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हाई-टेक भारतवंशियों को लुभा पाएंगे मोदी?

Sun, 27 Sep 2015 08:01 PM IST
रूपा सुब्रह्मण्या
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नरेंद्र मोदी एक बार फिर दौरे पर हैं। भारत के अनथक प्रधानमंत्री अब तक सत्ताईस देशों की यात्रा कर आए हैं, और फिलहाल वह संयुक्त राष्ट्र के दौरे पर हैं, जो प्रधानमंत्री बनने के बाद उनका दूसरा अमेरिका दौरा है। एक साल पहले अपनी पहली अमेरिका यात्रा में न्यूयॉर्क के मेडिसन स्कॉवयर में विशाल भारतीय समुदाय ने मोदी का भव्य स्वागत किया था। आज केलिफोर्निया में सैन जोस के सैप (एसएपी) सेंटर में भाषण देने जा रहे मोदी का भारी स्वागत होने की उम्मीद है। 18,500 आसन वाले उस सेंटर में मोदी को सुनने के लिए करीब 40,000 लोगों ने टिकटों के लिए आवेदन किए हैं।
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ऐसा लगता है कि अमेरिका में भारतवंशियों की जो विशाल आबादी है, उसका महत्व मोदी ने दूसरे भारतीय नेताओं से अधिक समझा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी की जीत में प्रवासी भारतीय उनके बड़े समर्थक थे। पिछले चुनाव के समय वे निजी क्षेत्र के मोटे वेतन वाली नौकरी से छुट्टी लेकर भारत आकर चुनाव अभियान में जुड़े थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने भी इन भारतवंशियों का शुक्रिया अदा किया।

मोदी की इस अमेरिका यात्रा की सबसे बड़ी उपलिब्ध सिलिकॉन वैली की यात्रा है-मोरारजी देसाई के 1978 में बर्कले आने के बाद से किसी भारतीय प्रधानमंत्री की सेनफ्रांसिस्को बे की यह पहली यात्रा है। भारत की सफलता में हाई टेक के भारी योगदान को देखते हुए इस वैली की अब तक हुई उपेक्षा आश्चर्यजनक है। लेकिन भारतवंशियों को आखिरकार वह मिल रहा है, जिनके वे हकदार हैं।
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सिलिकॉन वैली में मोदी सिस्को और एपल जैसी कंपनियों के अलावा फेसबुक, गूगल और टेस्ला के ऑफिस में जाएंगे और उनके कार्यकारियों से मिलेंगे। उम्मीद है कि मोदी उन सबको डिजिटल इंडिया का समर्थन करने में कायल कर पाएंगे, जिसे भारत के डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर को गति देने के लिए शुरू किया गया है। भारत में नवीकृत ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए भी मोदी उनका समर्थन चाहेंगे। पर मोदी का वास्तविक लक्ष्य अनिवासी भारतीयों को यह बताना है कि भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए भी वे अपना योगदान करें-जैसे अनिवासी चीनियों ने चीन की अर्थव्यवस्था की मजबूती में किया है। भारत सरकार के आधिकारिक आंकड़े के मुताबिक, जनवरी, 2015 तक दुनिया भर में 2,84,55024 भारतवंशी हैं। अकेले अमेरिका में 45 लाख भारतीय हैं।

कुछ भारतीय समझते हैं कि भारतवंशियों ने अपनी जन्मभूमि का परित्याग कर दिया है। पर सच इससे अलग है। इन अनिवासी भारतीयों का सबसे बड़ा योगदान वह रकम है, जो वह अपने देश में भेजते हैं। यह 70 अरब डॉलर सालाना है, जो भारत की जीडीपी का 3.5 फीसदी है। अपने देश की अर्थव्यवस्था में योगदान करते हुए भारतवंशियों को आसानी हो, मोदी ने यह कोशिश की है। मई, 2015 में नई दिल्ली ने प्रवासी भारतीयों द्वारा भारत में निवेश को भारत में रहने वाले लोगों द्वारा किए जाने वाले निवेश के समान करने का प्रस्ताव रखा-यानी प्रवासी भारतीय जब भारतीय मुद्रा वाले अपने खाते से निवेश करेंगे, तो वह सीधे विदेशी निवेश न होकर घरेलू निवेश माना जाएगा। मोदी बखूबी जानते हैं कि भारतवंशियों का भविष्य तो हाई-टेक कैंपस और सिलिकॉन वैली के स्टार्ट-अप समुदायों में ही है, जहां भारतीयों की भारी संख्या है। वर्ष 1980 से 1984 तक सिलिकॉन वैली में तीन फीसदी हाई-टेक स्टार्ट अप भारतीयों द्वारा नियंत्रित थे। वर्ष 1995-98 में यह आंकड़ा बढ़कर नौ प्रतिशत हो गया। वर्ष 2012 की एक रिपोर्ट भारतीयों की संख्या में आई बढ़ोतरी के बारे में बताती है। वर्ष 2006 से 2012 तक सिलिकॉन वैली के 43.9 फीसदी स्टार्ट अप कंपनियों के संस्थापक विदेशों में पैदा हुए थे। इसी से जुड़ा आंकड़ा है कि सिलिकॉन वैली में 14 प्रतिशत स्टार्ट-अप कंपनियों के संस्थापक भारतीय थे। भारत के संदर्भ में यह आंकड़ा बेहद प्रभावशाली इसलिए है कि अमेरिका में भारतीयों की आबादी एक प्रतिशत से भी कम है। भारत के तेजी से बढ़ते हाई-टेक क्षेत्र को सिलिकॉन वैली में भारतीयों की सफलता से, और वहां से भारत लौट गए उद्यमियों से भारी लाभ मिला है।

यह सब मोदी के लिए अच्छी खबर है, जो सिलिकॉन वैली में भारतीय उद्यमियों और नवाचार के बारे में बात करेंगे। खासकर वह 'इंडिया-यूएस स्टार्ट अप कनेक्ट' पर बात करेंगे। हाल में अमेरिकी वेंचर कैपिटल फर्मों ने भारतीय स्टार्ट-अप कंपनियों में निवेश करना शुरू किया है। पिछले साल फेसबुक ने बंगलूरू स्थित मोबाइल विकास स्टार्ट-अप लिट्ल आई लैब्स का अधिग्रहण किया।

भारतवंशियों के भारत से जुड़ा आर्थिक तार भारत में रकम भेजने या सिलिकॉन वैली तक सीमित नहीं है। पिछले तीन अवसरों पर भारत सरकार ने भारतवंशियों के लिए बांड्स जारी किए थे। प्रवासी भारतीयों ने 1991 में इनमें 1.6 अरब डॉलर, 1998 में 4.2 अरब डॉलर और 2000 में 5.5 अरब डॉलर का निवेश किया था। अपने प्रवासी नागरिकों की क्षमता का लाभ उठाने का सबसे प्रभावी उदाहरण इस्राइल है, जो 1951 से ही प्रवासी बांड जारी कर रहा है। इसका लाभ ज्यादा है, क्योंकि प्रवासी लोग जो रकम घर भेजते हैं, वह उनके परिवार की आय और उनकी खरीद क्षमता बढ़ाता है, जबकि बांड का उपयोग सरकार अपने हिसाब से कर सकती है।
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