भारत में राजनीतिक दलों को किस तरह से वित्त पोषित किया जाना चाहिए, यह सवाल अभिन्न रूप से भ्रष्टाचार और काला धन सृजन से जुड़ा हुआ है। यह सर्वविदित है कि बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) परियोजनाओं का कारोबार करने वाली कंपनियों ने बैंकों से भारी कर्ज लिया है और उनके पैसे का कुछ हिस्सा राजनीतिक दलों को चुनावी चंदे के रूप में जाता है।
हैरानी की बात नहीं कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के 7.5 लाख करोड़ रुपये उन प्रसिद्ध कॉर्पोरेट समूहों के ऊपर बकाया हैं, जो इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं और स्टील एवं अन्य धातुओं के कारोबार में लगे हैं। चाहे यूपीए हो या एनडीए, कोई भी सरकार इन कंपनियों के खिलाफ अनावश्यक रूप से कभी सख्त नहीं हुई, क्योंकि वे प्रमुख राजनीतिक दलों को भारी मात्रा में चंदा देती हैं। तो व्यवस्था की इस बीमारी का इलाज क्या है? इसका जवाब यही है कि राजनीतिक दलों के वित्त पोषण को पूरी तरह से पारदर्शी और खुला बनाया जाए। लेकिन ऐसा कैसे होगा? सबसे पहले सरकार को संकीर्ण निहित स्वार्थों के लिए गैर पारदर्शी तरीके से काम करना बंद कर देना चाहिए।
हाल ही में केंद्र सरकार ने विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) के उल्लंघन के मामले से राजनीतिक दलों को कानून में पूर्व की तिथि से लागू संशोधन के जरिये चुपचाप दोषमुक्त कर दिया। इस तरह से विदेशी मूल की कंपनी वेदांता द्वारा भाजपा एवं कांग्रेस जैसी प्रमुख पार्टियों को दिए गए चंदे को वैध करार दिया गया। संयोगवश वेदांता उन दस बड़ी कंपनियों में से एक है, जिसने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से कर्ज लिया है। वेदांता का मामला तब विवादों में आया, जब सत्ता में आने के बाद राजग ने जून, 2014 में कुछ प्रमुख गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) के खिलाफ कथित विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम के उल्लंघन के लिए कार्रवाई शुरू की। गृह मंत्रालय ने फोर्ड फाउंडेशन एवं ग्रीनपीस द्वारा वित्त पोषित कुछ प्रतिष्ठित एनजीओ को कथित विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम के उल्लंघन के लिए नोटिस भेजा।
कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यह सवाल उठाया कि विदेशी कंपनी वेदांता की भारत में स्थित सहायक कंपनी कैसे भाजपा एवं कांग्रेस को चुनावी चंदा दे सकती है। यह विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम का उल्लंघन है। राजनीतिक दलों द्वारा वेदांता जैसी विदेशी कंपनी से औपचारिक रूप से चंदा लेने के सवाल को न्यायपालिका के सामने लाया गया। हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर की गई, जिसमें यह पूछा गया कि राजनीतिक दलों ने कितना विदेशी चंदा प्राप्त किया।
केंद्र सरकार ने कभी इसका ठोस जवाब नहीं दिया कि एफसीआरए की आवश्यक मंजूरी के बिना कैसे प्रमुख राजनीतिक दलों ने वेदांता जैसी वैश्विक कंपनी से चंदा लिया। खैर, सरकार ने चतुराई दिखाई और उसने भाजपा एवं कांग्रेस द्वारा वेदांता से लिए गए चंदे को वैध ठहराने के लिए विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम में पूर्व की तिथि से संशोधन लागू कर दिया।
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 में किया गया यह चालाकीपूर्ण संशोधन प्रभावी रूप से बताता है कि मौजूदा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) नियमों के तहत किसी विदेशी कंपनी की पंजीकृत सहायक इकाई को घरेलू कंपनी ही माना जाएगा। इससे पहले ऐसी सहायक कंपनियों को विदेशी कंपनी माना जाता था।
इसका सीधा-सा मतलब है कि वेदांता एफसीआरए की किसी मंजूरी के बिना राजनीतिक दलों को पूर्व की तारीख से चंदा देने के लिए स्वतंत्र है, क्योंकि भारतीय इकाई में इसका विदेशी इक्विटी निवेश मौजूदा विदेशी मुद्रा कानूनों के अनुसार है।
हालांकि पूर्व की तारीख से लागू संशोधन को लेकर विवाद भी उत्पन्न हो सकते हैं, क्योंकि राजनीतिक दलों के विदेशी चंदे से संबंधित कई मामले सर्वोच्च न्यायालय में अभी लंबित हैं। इसलिए कॉर्पोरेट जगत द्वारा राजनीतिक दलों को चंदा देने की प्रकृति का मामला आगे फिर से खुल सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय इस अवसर का लाभ उठाते हुए केंद्र को निर्देश दे सकता है कि राजनीतिक दलों के वित्त पोषण को पूरी तरह से पारदर्शी बनाया जाए। ऐसा करने का एक उपाय यह है कि केंद्र को इसके लिए मजबूर किया जाए कि वह चुनावी चंदे पर एक उपकर या कर लगाए। यदि कॉर्पोरेट घरानों और व्यक्तिगत करदाताओं से राजनीतिक दलों को दिए जाने वाले चंदे के कारण पांच वर्षों में जीडीपी का 0.5 फीसदी का छोटा-सा हिस्सा भी यदि इस तरह से जमा किया जाता है, तो 60 हजार करोड़ रुपये के कोष का निर्माण हो जाएगा, जिसे एक सांविधानिक निकाय के रूप में निर्वाचन आयोग प्रबंधित कर सकता है।
वास्तव में, अगर निर्वाचन आयोग पारदर्शिता के आधार पर चुनावी चंदे को प्रबंधित करने वाला प्राधिकरण बनता है, तो फिर राजनीतिक दलों को मुआवजे के आधार पर कॉर्पोरेट घारानों से चंदा लेने की जरूरत नहीं रहेगी। यदि हर तरह के चंदे को आधिकारिक बना दिया जाता है, तो चुनाव में काले धन की भूमिका पूरी तरह नहीं, तो कुछ हद तक कम जरूर हो जाएगी। यह एक अच्छी शुरुआत हो सकती है। यदि निर्वाचन आयोग को ऐसे चंदे को प्रबंधित करने के लिए प्राधिकरण बनाया जाता है, तो विदेशी कंपनियों की भारतीय इकाई से ऐसे कोष में अंशदान लेने में कोई बुराई नहीं है, जिसे निर्वाचन आयोग द्वारा सख्ती से विनियमित किया जाएगा।