पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनाव में बुरी तरह से चोट खाई भारतीय जनता पार्टी के लिए उत्साहवर्द्धक है। बिहार में शर्मनाक पराजय और उत्तराखंड में फजीहत होने के कारण उसके कार्यकर्ताओं का मनोबल थोड़ा कमजोर पड़ गया था, ऐसे में ये नतीजे उसके कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार करेंगे। पूर्वोत्तर का द्वार कहे जाने वाले असम में तो उसने कांग्रेस की तरुण गोगोई सरकार को सत्ता से बेदखल कर अपने सहयोगी दलों के साथ सत्ता हथियाई ही है, अन्य राज्यों में भी उसने अपनी बेहतर उपस्थिति दर्ज की है। लगभग हर राज्य में उसकी वोट हिस्सेदारी बढ़ी है, जो भविष्य के लिहाज से उसके लिए अच्छा संकेत है। इसमें कोई संदेह नहीं कि अखिल भारतीय पार्टी के रूप में उसकी बुनियाद मजबूत होती जा रही है। भाजपा का जनाधार अगर इसी तरह उन राज्यों में भी बढ़ता रहा, जहां उसकी उपस्थिति तक नहीं थी, तो 2019 के लोकसभा चुनाव में वह पूरे दमखम के साथ मैदान में उतरेगी।
पूर्वोत्तर के राज्य असम में पहली बार भाजपा के पक्ष में जनादेश गया है। वहां तरुण गोगोई सरकार के खिलाफ सत्ता-विरोधी रुझान तो था ही, भाजपा को अन्य दलों के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ने का भी फायदा हुआ। जबकि कांग्रेस ने वहां किसी भी दल के साथ गठबंधन नहीं किया था। इसके अलावा भाजपा ने वहां बिहार के विपरीत पहले ही अपने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा कर दी थी, जिसका उसे फायदा हुआ। पिछले दिनों भाजपा ने उत्तराखंड में संविधान के अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल करके वहां से कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया था, जो बाद में विफल साबित हुआ, लेकिन असम में उसने बिल्कुल लोकतांत्रिक तरीके से कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया है। जाहिर है, भाजपा अपने ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के एजेंडे पर लगातार बढ़ रही है।
जहां तक पश्चिम बंगाल की बात है, तो ममता बनर्जी ने शानदार बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की है। ममता बनर्जी के खिलाफ वहां वाम दल और कांग्रेस ने गठजोड़ किया था, जो बुरी तरह से विफल हुआ। इसके अलावा ममता बनर्जी के खिलाफ भाजपा का स्वर अपेक्षाकृत नरम पड़ गया था। शुरू में तो भाजपा तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ आक्रामक हुई थी, लेकिन बाद में शायद उसे लगा कि इसका फायदा वाम दलों को हो जाएगा, तो उसने अपना रुख नरम कर लिया। अगर भाजपा वहां ममता के खिलाफ आक्रामक बनी रहती, तो उसे संभवतः और फायदा हो सकता था। ममता को इस चुनाव में शारदा, नारदा और फ्लाईओवर हादसे जैसे मुद्दों का भी सामना करना पड़ा। पर उन्होंने पिछली बार से ज्यादा सीटें जीतकर दिखा दिया है कि पश्चिम बंगाल में उनकी लोकप्रियता में कमी नहीं आई है, बल्कि बढ़ी ही है।
तमिलनाडु में जे जयललिता ने एक्जिट पोल के तमाम कयासों को नकारते हुए सत्ता में दोबारा वापसी कर वहां के हालिया चुनावी इतिहास को बदल दिया है। करीब तीन दशक से वहां कोई भी दल लगातार सत्ता में नहीं आता था, लेकिन जयललिता ने इस मामले में नया इतिहास रचा है। हालांकि सीटों के मामले में द्रमुक भी अन्नाद्रमुक से बहुत पीछे नहीं है, इसलिए सदन में अम्मा को मजबूत विपक्ष का सामना करना पड़ेगा।
केरल में वाम दलों के गठबंधन को जीत मिली है, लेकिन पश्चिम बंगाल में उसके लिए सबसे बड़ी चिंता की बात है कि वह कांग्रेस से भी पीछे चली गई है, और सीटों के लिहाज से वह तीसरे स्थान पर है। पांच राज्यों के इस चुनाव में अगर सबसे ज्यादा किसी को नुकसान हुआ है, तो वह कांग्रेस है। असम की सत्ता तो उसके हाथ से गई ही, केरल में भी उसकी सत्ता छिन गई। उसके लिए संतोष की बात यही है कि पश्चिम बंगाल में उसे वाम दलों से ज्यादा सीटें मिली हैं और पुदुचेरी में द्रमुक के साथ उसके गठबंधन को बढ़त मिली है।
राष्ट्रीय राजनीति पर इन नतीजों का असर पड़ना स्वाभाविक है। भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं का तो इनसे उत्साह बढ़ेगा ही, मोदी-विरोधी संयुक्त विपक्षी मोर्चे की जो संभावनाएं नीतीश कुमार तलाश रहे हैं, उसे भी इससे भयंकर धक्का लगेगा। अगर पश्चिम बंगाल में वाम दलों और कांग्रेस का गठबंधन सफल होता, तो भविष्य में मोदी-विरोधी संयुक्त विपक्षी मोर्चे के सूत्रधार के रूप में कांग्रेस सामने आ सकती थी, लेकिन अब तो कांग्रेस खुद काफी कमजोर हो चुकी है। कांग्रेस इतनी ज्यादा कमजोर हो गई है कि विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय क्षत्रपों ने सत्ता पक्ष या विपक्ष की जगह हथिया ली है, जिनका राज्य स्तर पर तो प्रभाव है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का नेतृत्व करने की क्षमता फिलहाल नहीं है। इन क्षेत्रीय दलों में एक भी राष्ट्रीय स्तर का लोकप्रिय नेता अभी नहीं उभरा है। इसलिए अगर अन्य राज्यों में भाजपा का अपना जनाधार घटता भी है, तो विपक्षी विखराव के कारण भाजपा को ही फायदा होगा। इसके अलावा, मोदी सरकार विभिन्न क्षेत्रीय दलों के साथ अलग-अलग बातचीत कर महत्वपूर्ण आर्थिक सुधारों की दिशा में भी कदम उठाएगी। अब बहुत संभावना है कि शीघ्र ही जीएसटी बिल पारित हो जाए।
ऐसे में अगर राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी के खिलाफ कोई सशक्त विकल्प नहीं होगा, तो मोदी सरकार से मोहभंग होने के बाद भी जनता के पास कोई और विकल्प नहीं बचेगा। कांग्रेस अगर इसी तरह कमजोर होती रही और भाजपा का जनाधार निरंतर बढ़ता रहा, तो अखिल भारतीय पार्टी के रूप में भाजपा को वर्ष 2019 में लोकसभा चुनाव में बहुत मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ेगा। कांग्रेस के कमजोर होने से उसकी आंतरिक राजनीति पर भी असर पड़ेगा। ऐसा भी हो सकता है कि कांग्रेस के कई नेता टूटकर दूसरे दलों का रुख करें। इसके अलावा इन नतीजों के कारण राज्यसभा का चेहरा भी बदलेगा।
अगले वर्ष उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और गुजरात में चुनाव होने वाले हैं, जिसमें उत्तर प्रदेश का चुनाव सबसे महत्वपूर्ण है। भाजपा पूरी ताकत के साथ अगले चुनाव की तैयारी करेगी और उसकी पूरी कोशिश रहेगी कि उसके खिलाफ विपक्ष एकजुट न होने पाए।