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क्या आईएएस ही अंतिम लक्ष्य है

Wed, 18 May 2016 07:03 PM IST
डी सी कर्नाटक
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साउथ ब्लॉक
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हर साल की तरह इस साल भी सिविल सर्विस परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ है। इसके द्वारा आईएएस, आईपीएस तथा केंद्रीय सेवाओं में हजार से ज्यादा युवाओं को नियुक्तियां मिलेंगी। आईएएस तथा आईपीएस के अधिकारी अपनी-अपनी ट्रेनिंग पूरी करने के बाद प्रदत्त कैडर यानी राज्य में अपनी नौकरियां शुरू करेंगे। उच्च पदों से नवाजे जाएंगे और उस कुलीन विशेषाधिकार सर्वसुविधासंपन्न वर्ग में शामिल हो जाएंगे, जिसकी संख्या हमारी कुल आबादी के एक फीसदी से भी कम है। बड़ा सवाल यह है कि क्या ये अधिकारी देश या देश के लोगों, खास तौर पर वंचित वर्ग के लोगों के भले के लिए कुछ करेंगे या केवल अपनी तथा अपनों या बड़े लोगों की ही सेवा करेंगे। अभी थोड़े दिन पहले आंध्र प्रदेश के एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी (डिप्टी ट्रांसपोर्ट कमिश्नर) के घर एंटी करप्शन ब्यूरो के छापे में उनके पास लगभग आठ सौ करोड़ रुपये की संपत्ति होने का पता चला है। इससे पहले उत्तर प्रदेश के एक पूर्व मुख्य सचिव के पास एक हजार करोड़ रुपये के अघोषित धन का तथा मध्य प्रदेश के जोशी आईएएस दंपत्ति के पास चार सौ करोड़ की संपदा होने का जिक्र समाचार पत्रों में आया था। ऐसेे मामले आते ही रहते हैं और देश में ब्रिटिश काल वाले कानून के जारी रहने से वर्षों तक मामले चलते रहते हैं। नतीजतन इन सफेद कॉलर वाले अपराधियों को सजा नहीं मिल पाती और देश का भारी नुकसान करने के बाद ही ये सेवानिवृत्त होते हैं।
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आईएएस दुल्हे का बाजार भाव अभी कई करोड़ रुपये में बताया जा रहा है, क्योंकि इस सेवा में आने के बाद पद के इस्तेमाल से अंधाधुंध कमाई और अपने लोगों को लाभ पहुंचाने के सैकड़ों रास्ते खुल जाते हैं। इन सेवाओं में आने से पहले उनकी पृष्ठभूमि बिल्कुल अलग-अलग हो सकती है-निर्धन, कुलीन, ग्रामीण या शहरी, किंतु अधिकारी बन जाने के बाद उनके व्यवहार तथा तौर-तरीकों में ज्यादा फर्क नहीं रह जाता। दरअसल हमारे देश की व्यवस्था कुछ ऐसी है कि यदि आप ईमानदारी से काम करना चाहते हैं, तो आपको काम करने ही नहीं दिया जाएगा, परेशान किया जाएगा, निलंबित कर दिया जाएगा, हर पांच-छह महीने बाद तबादला कर दिया जाएगा, जिससे आपका पारिवारिक जीवन तहस-नहस हो सकता है। या फिर आपको ऐसी जगह भेज दिया जाएगा, जहां कार्य करने का कोई अवसर नहीं होगा। यदि आप मंत्रियों, उच्च अधिकारियों तथा कर्मचारियों के साथ मिलकर भ्रष्टाचार करते रहें और अपना हिस्सा लेते रहें, तो किसी को कोई समस्या नहीं होगी और आप मलाईदार पदों पर बने रहकर प्रोमोशन पाते रहेंगे। इस सबका दुष्परिणाम तो उस व्यक्ति को झेलना पड़ता है, जिसके पास आजादी के करीब 70 वर्षों बाद भी एक दिन में खर्च करने के लिए पचास रुपये भी नहीं होते। और ऐसे लोगों की संख्या इस देश में करोड़ों में है, जिन्हें जीने के मूलभूत अधिकारों से वंचित कर दिया गया है। भोजन, आवास, पीने का पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, आदि जरूरी सुविधाएं भी उन्हें नहीं मिल पातीं।

