पाकिस्तान समेत दुनिया भर में सौर ऊर्जा की प्रधानता बढ़ रही है। दूर-दराज के इलाकों में जहां बिजली नहीं पहुंची है, कम से कम बल्ब और पंखे सौर ऊर्जा से चल रहे हैं। शुरू में उद्यानों में सोलर लाइट लगाए गए थे, जो शहरी लोगों में काफी लोकप्रिय हुए। लेकिन अब तो विभिन्न शहरों में सड़कों के किनारे स्ट्रीट लाइट भी सौर ऊर्जा से रोशन हैं। लेकिन इस्लामाबाद में एक अजीब मामला सामने आया है। यहां के तीन बच्चों को 'सोलर किड्स' कहा जाता है। वे एक ऐसी दुर्लभ बीमारी से पीड़ित हैं, जिसका नाम तक चिकित्सा विज्ञान के पास नहीं है। ये तीनों भाई शोएब (14 साल), अब्दुर रशीद (नौ साल) और इलियास (एक साल) ब्लूचिस्तान के क्वेटा से 45 किलोमीटर दूर स्थित एक छोटे से गांव मिलान घुंडी के हैं। इनकी दो बहनें भी हैं, लेकिन वे पूरी तरह से सामान्य हैं।
जैसे ही सूरज उगता है, इन तीनों भाइयों की आंखे खुल जाती हैं और ये सामान्य जिंदगी जीने लगते हैं। वे क्रिकेट भी खेलते हैं और इस्लामी शिक्षा लेने स्थानीय मदरसा भी जाते हैं। लेकिन जैसे ही सूर्यास्त होने लगता है, इनकी आंखें बंद हो जाती हैं और ये पूरी तरह से निष्क्रिय (लकवाग्रस्त) हो जाते हैं। अगली सुबह वे फिर पूरी ऊर्जा के साथ जागते हैं। यदि वे सूर्यास्त के समय घर से बाहर होते हैं, तो उनके माता-पिता को उनके निष्क्रिय शरीर को घर के भीतर लाकर बिस्तर पर लिटाना पड़ता है। उनके जन्म से ही यह दिनचर्या जारी है। आसपास के लोगों को जैसे ही उनके बारे में पचा चला, वे उन्हें 'सोलर किड्स' बुलाने लगे।
हर शाम ये भाई अपने अंगों पर से पूरी तरह नियंत्रण खो देते हैं और बोलना तक बंद कर देते हैं, मानो वे कोमा में चले गए हों। इसी बीमारी से पीड़ित सबसे बड़े लड़के की मौत हो गई। उनके पिता मोहम्मद हाशिम बताते हैं कि उनके बच्चों की दुर्दशा की तरफ इस्लामाबाद के नीति-निर्माताओं का ध्यान खींचने में मीडिया ने बड़ी भूमिका निभाई है। हाशिम क्वेटा के यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करते हैं। बड़े लड़के को इस्लामाबाद के पाकिस्तान आयुर्विज्ञान संस्थान (पिम्स) में भर्ती कराया गया, जहां इलाज से उसकी हालत धीरे-धीरे सुधर रही है। चूंकि उसका परिवार गरीब है, इसलिए केंद्र सरकार ही उसकी चिकित्सा एवं अन्य जरूरतों का खर्च वहन कर रही है। अभी उसके सैकड़ों टैस्ट हो चुके हैं और इस दुर्लभ बीमारी की जांच के लिए 19 सदस्यीय मेडिकल बोर्ड का गठन किया गया है। इन भाइयों का इलाज कर रहे डॉक्टर जावेद अकरम बताते हैं कि ये सोलर किड्स संभवतः न्यूरो ट्रांसमीटर की कमी से पीड़ित हैं। आगे समझाते हुए वह कहते हैं कि सरल शब्दों में, इनके मस्तिष्क का 'न्यूरो ट्रांसमीटर' गड़बड़ा गया है। पाकिस्तान का हमारा अनुभव बताता है कि ऐसे मामले सिर्फ लड़कों में ही पाए जाते हैं और हम इसे कोई नाम देने पर विचार कर रहे हैं। शहीद जुल्फिकार अली भुट्टो मेडिकल यूनिवर्सिटी-पिम्स, लाहौर स्थित आनुवंशिक प्रयोगशाला भी इससे संबंधित शोध में शामिल है, क्योंकि इसके पास आनुवंशिक रोग एवं मानसिक मंदता के क्षेत्र में शोधकर्ताओं का सबसे बड़ा समूह है। फिलहाल 19 पीएच.डी छात्र इन दोनों सोलर किड्स के डीएनए सैंपल पर शोध कर रहे हैं।
