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यह भी कोई देश है महराज

Fri, 04 Dec 2015 06:34 PM IST
सुदीप ठाकुर/अमर उजाला, दिल्ली
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मनमौजी पत्रकार और लेखक अनिल यादव ने पूर्वोत्तर की यात्रा के अपने संस्मरण पर एक बढ़िया किताब लिखी है, जिसका शीर्षक जाने क्यों इन दिनों खूब याद आ रहा है...वह भी कोई देस है महराज।
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यदि आपकी स्मृति धुंधली न पड़ी हो तो जरा इन पंक्तियों पर गौर करें...

''....एक समय था जब लोग कहते थे- पता नहीं पिछले जन्म में क्या पाप किया है हिंदुस्तान में पैदा हो गए, ये कोई देश है! ये कोई सरकार है! ये कोई लोग हैं! चलो छोड़ो, चले जाओ कहीं और। और लोग निकल पड़ते थे, कुछ वर्षों में हम ये भी देखते थे, उद्योग जगत के लोग कहते थे कि अब तो यहां व्यापार नहीं करना चाहिए, अब यहां नहीं रहना है। और ज्यादातर लोगों ने तो एक पैर बाहर भी रख दिया था। मैं इसके कारणों में नहीं जाता हूं। और न ही मैं कोई राजनीतिक टीका-टिप्पणी करना चाहता हूं। लेकिन यह धरती की सच्चाई है कि लोगों में एक निराशा थी, आक्रोश भी था। और मैं आज विश्वास से कह सकता हूं कि अलग अलग जीवन क्षेत्रों के गणमान्य लोग बड़े बड़े साइंटिस्ट क्यों न हो, विदेशों में ही कमाई क्यों न होती हो उससे कम कमाई होती हो तो भी आज भारत वापस आने के लिए उत्सुक हो रहे हैं, आनंदित हो रहे हैं।....''

कुछ याद आया! यही कहा था प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18 मई, 2015 को दक्षिण कोरिया की राजधानी सिओल में भारतवंशियों के बीच। (आप चाहें तो उनका पूरा भाषण यहां पढ़ सकते हैं क्लिक करें )
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मोदी ने यह भाषण प्रधानमंत्री बनने के करीब एक वर्ष बाद दिया था। वह किस देश की बात कर रहे थे? ऐसे कौन लोग थे, जो देश छोड़कर बाहर चले जाना चाहते थे? उनमें से कितने लोग आज लौट चुके हैं? या ऐसे कितने लोग विदेशों से अपनी गाढ़ी कमाई छोड़कर पिछले डेढ़ वर्ष में आ गए? क्या मोदी सिओल में उसी भारत के बारे में बात कर रहे थे, जिसका जिक्र आमिर खान ने अभी किया है? आमिर खान के मुताबिक देश में बढ़ती असहिष्णुता की वजह से उनकी पत्नी किरण ने उनसे पूछा था कि क्या उन्हें देश छोड़ देना चाहिए। असहिष्णुता पर बिल्कुल बात होनी चाहिए, लेकिन उनकी इस बात से सहमत नहीं हुआ जा सकता कि इस देश को छोड़ने के बारे में विचार किया जाए। अच्छी बात है कि खुद आमिर ने यह कहकर स्थिति साफ कर दी है कि वह भारत से कहीं नहीं जा रहे हैं। मगर उनके खिलाफ जिस तरह का अभियान छेड़ दिया गया उसमें असली मुद्दे नजरंदाज हो गए।

वास्तव में देश छोड़ने वाली बहस की शुरुआत तो खुद मोदी ने ही की थी। क्या वाकई डेढ़ वर्ष पहले तक यह देश रहने लायक नहीं था? प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी डेढ़ वर्ष के दौरान अमेरिका, कोरिया, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, चीन, जापान, मारीशस, फ्रांस, जर्मनी, श्रीलंका,संयुक्त अरब अमीरात और सिंगापुर सहित कुल तीस देशों की यात्रा कर चुके हैं और इनमें से आधा दर्जन से अधिक देशों में भारतवंशियों के बीच भाषण कर चुके हैं। वह अपने तकरीबन ऐसे हर भाषण में यही बताने की कोशिश करते रहे हैं, कि भारत अब वह नहीं रहा, जहां लोग नहीं रहना चाहते थे।

भारत से जाने वाले शुरुआती लोग गिरमिटिया थे, जिन्हें अंग्रेजों ने जबर्दस्ती गुलाम बनाकर अफ्रीका भेजा था। वह अपनी मर्जी से वहां नहीं गए थे। वहां अपनी मर्जी से जाने वाले गांधी थे, जिन्हें लेखक गिरिराज किशोर ने अपनी किताब में 'पहला गिरमिटया' बताया। पूरे बीस वर्ष रहने के बाद गांधी लौटे थे। वह यहां कोई कारोबार करने या पूंजी निवेश करने नहीं, बल्कि खुद का निवेश करने आए थे। संभवतः इस देश में इससे बड़ा कोई और निवेश याद भी नहीं आता। मोदी जिन निवेशकों को यहां आमंत्रित कर रहे हैं, क्या वह इस निवेश को समझ पाएंगे! मोदी के आमंत्रण में कारोबारी मुनाफे का एक तरह का आकर्षण जुड़ा हुआ है।

आजादी के बाद जो लोग देश से बाहर गए उसके पीछे आर्थिक कारण और उच्च शिक्षा व रोजगार की चिंता के साथ ही पश्चिम की शानदार जिंदगी का आकर्षण भी था। बेशक इनमें से अनेक लोगों ने दूसरे देशों में एक मुकाम भी हासिल किया है। लेकिन उनके जाने के पीछे ऐसी मंशा शायद ही रही हो कि यह देश रहने लायक नहीं है। और जो लोग ऐसा मानते हैं, उनसे यह क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने देश को बेहतर बनाने में क्या योगदान दिया?

1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण की प्रक्रिया शुरू होने के बाद देश से बाहर जाने की होड़ मच गई। अच्छे करियर और पैसे के लिए लोग वहां जा रहे हैं। इसमें देश की परिस्थितियों का खास लेना देना नहीं है। मोदी सरकार भी तो इसी आर्थिक नीति की पैरवी कर रही है, जिसने ढाई दशक में न जाने कितने लोगों को उनके जंगलों और जमीन से बेदखल कर दिया है। बहस इस पर क्यों नहीं होनी चाहिए कि पूंजी निवेश, शुद्ध मुनाफा और निजीकरण आधारित आर्थिक नीति ने देश की आबादी में आठ फीसदी की हिस्सेदारी करने वाले आदिवासियों के लिए जंगल में रहना भी मुश्किल कर दिया है। अंधाधुंध जंगलों की कटाई, खनन से विस्थापित हो रहे इन आदिवासियों को किस देश में चले जाना चाहिए? क्या यह बहस का मुद्दा नहीं होना चाहिए कि खुदकुशी करने वाले किसानों के पास किसी और देश में जाने का विकल्प नहीं था?
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