हाल में समाप्त हुए विधानसभा चुनाव के दौरान, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के एक प्रत्याशी ने भाजपा प्रत्याशी रूपा गांगुली के बारे में घटिया टिप्पणी की थी। गांगुली टीवी की जानी-मानी अभिनेत्री रही हैं, जो 'महाभारत' में द्रौपदी की भूमिका निभाने के बाद बहुत जनप्रिय बन गई थीं। तृणमूल कांग्रेस के रज्जाक मुल्ला साहब की गांगुली के बारे में उनके निजी जीवन और द्रौपदी के किरदार को लेकर की गई टिप्पणी की चौतरफा निंदा हुई। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सूर्यकांत मिश्र ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी से मांग की कि वह मुल्ला के खिलाफ कार्यवाही करें; तृणमूल कांग्रेस के कुछ नेताओं ने, जो स्वयं भी फिल्मी जगत से संबंध रखते हैं, इस टिप्पणी का विरोध किया और चुनाव आयोग ने हस्तक्षेप करके रज्जाक मुल्ला को चेतावनी दी। इस सबका नतीजा यह हुआ कि रज्जाक मुल्ला को सार्वजानिक तौर पर माफी मांगनी पड़ी।
जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियां और करतूतें महिलाओं के लिए बढ़ती असुरक्षा और हिंसा के माहौल को बिगाड़ने में कितनी और किस तरह मदद करते हैं, यह चिंता और चर्चा का विषय बन चुका है। ऐसी हिंसा को अक्सर महिलाओं को उनके व्यवहार, पहनावे, आचरण इत्यादि के कारण, 'सबक सिखाने' का नाम दिया जाता है।
यही कारण है कि जब भी इस तरह की टिप्पणियां की जाती हैं, तो उनकी सख्त निंदा भी होती है। यही नहीं, अब तो यह मांग भी की जा रही है कि अगर कोई निर्वाचित व्यक्ति इस तरह की बात करता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। यहां तक कि उसकी सदस्यता भी खारिज कर दी जानी चाहिए। इस तरह की मांग तमाम राजनीतिक दलों से उठती है, फिर भी इस तरह का कानून बनना तो दूर, नियम भी तय नहीं किया जा रहा है। इसका कारण है कि वाम दलों को छोड़, अन्य दलों की कथनी और करनी में अंतर है। अगर उनके विरोधी दल के लोग इस तरह की बातें करते हैं, तो वे आग-बबूला होकर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करते हैं, लेकिन अगर उनके ही दल के लोग ऐसा कहते हैं, तो फिर वे चुप्पी साध लेते हैं।
संयोग से, बंगाल में भी ऐसा ही हुआ। चुनाव समाप्त होने के तुरंत बाद, जाधवपुर विश्वविद्यालय में आम छात्रों और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्यों के बीच उस समय झड़प हुई, जब एक फिल्म देखने के लिए एबीवीपी के तमाम समर्थक विश्वविद्यालय के प्रांगण में पहुंच गए। उन पर आरोप लगा कि उनमें से कुछ लड़कों ने उनका विरोध करने वाली कुछ छात्राओं के साथ अभद्र व्यवहार किया। ऐसे चार लड़कों को पकड़ कर पुलिस के हवाले भी कर दिया गया। इस दौरान संगठन के नेता सुमन दत्त ने कहा कि जिन लड़कियों ने अपने साथ हुई बदसलूकी का इल्जाम लगाया है, चूंकि वह खुद ऐसी हैं, इसलिए उन्होंने इस तरह का इल्जाम लगाने का अपना अधिकार खो चुकी हैं! इसके बाद बंगाल भाजपा के नेता दिलीप घोष ने पहले तो उन लड़कियों को बेशर्म कहा और फिर कहा कि आखिर झड़प के समय ये छात्राएं उस स्थान पर मौजूद ही क्यों थीं। उनका मतलब स्पष्ट था। अगर महिलाएं बेशर्म हों और आंदोलनों में भाग लेने वाली हों, तो फिर उनके साथ बदसलूकी करना और उनको अपमानित करना कोई गुनाह नहीं है। महत्वपूर्ण है कि रूपा गांगुली भी इन तमाम टिप्पणियों के बारे में खामोश ही रहीं।
लेखिका माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य हैं