ये हैं पीलीभीत इलाके में हमारे गांव के भाई रामसागर जी। जन्म से दृष्टि नहीं है। उम्र चालीस के आस-पास। इनके लिए जीवन एक काली रात है, लेकिन इन्होंने जीवन में अपने तरीके से उजाला भरा है। घर से लेकर खेत-खलिहान तक के सभी काम स्वयं करते हैं।
गन्ने की छिलाई, धान रोपाई, धान-गेहूं कटाई से लेकर जानवरों के लिए चारा एकत्र करना, उन्हें चराने जाना आदि सब कुछ। वह सारे काम जो एक आंख वाला व्यक्ति कर सकता है, ये अपनी इच्छा शक्ति एवं अभ्यास के बल पर करते हैं। यहां तक कि बाज़ार जाना, रिश्तेदारी में जाना आदि सब।
बस जाते पैदल ही हैं। वह भी बिना चप्पल-जूते पहने । एक बार मैंने पूछा कि वह चप्पल-जूते क्यों नहीं पहनते, तो बोले, ‘चप्पल-जूते पहनकर वह रास्ता भटक जाते हैं।' भाई रामसागर को मैंने होली पर धमार मंडली के साथ धमार गीत गाते भी देखा। वह पूरी तन्मयता के साथ धमार गाते हैं। उनके मुंह से मैंने कई बार यह गीत सुना -'रथ बइठि सिया पछिताइं हमारे राम लखन बिछुडन भाये ...'।
गांव में जब भी इनसे मुलाकात होती है, तो राम जुहार होती है, गांव के सभी लोगों को उनके स्वर से पहचानते हैं। कहीं से आते हुए यदि मेरा स्वर उनके कान में पड़ जाता है और मैं उन्हें नहीं देख पाता, तो स्वयं ही बोल उठते हैं -'अउरु लल्ला कब आए? कइसे हउ?'
- सुनील मानव की फेसबुक वॉल से