गुलजार
पर फिर अवॉर्ड बरसा है। फिर वही इंटरव्यू, फिर वही पूछताछ। फिर वही सवाल।
वही तस्वीरें। मैं बरसों से देख रहा हूं पिछले से थोड़ा और बड़ा अवॉर्ड बरस
जाता है। ये आदमी उसी सफेद कुर्त्ते में, वैसी ही आवाज में, उतनी ही तेजी
से चलते हुए, उतनी ही गर्मजोशी से माहौल को उसी महक से भरते हुए वैसा का
वैसा। एकदम कोरा। एकदम शुभ। एकदम पारदर्शी। एकदम आदमी।
याद है इक दिन.........
मेरी मेज पे बैठे - बैठे
सिगरेट की डिबिया पर तुमने
छोटे से इक पौधे का
एक स्केच बनाया था!
आकर देखो-
उस पौधे पर फूल आया है।
उस फूल को हर कोई देख तो नहीं सकता, मगर जिसे स्केच के भीतर जिंदा जिंदगी का पता हो, वह छू और महसूस भी कर सकता है।
इस
वक्त चुनाव चल रहे हैं। 'आंधी' की बात होनी चाहिए। रिश्तों को लेकर जैसी
गाली-बाजी चल रही है, उसमें सुचित्रा सेन और संजीव कुमार के किरदार फिर देख
ही लें। एक होटल का मैनेजर एक राजनेता की बेटी के जीवन में अपनी सरलता के
साथ आता है। राजनीतिक वारिस बनाने पर तुले पिता के विरोध के बावजूद शादी
होती है। लेकिन राजनीतिक विरासत का रिश्तों में हस्तक्षेप अंततः तीव्र तनाव
का एक बिंदु बना देता है। दोनों अलग हो जाते हैं। पति छाया से भी दूर चला
गया है।
बरसों बीत गए हैं। दोनों बहुत-बहुत दूर, अलग। वह एक बड़ी
राजनेता बन गई है। बालों की सफेदी के साथ प्रचार के सिलसिले में एक शहर में
आई है। जहां ठहराया गया है, उस होटल में अमावस हटती है और चांद निकल आता
है। होटल का मैनेजर अपनी स्मृतियों के साथ सामने है। एक शाम दोनों साथ-साथ
चांद देखते हैं।
प्रचार चरम पर है। और फिर एक दिन विपक्ष का 'रहस्य
खोलू' अभियान चलता है कि उस नेता के तो होटल मैनेजर से रिश्ते हैं। ये
छुप-छुप के मिलते हैं। राजनीति का पत्थर रिश्तों के माथे पर आकर लगता है।
अंततः बहते हुए खून पर रिश्तों को बचाने और राजनीति को तिलांजलि देने का
साहस आ खड़ा होता है। अंतिम सभा में वह अंदाज में कहती है, 'हां ये आदमी
मेरा पति है। हमारी बेटी भी है। हमने इस राजनीति की वजह से कितने पल खोए
हैं।'
राजनीति ने उनके जीवन को छीन लिया था और जब वह फिर हरा होने
को हुआ, तो उसे लांछित करने की होड़ लग गई। देश चुनूं या रिश्ता आप जानिए।
फिल्म के अंत में वह इसी एक मोड़ से चुनाव जीत जाती है। पर अब उसे रिश्तों
की कीमत पर राजनीति में नहीं जाना है। पति कहता है, अब मैं कहता हूं, 'तुम
जाओ, मैं साथ खड़ा हूं।'
एक सुंदर कविता की तरह आखिरी फ्रेम बनता है। और रिश्ता आसमान छू लेता है।
अभी
जब सियासत में यहां से वहां तक रिश्तों का 'ट्विटर' हुआ जा रहा है, किसी
को कायर कहने और खुद को शूरवीर बताने की आग लगी पड़ी है, तब फालके के लिए
दिल्ली आए गुलजार की 'आंधी' फिर देख लेनी चाहिए।
चुनाव हैं तो गुलजार कहते हैं-
फिर से बांटो ताश के पत्ते
फिर से कट फॉर सीट करो
रम्मी का एक खेल चला है पार्लियामेंट केसिनो में!
सियासत
इसी तरह चलती है। रिश्ते अपनी तरह चलते हैं। लेकिन सियासत में रिश्तों का
मोल-भाव करने वालों को क्या इसकी गहराई कभी पता नहीं चलती?
लोग अभी
प्रचार में पत्नी, बेटी, दोस्त, अंतरंग सहेली जैसे शब्दों का मोल-भाव के
हिसाब से बेतहाशा इस्तेमाल कर रहे हैं। इसमें ऐसी बनावट होती है कि भावनाओं
पर शुबहा पैदा होने लगता है। इसमें क्रांति का शब्द-शौर्य प्रस्तुत करने
की भी तरकीब निकाली जाती है। गोया यह प्रस्तुति न होकर सचमुच की क्रांति ही
हो। यह अलग किस्म की आंधी है।
बहरहाल, रिश्तों का लम्हा-लम्हा
बुनते गुलजार अब लिखने में ज्यादा वक्त बिताते हैं, फिल्म वाले उनके स्पर्श
में ऊर्जा अनुभव करते हैं इसलिए हर पंद्रह-पचास दिन में उनका जिक्र बना
रहता है। क्या संयोग है कि जिस 'नो मेन्स लैंड' से प्रेरित फिल्म गुलजार को
बनानी चाहिए थी, उससे प्रेरित 'क्या दिल्ली, क्या लाहौर' के पोस्टर को
आखिरकार 'गुलजार प्रेजेन्ट्स' लिखने का अवसर इसी शुक्रवार को मिला है।
क्या सियासत वाले इस तरह कह सकेंगे..............
तमाम सफहे किताबों के फड़फड़ाने लगे
हवा धकेल के दरवाजा आ गई घर को।
कभी हवा की तरह तुम भी आया-जाया करो।