आईएएस अधिकारियों को इतनी ज्यादा सुविधाएं, अधिकार तथा जवाबदेही से छूट दे दी गई है कि पूरे समाज में भारी विकृति आ गई है।  यही वजह है कि इंजीनियर और डॉक्टर बनकर निकलने वाले छात्र भी आईएएस बनना चाहते हैं। आईएएस में कुछ वर्ष कार्य करने के बाद कई अधिकारी अपने संपर्कों का फायदा उठाकर अंतरराष्ट्रीय संस्थानों, विश्व बैंक आदि में नियुक्ति ले लेते हैं, ताकि दस से बारह गुना वेतन या कर रहित आय की कमाई हो सके। संयुक्त राष्ट्र के कुछ दफ्तरों में पांच साल काम कर लेने पर मोटी पेंशन भी पक्की हो सकती है। आजादी के इतने वर्षों बाद भी हमारा देश विकास, कार्य संस्कृति, न्याय व्यवस्था, नागरिक सुविधाएं, आर्थिक समानता आदि मानकों पर पीछे है, तो इसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी सरकारों की बनती है, क्योंकि यहां नागरिक जीवन के हर क्षेत्र में सरकार की भारी दखलंदाजी है। सूचना के अधिकार के तहत सवाल पूछने पर ही कई सवालकर्ता मारे जा चुके हैं। यदि इस देश को और गिरने से बचाना है, तो हमें उन तमाम कानूनों को खत्म करना होगा, जिन्हें अंग्रेजों ने यहां गुलामी कायम रखने के लिए लागू किया था और आजादी के बाद हमारे काले अंग्रेज अपने लाभ के लिए जारी रखे हुए हैं। कई तरह के करों को समाप्त करके उन्हें तर्कसंगत बनाना होगा, सरकारी अमले और खर्च में भारी कमी करनी पड़ेगी। सरकारी सेवाओं में भर्तियां केंद्र या राज्य स्तर पर न करके स्थानीय स्तर पर करनी होंगी, ताकि अधिकारी तथा कर्मचारी स्थानीय स्वराज के प्रति जवाबदेह हों और ट्रांसफर-पोस्टिंग (जो करोड़ों रुपये का अवैध उद्योग बन चुका है) खत्म हो सके।
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जनलोकपाल को सरकार तथा विपक्ष दोनों ने प्रक्रिया की आड़ में सुविधापूर्वक दफना दिया है। अगर इंफ्रास्ट्रक्चर युक्त सीबीआई को पूरी स्वायत्तता दे दी जाए, तो जनलोकपाल का पूरा काम कर सकता है। हमारे देश में स्वायत्त शब्द भी एक मजाक बनकर रह गया है, क्योंकि ऐसी संस्थाओं पर भी वित्त, नियुक्तियां, ट्रांसफर आदि के जरिये सरकार का ही नियंत्रण होता है। सरकारी दखल को कम करके कार्य करने की आजादी देनी होगी। सरकारों का काम लोगों को सुविधा देना, अपराधों की रोकथाम तथा अपराधियों को अविलंब दंड देने का होना चाहिए, जिसमें वर्तमान व्यवस्था नाकाम हो चुकी है। नकारा कर्मियों को नौकरी से निकालना आसान बनाना होगा।

संघ लोकसेवा आयोग द्वारा चुनी हुई अच्छी प्रतिभाओं का इस्तेमाल इस देश की व्यवस्था में परिवर्तन के लिए उपाय सुझाने के लिए किया जाना चाहिए, लेकिन इसके बजाय वही पुरानी शोषण तथा अपने लोगों को लाभ पहुंचाने की परंपरा जारी है। आईएएस को साध्य के तौर पर नहीं, बल्कि साधन के रूप में लिया जाना चाहिए, जो अपनी पूरी क्षमता के साथ देश का नवनिर्माण कर सके। सिर्फ संविधान और जनतंत्र की दुहाई देने से बात नहीं बनेगी, जाति, मजहब और क्षेत्र-हर तरह के तुष्टिकरण को समाप्त करना होगा।
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 लेखक पूर्व आईएफएस अधिकारी हैं
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