यहां जागरूकता अभियान महत्वपूर्ण है, जिसमें डॉक्टर परिवार के भीतर ही विवाह को हतोत्साहित करते हैं, क्योंकि फर्स्ट कजिन (एक ही दादा वाले चचेरे भाई-बहन) के साथ विवाह से जन्मे कुछ बच्चों में जीवन के लिए घातक रक्त रोग थैलेसीमिया पाए गए हैं। इन बच्चों के माता-पिता भी फर्स्ट कजिन हैं। हालांकि शहरों के पढ़े-लिखे और जागरूक लोग परिवार के भीतर चचेरे भाई-बहनों से विवाह से परहेज करते हैं, लेकिन दूर-दराज के गांवों में ऐसा करना आसान नहीं है, क्योंकि संस्कृति ऐसे विवाहों को बढ़ावा देती है और मजहब भी मना नहीं करता है। पाकिस्तान में थैलेसीमिया के करीब 60 हजार रोगी पंजीकृत हैं। इसलिए अब सरकार विवाह से पहले दंपतियों को थैलेसीमिया की जांच कराने के लिए प्रेरित कर रही है। इन दोनों भाइयों को देखने आए राष्ट्रपति मैंमून हुसैन ने जोर देकर कहा कि सरकार को इन दिनों प्रचलित आनुवंशिक रोग के उन्मूलन के लिए कानून लाना चाहिए।
हालांकि यह सराहनीय है कि सरकार इस मामले में दिलचस्पी ले रही है और शोध एवं चिकित्सा का खर्च वहन करने के साथ-साथ पश्चिमी देशों के चिकित्सा संस्थानों से संपर्क कर रही है। तो फिर वह अपने पड़ोसियों से सहयोग एवं शोध के निष्कर्षों को साझा क्यों नहीं कर रही है?
दक्षेस देशों के बीच लगातार आवाजाही के कारण कई संक्रामक बीमारियां पर्यटकों के जरिये फैलती हैं, जैसा कि पोलियो के मामले में देखा गया। पाकिस्तान और अफगानिस्तान अब भी इस गंभीर बीमारी को खत्म करने के लिए जूझ रहे हैं। हालांकि अब तक इन सोलर किड्स की बीमारी के संक्रामक होने का पता नहीं चला है, फिर भी इस क्षेत्र में, खासकर भारत में कई जगहें ऐसी हैं, जहां चिकित्सा के क्षेत्र में काफी कुछ सीखा जा सकता है। पाकिस्तान के बहुत से लोग उन्नत चिकित्सा सुविधा के लिए भारत जाते रहते हैं। बेशक राजनीति निरंतर प्राथमिकता में रहेगी, लेकिन सार्क देशों के चिकित्साकर्मियों को अपने संसाधनों एवं शोधों का पुल तैयार करना चाहिए और इस क्षेत्र की आम बीमारियों से लड़ना चाहिए। पाकिस्तान अपने उन पड़ोसी मुल्कों से काफी कुछ सीख सकता है, जिन्होंने पोलियो उन्मूलन में सराहनीय काम किया है।
इस क्षेत्र में सहयोग एवं समन्वय से यह सुनिश्चित होगा कि अगर कोई सोलर किड्स जैसा मामला कहीं सामने आता है, तो फिर से शोध में कीमती समय बर्बाद करने के बजाय संसाधनों से लैस चिकित्सक एवं शोधकर्ता तुरंत इलाज शुरू कर सकेंगे। पाकिस्तान को भी पड़ोसी देशों के डॉक्टरों के लिए अपना द्वार खोलना चाहिए, ताकि वे सोलर किड्स के अनूठे मामले को आकर देख सकें।
लेखिका पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार हैं