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अच्छे मानसून के आसार

Thu, 19 May 2016 08:48 AM IST
आनंद शर्मा
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किसान
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जब गर्मियों के मौसम में धरती तप रही हो, तेज गर्म हवाएं चल रही हों, तब हर कोई यह जानने के लिए उत्सुक रहता है कि इस बार मानसून कैसा होगा। कहीं मानसून धीमा तो नहीं होगा, निराश तो नहीं करेगा। ऐसे में राहत की बात यह है कि इस बार मानसून के संकेत अच्छे हैं। पिछली बार मानसून धीमा था। मौसम विभाग के आकलन के मुताबिक, इस बार मानसून नियत समय से थोड़ा आगे-पीछे हो सकता है, लेकिन अपने साथ अच्छी बारिश लेकर आ रहा है। वैसे भी कुछ दिनों का फर्क होने पर भी मानसून की सामान्य स्थिति ही कहलाती है। पिछले वर्ष मानसून ने पांच जून को केरल के तट छुए थे, इस बार उस तिथि से एक दिन बाद मानसून बेहतर संभावनाओं के साथ आ रहा है। उम्मीद है कि इससे सूखे से जूझ रहे कुछ इलाकों को राहत पहुंचेगी और आसमान की ओर टकटकी लगाए किसानों को कुछ उम्मीद जगेगी।
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श्रीलंका और तमिलनाडु में कम दबाव का क्षेत्र बन गया है। यह पूरी तरह से सक्रिय हो गया है। इसी के आधार पर माना जा रहा है कि जून के प्रथम सप्ताह में केरल तट भीगने लगेगा। मौसम विभाग यह कहने की स्थिति में है कि इस बार मानसून सामान्य से अच्छा होगा। समूचे देश में 1951 से 2000 तक की दीर्घ अवधि की औसत वर्षा 89 सेमी है। इस बार सामान्य से अधिक वर्षा होने का संकेत है और यह औसत का 106 प्रतिशत तक हो सकती है।

दरअसल मानसून सिस्टम को समझने के लिए प्री मानसून (गर्म महीने की बारिश) को समझना बेहद जरूरी है। गरम महीनों की बारिश का मानसून के साथ एक संबंध है। गर्मी बढ़ने पर प्री मानसून की बारिश धरती की तपन को किसी हद तक कम करती है। मगर प्री मानसून की ज्यादा बारिश अच्छे मानसून में बाधा बनती है। गर्म महीनों में सूरज की किरणें धरती पर सीधे पड़ती हैं। धरती की तुलना में समुद्र देर से गर्म होता है। इस प्रक्रिया में जहां गर्मी से तपन ज्यादा होती है, वहां पर दबाव कम होता है। ऐसी स्थिति में समुद्र में ऊंचा दबाव और धरती पर (खासकर उत्तर-पश्चिम भारत में) कम दबाव का क्षेत्र बनता है। ऐसे में समुद्र से हवाएं धरती की ओर चलती हैं। इसका सीधा सिद्धांत यही है कि खासकर उत्तर पश्चिम में प्री मानसून की बारिश कम होनी चाहिए। ठंडी होती धरती बारिश का वातावरण नहीं बनाएगी। तापमान और दबाव का विपरीत संबंध होता है। मौसम विभाग मार्च से मई तक के मौसम को प्री मानसून मानता है। इस बार प्री मानसून की बारिश सामान्य रही है। उत्तर और पश्चिम भारत में तापमान बढ़ने से हवा का दबाव कम होगा। यह स्थिति अच्छे मानसून की स्थिति की ओर संकेत कर रही है।
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मानसून की चर्चाओं में ग्लोबल वार्मिंग का जिक्र अक्सर होता है। 1901 से 2015 तक तापमान में औसतन 0. 63 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है। वैसे पिछली बार अल-नीनो ने मानसून को कुछ हद तक प्रभावित किया था। लेकिन हर बार ऐसा हो, जरूरी नहीं है। यह भी देखा गया है कि कई बार अल-नीनो के बावजूद मानसून ठीक-ठाक रहा। इस बार अल-नीनो कमजोर है, यह भी मानसून के लिए सकारात्मक बन रही है। आकलन है कि अल-नीनो लगातार कमजोर होता जाएगा। कहा जाता है कि एक डिग्री तापमान बढने पर कुछ हद तक मानसून प्रभावित हो सकता है। वैसे जिस तरह धरती का तापमान बढ़ रहा है, उसमें 2100 तक ऐसी स्थिति आ सकती है कि मानसून अनियमित होकर जलवायु को प्रभावित करे।

मौसम विभाग मानसून पर अपना आकलन करता है। पर वह इस धारणा को बदलने में अक्षम है कि मानसून भारत में कृषि के लिए जुआ है। मौसम को समझने की तमाम विधियां, उपकरण, वैज्ञानिक अध्ययन और संसाधन हैं। लेकिन प्रकृति का मिजाज अलग है। भारत में, जहां 70 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर है, वहां मौसम विभाग मानसून का संकेत दे सकता है, उसकी स्थितियां बता सकता है। पर इस बात की अपेक्षा रहती है कि सरकार मानसून से पहले अपनी तैयारियों के साथ रहे। सिंचाई के बेहतर साधन, किसानों के लिए ऋण, बाजार से बिचौलियों को हटाना, उत्पाद के लिए निश्चित मूल्य तय करना और उत्पाद को मंडियों तक लाने की कारगर व्यवस्था, ये ऐसे उपाय हैं, जो सूखे या कम वर्षा के हालातों से निपटने में किसानों को राहत दे सकते हैं। सबसे जरूरी है कि उनके अंदर आत्मविश्वास बनाए रखना, ताकि वह जिंदगी का दांव न खेलें।

धार्मिक आस्था और परंपरा कितनी भी प्रबल हों, पर इस बात का ठोस वैज्ञानिक आधार नहीं निकला कि यज्ञ-हवन से बारिश की जा सकती है। इसी तरह उन्नत विज्ञान के कितने भी चर्चे हों, पर चीन ने ओलंपिक में बादलों को रोक कर रखा, इस पर सहसा यकीन नहीं होता। कई जगहों पर सिल्वर आयोडाइड और सोडियम क्लोराइड का रॉकेट या हवाई जहाज के जरिये छिड़काव करके बादलों से बारिश के प्रयास किए जाते हैं। यह महंगी प्रक्रिया है। और इसका विपरीत पक्ष यह भी है कि कल बादलों के प्रयोग पर भी दो राज्य आपस में लड़ सकते हैं। कोई एक राज्य कह सकता है कि दूसरे ने उसकी तरफ आते बादलों को रोका। पहली बात तो यही है कि क्या ये चीजें वैज्ञानिक कसौटी पर पुख्ता होकर उतरी हैं। अभी बारिश कराने के ये शुरुआती प्रयोग भर हैं। प्रकृति अनूठी है, उसका अपना रहस्य है। पर वह अपने में एक संतुलन भी बनाए हुए है। विज्ञान अपने सिस्टम, अनुसंधान और संसाधनों का प्रयोग कर प्रकृति की थाह लेने की कोशिश करता है। मौसम विभाग की भविष्यवाणी कभी उपहास का कारण बनती थी, लेकिन अब स्थितियां बदल गई हैं। केदारनाथ की आपदा से पहले और उसके बाद भी मौसम के मिजाज की सटीक भविष्यवाणी इसके अपने बेहतर सिस्टम का ही नतीजा था।
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-उप महानिदेशक, उत्तरी क्षेत्र प्रादेशिक मौसम केंद्र
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