बीते शनिवार कार चलाते हुए जब मैं ट्रैफिक सिग्नल पर रुका और एफएम रेडियो चलाया, तो ऑड-इवन स्कीम दोबारा चलाए जाने को लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का प्रचार आ रहा था। मुख्यमंत्री खबर दे रहे थे कि एक पखवाड़े के लिए फिर से यह योजना चलाई जा रही है। उन्होंने यह नहीं बताया कि इससे लोगों को क्या असुविधाएं हो सकती हैं। इसके बजाय ऑड-इवन की वापसी के कारण लोगों को क्यों खुश होना चाहिए, इसके तीन कारणों पर उन्होंने जोर दिया-सड़कें खाली होंगी और प्रदूषण घटेगा। और सबसे महत्वपूर्ण कि इस नवाचार की दोबारा सफलता के लिए लोगों का समर्थन जरूरी है, क्योंकि दुनिया ने देखा है कि दिल्ली के लोग अनुशासित हो सकते हैं। एक स्वघोषित अराजकतावादी के लिए अनुशासन इतना अहम हो गया?
प्रचार के भूखे एक व्यक्ति ने केजरीवाल पर तब जूता फेंक दिया, जब वह प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे। मीडिया से इस वार्ता में मुख्यमंत्री ने सम-विषम योजना का गुणगान करने के अलावा यह घोषणा भी की कि जल्द ही हर महीने पखवाड़े भर के लिए यह योजना चलाने की घोषणा हो सकती है। इसका मतलब यह कि दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र के कार मालिक महीने में छह-सात दिन अपनी कार बाहर नहीं निकाल सकेंगे। क्या इससे दिल्ली और आसपास के नागरिकों पर एक अव्यावहारिक विचार थोपने के केजरीवाल के अहं की संतुष्टि के सिवा और कोई उद्देश्य पूरा होगा? इससे प्रदूषण कितना कम होगा?
केजरीवाल का विचार बिल्कुल उसी तरह है, जैसे 14वीं सदी में मोहम्मद बिन तुगलक द्वारा तांबे का सिक्का चलाने का फैसला था। केजरीवाल का इरादा भले ही नेक हो, पर शहर की सड़कों पर वाहनों को न चलने देने से प्रदूषण नहीं घटेगा। मैं मोहम्मद बिन तुगलक से उनकी तुलना इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि ऐसा कोई आंकड़ा नहीं है कि विगत जनवरी में सम-विषम योजना के कारण प्रदूषण में कमी आई थी। इस योजना का उद्देश्य कारों की संख्या घटाना नहीं था। कार पुलिंग के जरिये लोगों को दोस्त बनाने में सक्षम करना भी इसका उद्देश्य नहीं था। सरकार का काम शासन चलाना है, समाज में दोस्ती बढ़ाना नहीं। सड़कों पर से वाहनों की संख्या कम करने के लिए पेशेवर कार्यस्थलों को आवासीय इलाकों के करीब लाना होगा।
भारत ने पूंजीवादी अर्थव्यवस्था अपनाई है, जिससे असमानता बढ़ी है। ऑटो उद्योग आर्थिक विकास का प्रमुख वाहक है। टोयोटा ने पहले ही घोषणा की है कि वह आगे निवेश करने से पहले हालात का निरीक्षण करेगी। हमारे पास ईंधन को लेकर कोई नीति नहीं है और अदालत ने यह फैसला दिया है कि 2000 सीसी के डीजल वाहनों का दिल्ली एनसीआर में पंजीकरण नहीं होगा। अन्य देशों में किसी को भी कार के लिए लाइसेंस और परमिट जारी करने से पहले सख्त परीक्षण जरूरी है। सड़कों पर से कारों को हटाने से पहले लोगों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था होनी चाहिए। दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन अपर्याप्त है। निजी कारों के खिलाफ कठोर नीति तभी उचित है, जब हमारे पास पर्याप्त बसें और मेट्रो हों। सभी सरकारों को मुंबई की लोकल ट्रेनों की तरह तेज और सस्ते वाहनों की तरफ बढ़ना होगा।
सम-विषम के दूसरे चरण का प्रचार करते हुए केजरीवाल तथ्यों के बजाय भावनाओं का सहारा ले रहे हैं। इस योजना से संबंधित नकारात्मक राय को कुछ सकारात्मक और ऐसी बातों के जरिये दबाया जा रहा है, जिसके समर्थन में पुष्ट आंकड़े नहीं हैं। केजरीवाल की बातें इस तथ्य को छिपाती हैं कि यह योजना किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सबसे विघटनकारी नीतिगत हस्तक्षेप है। दुनिया भर में जब भी नेताओं के पास अपनी बात को पुख्ता साबित करने के लिए तथ्यों की कमी पड़ती है, तो वे भावनाओं का सहारा लेते हैं।
जनवरी में हालांकि प्रदूषण स्थिर बना रहा और पहले के वर्षों की तुलना में ज्यादा भी हो सकता है, पर लोग मानते हैं कि सम-विषम योजना सफल रही। उन्होंने इस योजना के साथ सहयोग किया और कानून नहीं तोड़ा। योजना को सफल बनाने में लोगों का सहयोग अप्रत्याशित था, जिससे पता चलता है कि इस योजना ने लोगों की भावनाओं को छुआ है। केजरीवाल ने इस योजना को जिस रूप में पेश किया और इसमें नागरिकों को भागीदार बनाया, उसी कारण ऐसा संभव हुआ। उन्होंने लोगों को यकीन दिलाया था कि इसमें उन्हें कोई फायदा नहीं होगा, बल्कि सारे फायदे लोगों को होंगे। हालात ने भी इसमें भूमिका निभाई-दिल्ली में सर्दियां विषादपूर्ण होती हैं और सांस लेने में तकलीफ के कारण मानसिक रूप से लोगों को निराश करती हैं। पर इस बार ऐसा नहीं है, यह सांसों की तकलीफ का मौसम नहीं है। प्रदूषण का स्तर जनवरी की तरह नहीं है, इसलिए केजरीवाल ने मौजूदा प्रदूषण स्तर की बात नहीं की, बल्कि सम-विषम को सफल बनाने के लिए पुरानी स्मृतियों पर जोर दिया है। इसे लागू करने का अब जब कोई कारण नजर नहीं आएगा और लोग असुविधा महसूस करेंगे, तो वे इस योजना को खारिज भी कर दे सकते हैं। हो सकता है कि वे कानून न तोड़ें, पर इसे तोड़ने के लिए उपाय तलाशे जाएंगे। जिस व्यक्ति ने जूता फेंका, उसने आरोप लगाया ही कि सीएनजी स्टिकर अवैध तरीके से बेचे जा रहे थे और इसमें घोटाला हुआ है।
इन चुनौतियों के बावजूद केजरीवाल इसे फिर से लागू करने में यदि सक्षम होते हैं, तो यह योजना दिल्ली में तो स्थायित्व प्राप्त करेगी ही, अन्य शहरों में भी इसका प्रसार होगा। पर यदि यह योजना पिछली बार की तरह सफल नहीं होती, तो केजरीवाल की इस परिकल्पना का अंत हो जाएगा। सबसे बड़ी बात यह कि इस योजना की सफलता और विफलता ही सरकारी योजनाओं में लोगों की सहभागिता का भविष्य तय करेगी। सम-विषम योजना पर आक्रामक ढंग से अड़ते हुए, और प्रदूषण तथा यातायात पर नए ढंग से न सोचते हुए केजरीवाल ने जता दिया है कि इसे दोबारा लागू करने के पीछे राजनीतिक मंशा ही है, और कुछ नहीं।
-वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक