बीसीसीआई ने ओपनर अभिनव मुकुंद सहित शीर्ष घरेलू खिलाड़ियों की आलोचना के बाद रणजी ट्रॉफी में केवल एक सत्र के बाद विवादास्पद तटस्थ स्थल का प्रारूप समाप्त करने का फैसला किया है। रणजी ट्रॉफी 2017-18 का सत्र छह अक्तूबर से शुरू होगा।
जिसमें अब पहले की तरह दो टीमों के बीच अपने और विरोधी टीम के मैच स्थल के आधार पर खेले जाएंगे। पूर्व कप्तान सौरव गांगुली की अगुवाई वाली बीसीसीआई की तकनीकी समिति ने यह फैसला किया। बीसीसीआई के कार्यवाहक सचिव अमिताभ चौधरी ने कहा कि नॉकआउट मैच पहले की तरह तटस्थ स्थल पर खेले जाएंगे।
तीन ग्रुप के बजाय सात-सात टीमों के चार ग्रुप होंगे
एक अन्य अहम फैसला 28 टीमों को चार ग्रुप में बांटने से संबंधित है। अब तीन ग्रुप के बजाय सात-सात टीमों के चार ग्रुप होंगे। समिति वर्ष की शुरुआत में मुंबई में सालाना सम्मेलन में कोचों और खिलाड़ियों से नकारात्मक फीडबैक मिलने के बाद यह यह फैसला लिया।
खिलाड़ी और कप्तान भी ऐसा चाहते थे
सौरव गांगुली ने कहा 'हमने फिर से अपने और विपक्षी टीम के मैच स्थल पर मैचों के आयोजन का फैसला विभिन्न परिस्थतियों को ध्यान में रखकर किया है। यहां तक कि खिलाड़ी और कप्तान भी ऐसा चाहते थे। अब मैच कम होंगे। तटस्थ स्थल पर मैचों का आयोजन हमने प्रयोग के तौर पर किया था। अब हमने फिर से मूल रूप अपना लिया है।
क्या है रणजी ट्रॉफी?
Ranji Trophy
भारत की घरेलू क्रिकेट में विभिन्न क्षेत्रीय क्रिकेट संघों की नुमाइंदगी वाले क्रिकेट टीमों के बीच फर्स्ट क्लास क्रिकेट की चैंपियनशिप रणजी ट्रॉफी के नाम से खेली जाती है।
यह इंग्लैंड की काउंटी क्रिकेट (चैंपियनशिप) और ऑस्ट्रेलिया के शेफील्ड शील्ड की बराबरी का माना जाता है। इस ट्रॉफी का नाम नवानगर के महाराज और इंग्लैंड व ससेक्स काउंटी के लिए खेलने वाले महाराजा रंजीत सिंह के नाम पर किया गया है।
भारत में फर्स्ट क्लास क्रिकेट की एक और ट्रॉफी महाराजा दिलीप सिंह जी के नाम पर दिलीप ट्रॉफी होती है। इसके अलावा देवधर ट्रॉफी भी भारत में खेली जाती है, जो लिस्ट ए क्रिकेट होती है।
दरअसल, लिस्ट ए क्रिकेट सीमित ओवरों की क्रिकेट होती है और यह अंतरराष्ट्रीय एकदिवसीय के स्तर के बराबर घरेलू स्तर पर मानी जाती है, जैसे अंतरराष्ट्रीय टेस्ट मैचों के मुकाबले फर्स्ट क्लास क्रिकेट को माना जाता है.
कब शुरू हुई प्रतियोगिता?
