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मजदूरों के पैरोकार अब कहां हैं

सुधीर विद्यार्थी
Updated Fri, 08 Apr 2016 07:36 PM IST
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सुधीर विद्यार्थी
कार्ल मार्क्स ने जब यह कहा था कि 'दुनिया के मजदूरों एक हो' तब दुनिया आज की तरह ग्लोबल नहीं हुई थी। पर मार्क्स जैसे चिंतक को मजदूरों की शक्ति का पूरी तरह से एहसास था और वह यह भी जानते थे कि दुनिया भर में मजदूरों की स्थिति कमोबेश एक जैसी ही है और उन्हें अपने जीवन की बेहतरी की लड़ाई लड़ने के लिए एकजुट होना ही चाहिए। भारतीय उपमहाद्वीप में कार्ल मार्क्स के विचारों के सबसे बड़े पैरोकार भगत सिंह ने वर्ष 1929 में केंद्रीय असेंबली कही जाने वाली आज की संसद में अपनी क्रांतिकारी पार्टी के विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए बम और पर्चे फेंकते हुए फिर से मार्क्स के इस नारे को दोहराया था। उन्होंने 'इन्कलाब जिंदाबाद' और 'साम्राज्यवाद मुर्दाबाद' के उद्घोष के साथ मजदूर एकता और उनके संघर्ष को उपनिवेशवाद से लड़ने के लक्ष्य को उन कठिन क्षणों में भी विस्मृत नहीं किया था।


मार्क्स के चिंतन से जुड़कर ही भारतीय क्रांतिकारियों ने समाजवाद को तब अपना लक्ष्य घोषित किया था, जबकि उस समय तक कांग्रेस 'पूर्ण आजादी' के प्रस्ताव तक पहुंच भी नहीं पाई थी। भगतसिंह की शहादत के 15 वर्षों बाद हमारा देश स्वतंत्र हो गया। हमारे देश में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना 1925 में हो गई थी, जो अपने विचारों में मजदूरों की सबसे बड़ी हितैषी थी। कम्युनिस्ट एक समय मजदूर राज की बात सबसे आगे बढ़-चढ़कर कहते हुए मजदूरों के मोर्चों पर मजबूती से काम करते रहे। बाद में विभाजित होकर बनी कम्युनिस्ट पार्टियों के एजेंडे पर भी मजदूर यूनियनें निरंतर बनी रहीं। लेकिन मजदूरों के बीच वाम दलों की जिस तरह की कार्यप्रणाली थी अथवा कमोबेश अब तक बनी हुई है, वह मजदूरों की स्थिति और सोच में कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं कर पाई। मजदूरों के बीच वर्ग चेतना का विकास नहीं हो पाने के पीछे शायद भारतीय समाज में जाति की सच्चाई और धर्म की जकड़बंदी भी थी, जिसे प्रायः वाम आंदोलन से जुड़े लोग सिरे से नकारते रहे।


आखिर क्या कारण है कि जहां वाम आंदोलन मजदूरों की इन समस्याओं और जरूरतों की ओर से पूरी तरह विमुख बना रहा, वहीं छत्तीसगढ़ के मजदूर नेता (शहीद) शंकरगुहा नियोगी ने अपनी कार्यप्रणाली, दृष्टि और इच्छाशक्ति के बल पर हमें एक समय जो रास्ता सुझाया, वह मजदूर यूनियनों में काम करने वालों के लिए रोशनी का काम दे सकता है। नियोगी ठस मार्क्सवादी श्रमिक नेता नहीं थे। वह सिर्फ मजदूरों की हड़तालों तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि उनके हितैषी और अंतरंग साथी बनकर कार्य करना उन्होंने अपना लक्ष्य बनाया। ऐसे में मजदूरों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य तथा उनके भीतर सांस्कृतिक समझ पैदा करने के लिए वह खुद उनकी संस्कृतियों को जानने-समझने का जरूरी एजेंडा लेकर सामने आए।


नियोगी के कठिन प्रयासों के चलते जब मजदूरों की दिहाड़ी बढ़ी, तो कहीं वे शराब की लत में न डूब जाएं, इसके लिए वह उन्हें समझाते थे कि यदि वे शराब पिएंगे, तो जो पैसा बढ़ा है, वह वापस व्यापारियों की जेबों में चला जाएगा। इसलिए उनकी लड़ाई सिर्फ खदान के ठेकेदारों से ही नहीं होती थी, बल्कि वह शराब के ठेकेदारों के विरूद्ध भी मोर्चा लेते थे। यही नहीं, नियोगी ने मजदूरों के ही चंदे और उन्हीं के श्रम के बलबूते उनके लिए शहीद अस्पताल का निर्माण कराया। यह विचारणीय है कि 87 वर्ष पुराना कम्युनिस्ट आंदोलन अपने बीच एक नियोगी पैदा नहीं कर पाया।
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