 8 साल के करियर में 37 टेस्ट खेले। 1966 में भारत के लिए पहला टेस्ट खेलने वाले वाडेकर ने एक शतक और 14 अर्धशतक की मदद से 31.07 की औसत से 2113 रन बनाए।
वे भारतीय वनडे क्रिकेट टीम के पहले कप्तान थे। अजित के नाम 2 वनडे मैच में 73 का स्कोर है। जहां 67 उनका सर्वोच्च स्कोर रहा। सरकार ने उन्हें 1967 में अर्जुन अवॉर्ड और 1972 में पद्मश्री से सम्मानित किया। वाडेकर के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शोक जताया।