Ranji Trophy
रणजी ट्रॉफी की शुरुआत जुलाई 1934 में बीसीसीआई की एक बैठक के बाद हुई थी। इसके पहले मुकाबले 1934-35 में हुए थे, यानी इस ट्रॉफी को इस वर्ष आठ दशक पूरे हो जायेंगे।
इसके लिए ट्रॉफी पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह ने दी थी। बता दें कि रणजी ट्रॉफी का पहला चैंपियन मुंबई रहा था, जिसने उत्तर भारत को फाइनल में हरा कर चैंपियनशिप जीती थी।
अब तक के रणजी ट्रॉफी के इतिहास में मुंबई का नाम सबसे प्रभावी टीम के तौर पर दर्ज है। यह अब तक 40 बार विजेता रह चुकी है। 1958-59 से लेकर 1972-73 तक तो यह लगातार 15 वर्षों तक विजेता बनी रही।
वहीं, अपनी शुरुआत से लेकर 2001-02 तक के सत्र तक, टीमों को भौगोलिक आधार पर चार या पांच क्षेत्रों में बांटा जाता रहा है। 1952-53 में केंद्रीय क्षेत्र को भी जोड़ा गया। इसके अलावा उत्तर, पश्चिम, पूर्व और दक्षिण के चार क्षेत्र भी इसमें शिरकत करते थे।
1956-57 तक सारे मैच विभिन्न क्षेत्रों के भीतर पहले नॉकआउट आधार पर होते थे। उसके बाद विजेता का निर्धारण करने के लिए विविध जोनों के एक-एक विजेताओं के बीच नॉकआउट आधार पर मैच होता था। इसके विजेता को ही रणजी ट्रॉफी का विजेता माना जाता था।
1970-71 के सत्र में नॉकआउट के चरण को बढ़ा कर हर एक क्षेत्र से शीर्ष दो टीमों को चुना जाने लगा, यानी कुल दस क्वालिफाइंग टीमें होने लगीं।
इसको 1992-93 में बढ़ा कर हर एक क्षेत्र से तीन टीमों को चुनने लगे और कुल 15 टीमें सेकंडरी स्टेज में भिड़ने लगीं।
2002-03 में जोन की व्यवस्था को पूरी तरह छोड़ा
Ranji Trophy
2002-03 में जोन की व्यवस्था को पूरी तरह छोड़ दिया गया और द्वि-स्तरीय व्यवस्था अपना ली गयी। ‘एलीट’ ग्रुप में पंद्रह टीमों को रखा गया और ‘प्लेट’ ग्रुप में बाकी टीमों को। हर एक समूह में दो उप-समूह थे, जो राउंड-रोबिन आधार पर खेलते थे।
हर एक उप-समूह से दो शीर्ष टीमों को चुना जाता था, जो विजेता का चुनाव करने के लिए नॉकआउट टूनार्मेंट में खेलते थे। हरेक ‘एलीट’ उपसमूह में आखिर में आनेवाली टीम छंट जाती थी, और ‘प्लेट’ ग्रुप का फाइनल खेलनेवाली टीमों को अगले सत्र के लिए प्रमोट कर दिया जाता था।
2006-07 के सत्र में इस विभाजन को ‘सुपर लीग’ और ‘प्लेट लीग’ का नाम फिर से दिया गया।
2010-11 के सत्र में तब इतिहास रचा गया, जब प्लेट ग्रुप से राजस्थान ने न केवल एलीट ग्रुप में प्रवेश किया, बल्कि पहली बार रणजी ट्रॉफी के फाइनल में भी प्रवेश किया।
2012-13 के सत्र में पूरी तरह बदला रणजी का प्रारूप
Ranji Trophy
2012-13 के सत्र में रणजी के प्रारूप को पूरी तरह बदल दिया गया। ‘सुपर’ और ‘प्लेट’ ग्रुप को रद्द कर दिया गया और उसकी जगह ‘ए’, ‘बी’ और ‘सी’ नामक समूह बनाये गये। ‘ए’ और ‘बी’ समूह से तीन टीमें नॉकआउट राउंड में पहुंचती थीं, जबकि ग्रुप सी से दो टीमें पहुंचती थी।
समूह ए में सबसे नीचे रही टीम को अगली बार ग्रुप ‘बी’ में निम्नतम रही टीम को ग्रुप ‘सी’ में डाल दिया जाता था। इसी के उलट ग्रुप ‘सी’ की शीर्षस्थ टीम को ग्रुप ‘बी’ और ग्रुप ‘बी’ में सबसे शीर्ष पर रही टीम को ग्रुप ‘ए’ में प्रमोट कर दिया जाता था।
नॉकआउट प्रारूप को उसी तरह रखा गया है, बस अब नतीजा निकले, इसके लिए एक अतिरिक्त छठे दिन (पांच दिनों के बजाय) की भी व्यवस्था रखी गयी है।
रणजी ट्रॉफी मैचों में नॉकआउट मैच का नतीजा पहली पारी के आधार पर निकाला जाता है, अगर अंतिम फैसला ड्रॉ हो। नॉकआउट मैचों को छोड़ कर बाकी मैच चार दिन के होते हैं, जबकि नॉकआउट मैच पांच दिनों के टेस्ट मैच की तरह ही होते हैं।