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भारत की छवि की गलत व्याख्या

Tue, 17 Mar 2015 06:38 PM IST
सुरेंद्र कुमार
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बड़ी तादाद में भारतीय मानते हैं कि निर्भया के बलात्कारियों को बहुत पहले फांसी दे दी जानी चाहिए थी, क्योंकि यह 'रेयरेस्ट ऑफ द रेयर' मामला था। वहीं बीबीसी की लेसली उड्विन द्वारा तैयार डॉक्यूमेंट्री- इंडियाज डॉटर को लेकर हल्ला मचा रहे लोगों में से ज्यादातर लोगों ने तो यह फिल्म देखी तक नहीं है। ये लोग फिल्म के खिलाफ कोई वजनदार तर्क भी नहीं पेश कर पा रहे हैं, सिवाय इसके कि इससे भारत की छवि तार-तार होती है, और भारतीय महिलाओं की नकारात्मक तस्वीर उभरती है। मगर जो लोग वाकई इस फिल्म को देख चुके हैं, वह इसे विपरीत पाते हैं। ऐसे लोगों का मानना है कि इस खूबसूरत डॉक्यूमेंट्री को गहरी समझ और संवेदनशीलता के साथ बनाया गया है, और यह भारत की महिला को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करती है।
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हालांकि इस बहस से इतर यह तो माना ही जा सकता है कि यह डॉक्यूमेंट्री हमसे कुछ कड़े सवाल पूछती है और समाज को बदलने के लिए हमें झकझोरती भी है। क्या यह कम महत्वपूर्ण नहीं है? यहां एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या भारत की छवि वाकई इतनी नाजुक है, जो किसी एक फिल्म या किताब से खंडित हो जाए।

हम मिस्र, मेसोपोटामिया और चीनी सभ्यता की लीग में खुद को रखते हुए विश्व की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक होने का दावा करते हैं। हमारी यह सभ्यता पांच हजार वर्ष से ज्यादा पुरानी है। एमआईटी, हार्वर्ड, कैंम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालयों से पहले नालंदा विश्वविद्यालय दुनिया भर के सैकड़ों विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के आकर्षण का केंद्र था। आर्यभट्ट, वराहमिहिर और शून्य की खोज की बदौलत हम अपने समय से कहीं आगे थे। जब आदि शंकराचार्य परमात्मा और उसकी रचना के बीच के संबंधों से जुड़ी तत्वमीमांसीय पहेली सुलझा रहे थे, दुनिया के बहुत से हिस्सों में जंगलों में घूमते लाखों आदिम जन विधिवत भाषा में बात तक नहीं कर पाते थे। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना से दो हजार वर्ष पहले भगवान बुद्ध ने अहिंसा का बिगुल बजा दिया था। सम्राट अशोक ने खुद अपने पुत्र और पुत्री को शांति व अहिंसा के संदेश को फैलाने के लिए श्रीलंका और दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में भेजा था।
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सुदूर देशों से बड़ी तादाद में आक्रमणकारी सरपट घोड़ों पर सवार होकर सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारतवर्ष को लूटने आते रहते थे। भारत की समृद्धता का आलम यह था कि औरंगजेब के अलोकप्रिय शासन काल में भी वैश्विक व्यापार में भारत की 25 फीसदी हिस्सेदारी थी। शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद ने 1893 में ही पूरी दुनिया को बता दिया था कि भारत, पश्चिम को क्या दे सकता है। 20वीं सदी में भारत की भूमि को महात्मा गांधी जैसी शख्सियत का आशीर्वाद मिला, जिन्होंने अपने अहिंसक तौर-तरीकों से हमें आजादी दिलाने के लिए जरूरी नेतृत्व दिया। उनके विचारों ने मार्टिन लूथर किंग और नेलसन मंडेला जैसे वैश्विक नेताओं को भी प्रभावित किया। पंडित रवि शंकर के सितार से बहती धुन ने पूरी दुनिया के संगीत पर अमिट छाप छोड़ी है। युगों-युगों से हम बहुधर्मी, बहुनस्लीय और बहुभाषी समाज बने हुए हैं। तमाम तरह के शोरगुल और कभी-कभी अराजक तक दिखने वाला हमारा लोकतंत्र, कई देशों के लिए ईर्ष्या का सबब बना हुआ है। गोल्डमैन शैश की मानें, तो 2035 तक हमारी अर्थव्यवस्था इंग्लैंड और जापान को पीछे छोड़ सकती है। इतना ही नहीं, हम एकमात्र लोकतंत्र हैं, जिसने ग्राम पंचायत के प्रमुख के करीब तीस फीसदी पदों को केवल महिलाओं के लिए आरक्षित कर रखा है। साफ है कि गर्व करने के लिए हमारे पास काफी कुछ है। फिर आखिर क्या वजह हो सकती है कि हम हमेशा भारत की छवि के धूमिल होने को लेकर शंकित रहते हैं। दरअसल, भारत को लेकर ऊपर जो बातें कही गईं, वे सिक्के का केवल एक पहलू है, और हम में इतना साहस नहीं है कि हम इसके दूसरे पहलू को देख सकें।

दरअसल, दूसरा पहलू यह बताता है कि दुनिया के सबसे ज्यादा गरीब और अशिक्षित लोग भारत में हैं। यूनेस्को के मानव विकास सूचकांक में हमारी स्थिति उप-सहारा देशों जैसी है। आईआईटीशियनों ने बेशक अमेरिका में सिलिकॉन वैली बनाने में मदद पहुंचाई हो, मगर सच यह भी है कि ग्रामीण भारत में आज भी हजारों स्कूल ऐसे हैं, जहां छत, ब्लैकबोर्ड और शौचालय जैसी सुविधाएं तक नहीं हैं। खुले में शौच करने वालों में भारत दुनिया का अव्वल देश है। जनवरी की कड़ाके की सर्दी में अकेले दिल्ली में तकरीबन 50 हजार लोगों को रैन बसेरे की जरूरत पड़ती है। इनमें से सैकड़ों की ठंड से मौत भी हो जाती है। निजी आवास के मामले में मुंबई दुनिया के सबसे महंगे शहरों में जरूर है, मगर यहां धारावी की झुग्गियां भी हैं।

हम खुद को सहिष्णु समाज कहते हैं, मगर ट्रावनकोर में पचास वर्ष पहले निचली जाति की महिलाओं को अपने स्तनों को ढकने और बच्चों को दूध पिलाने के लिए भी कर देना पड़ता था। चार वर्गों में बंटे हिंदू समाज में सबसे निचली पायदान पर आने वाले शूद्रों को किस तरह मानवाधिकारों से वंचित किया जाता रहा है, उससे हर कोई वाकिफ है। हम मंदिरों में देवियों की पूजा करते हैं, पर हमारे यहां ऑनर किलिंग (सम्मान के नाम पर हत्या) भी होती है। महिला सुरक्षा की बात करें, तो दिल्ली तो देश की 'रेप कैपिटल' के तौर पर कुख्यात है। 2014 में कितनी दलित कन्याओं का बलात्कार कर उन्हें आम के पेड़ पर फांसी लटकाया गया, उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में क्या हुआ था, चर्चों पर लगातार हमले क्यों हो रहे हैं, धर्म परिवर्तन और लव जिहाद से जुड़े मामले आखिर हैं क्या? अगर ये सवाल हमें शर्मिंदा नहीं करते, तो महज एक डॉक्यूमेंट्री पर अपना रोष जताने का हमें कोई हक नहीं होना चाहिए।
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