इस समय जब नरेंद्र मोदी सरकार के दो वर्ष पूर्ण होने वाले हैं, श्रम सुधार और कौशल प्रशिक्षण के परिदृश्य पर सरकार के कदमों की गति धीमी बनी हुई है। हाल ही में आई अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष की रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2015-16 में भारत की विकास दर 7.5 फीसदी रही है। अब यदि भारत इसे बढ़ाना चाहता है, तो जरूरी है कि श्रम सुधार और कौशल प्रशिक्षण को गति दी जाए। इन दिनों लगभग सभी आर्थिक अध्ययनों में एक तथ्य सामने आ रहा है, कि यदि श्रम सुधार, कौशल प्रशिक्षण की बुनियाद के साथ भारत आर्थिक विकास की डगर पर बढ़े, तो विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्ति के रूप में दिखाई दे सकता है।
पिछले दो वर्षों में एनडीए सरकार श्रम सुधारों और कौशल प्रशिक्षण के मोर्चों पर तेजी से आगे नहीं बढ़ पाई है। पिछले दिनों केंद्र सरकार ने कहा कि उसने कोई एक हजार से अधिक पुराने श्रम कानूनों को चिह्नित किया है, जिन्हें इस नए दौर में समाप्त किया जाना जरूरी है। हालांकि अब तक केंद्र सरकार 145 साल पुराने पेंशन कानून-1871 में संशोधन पर विचार कर रही थी। लेकिन अब इसे बेकार कानूनों की सूची से अलग कर दिया गया है, क्योंकि इसके प्रावधान पेंशनभोगियों को पेंशन की कुर्की के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करते हैं। देश में 58 लाख केंद्रीय पेंशनभोगी हैं, जिनकी पेंशन का नियमन इस कानून के तहत होता है।
मजदूर संगठनों के विरोध को देखते हुए केंद्र सरकार ने श्रम सुधारों की अपनी महत्वाकांक्षी योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। जहां केंद्र स्तर पर श्रम सुधार के कदम धीमे हैं, वहीं देश में कौशल विकास योजनाओं के क्रियान्वयन की गति भी सुस्त है। हाल में कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय की 2016-17 की अनुदान की मांग पर श्रम संबंधी स्थायी समिति की रिपोर्ट में कहा गया कि मंत्रालय की ओर से राज्य सरकारों से कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम क्रियान्वयन की गति बढ़ाने के लिए कहा जाता है, पर समिति इसके नतीजों से संतुष्ट नहीं है।
उल्लेखनीय है कि श्रम और औद्योगिक कानूनों की संख्या के मामले में हमारा देश दुनिया में सबसे आगे है। केंद्रीय अधिनियम के तहत विभिन्न प्रकार के करीब 3,000 कानून हैं, जबकि राज्यों के कानूनों की संख्या इसकी तीन गुना से अधिक है। उच्चतम न्यायालय भी कई बार अप्रासंगिक हो चुके ऐसे कानूनों की कमियां गिनाता रहा है। विश्व बैंक तथा अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय कारोबार आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक भारत के श्रम कानून सर्वाधिक प्रतिबंधनात्मक हैं, जिसके चलते भारत में विदेशी निवेश और कारोबार संबंधी अनुकूल माहौल नहीं बन पाता है।
स्पष्ट है कि ऐसे कई अनुपयुक्त श्रम कानूनों से अर्थव्यवस्था को नुकसान हो रहा है। कई शोध अध्ययनों में यह तथ्य सामने आया है कि भारत में उदारीकरण की धीमी और जटिल प्रक्रिया के पीछे श्रम सुधारों की मंदगति एक प्रमुख कारण है। सरकार को श्रम कानूनों में कम करनी होगी और ऐसी नीतियां और कार्यक्रम बनाने होंगे, जिनसे उत्पादन बढ़े और उपयुक्त सुरक्षा ढांचे के साथ श्रमिकों का भी भला हो। सरकार को अधिकतम प्रयास करना होगा कि श्रम संगठन और उद्योग संगठन श्रम और पूंजी के हितों में समन्वय बनाने के लिए खुले मन से संवाद करें। इसी तरह देश में उत्पादन, उत्पादकता और रोजगार बढ़ाने के लिए कौशल विकास पर जोर देना होगा।