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व्हाट्सऐप कथा: पायल की निष्ठुर आवाज से जाना कि कोई महिला थी...

Sun, 07 Jan 2018 04:14 PM IST
अभियान डेस्क/ अमर उजाला
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इस्पात का बना बड़ा-सा कंटेनर स्ट्रीट लाइट के बगल में पड़ा सोच रहा था, 'कितनी सड़न है मुझ में।' जबसे नगरपालिका वालों ने उसे नगर अस्पताल के सामने लगाया था, तब से कूड़े के नीचे दबा वह घुट-घुट कर अपना काम कर रहा था।
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विचारों के द्वंद्व में डूबा ही था कि तभी छुपते-छुपाते कोई साया अपनी ओर आता देख कंटेनर जड़ हो गया। मुंह ढका था, तो ठीक से पहचान नहीं पाया। दूर जाती पायल की निष्ठुर आवाज से जाना कि कोई महिला थी। उसने देखा कि उसकी गोद में एक नन्हीं-सी जान आंखें मूंदे खून से लथपथ कपड़े में लिपटी पड़ी थी।

कंटेनर के मुंह से सहसा निकल पड़ा, 'कितनी सड़न थी उस महिला में।' खुद के अकड़े शरीर को लाख मोड़ने की कोशिश करता कि बच्चे को अपने हाथों के दरमियां महफूज रख सके, पर फैक्टरी में ढाले गए इस्पात के कंटेनर अपनी मर्जी से नहीं मुड़ सकते, यह भी सच है। यह बेकार कोशिश सुबह तक करता बेचारा कंटेनर थक हारकर सुस्ताने लगा।
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तभी एक जोड़े हाथों को खुद के भीतर आता महसूस किया और उसकी जान में जान आई। यह वही जाने-पहचाने से हाथ थे, जिनसे वह पिछले कई सालों से कई बार मिल चुका था। कंटेनर उस भगवान रूपी आदमी के कदमों को देर तक टकटकी लगाए देखता रहा, जो उस नन्हीं-सी जान को अपने सीने से लगाए अनाथ आश्रम की ओर चल दिया था।

- कोटद्वार से मोहित रावत

 
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फेसबुक वॉल: स्वाभिमान की एक बड़ी लकीर

ये हैं पीलीभीत इलाके में हमारे गांव के भाई रामसागर जी। जन्म से दृष्टि नहीं है। उम्र चालीस के आस-पास। इनके लिए जीवन एक काली रात है, लेकिन इन्होंने जीवन में अपने तरीके से उजाला भरा है। घर से लेकर खेत-खलिहान तक के सभी काम स्वयं करते हैं।

गन्ने की छिलाई, धान रोपाई, धान-गेहूं कटाई से लेकर जानवरों के लिए चारा एकत्र करना, उन्हें चराने जाना आदि सब कुछ। वह सारे काम जो एक आंख वाला व्यक्ति कर सकता है, ये अपनी इच्छा शक्ति एवं अभ्यास के बल पर करते हैं। यहां तक कि बाज़ार जाना, रिश्तेदारी में जाना आदि सब।

बस जाते पैदल ही हैं। वह भी बिना चप्पल-जूते पहने । एक बार मैंने पूछा कि वह चप्पल-जूते क्यों नहीं पहनते, तो बोले, ‘चप्पल-जूते पहनकर वह रास्ता भटक जाते हैं।' भाई रामसागर को मैंने होली पर धमार मंडली के साथ धमार गीत गाते भी देखा। वह पूरी तन्मयता के साथ धमार गाते हैं। उनके मुंह से मैंने कई बार यह गीत सुना -'रथ बइठि सिया पछिताइं हमारे राम लखन बिछुडन भाये ...'।

गांव में जब भी इनसे मुलाकात होती है, तो राम जुहार होती है, गांव के सभी लोगों को उनके स्वर से पहचानते हैं। कहीं से आते हुए यदि मेरा स्वर उनके कान में पड़ जाता है और मैं उन्हें नहीं देख पाता, तो स्वयं ही बोल उठते हैं -'अउरु लल्ला कब आए? कइसे हउ?'

- सुनील मानव की फेसबुक वॉल से
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