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चिंता : फर्राटा भरती गाड़ियां सड़क किनारे खड़े आदमी और पैदल चलने वालों की तो शामत आई

सुधीर विद्यार्थी
Updated Sun, 13 Nov 2022 04:59 AM IST

सार

फर्राटा भरती गाड़ियां सड़क किनारे खड़े आदमी की चिंता नहीं करतीं। पैदल आदमी की जिंदगी चमकीली गाड़ियों की कृपा पर निर्भर है। उसने सड़क पार कर ली, तो समझो कि भवसागर पार कर लिया। वैसे भी नई सदी की सड़कें पैदल आदमी के लिए नहीं बनी हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला


फरमान जारी कर दिया गया है कि स्मार्ट शहरों-नगरों में अब कोई पैदल नहीं चलेगा। अपने दो पैरों से कदम-कदम रास्ता नापने वाले लोगों को अब अपराधी करार दिया जाएगा। कोई साइकिलधारी भी अब इन सड़कों पर दिखाई नहीं देगा। सबके पास अपनी महंगी, चमचमाती और फर्राटा भरती गाड़ियां होंगी। उन गाड़ियों के भीतर स्मार्ट लोग होंगे, जो पैदल या साइकिल से चलने वालों को हिकारत की नजरों से देखेंगे। स्मार्ट होना आदमी और आदमी में भेद करना सिखाता है। युवा पीढ़ी को इस मामले में ट्रेंड यानी प्रशिक्षित किया जा रहा है। सड़क के किनारे पैदल चलता आदमी बेचारा या फिर जानवर सरीखा है, जिसे किसी भी क्षण दुत्कारा या दूर हांका जा सकता है। 


पैदल चलने वालों से शहर की छवि छवि खराब होती है। ऐसे लोग शहरों के लिए प्रदूषण की मानिंद हैं। वे उस पार जाने की प्रतीक्षा में सड़क किनारे खड़े होकर  फर्राटा भरती गाड़ियों के सुगम आवागमन में बाधा उत्पन्न करते हैं। नई व्यवस्था में स्मार्ट मोटर गाड़ी से दबने या कुचल जाने का दोषी अब पैदल चलने वाला आदमी ही माना जाएगा। उसके पैदल चलने के अधिकार को अब निरस्त कर दिया गया है। पैदल चलता आदमी हर समय तनावग्रस्त रहता है, जबकि गाड़ी के भीतर बैठा स्मार्ट आदमी सब तरह के टेंशन (तनाव) से मुक्त होता है। 


फर्राटा भरती गाड़ियां सड़क के किनारे खड़े आदमी की चिंता नहीं करतीं। पैदल चलते आदमी की जिंदगी चमकीली गाड़ियों की कृपा पर निर्भर है। उसने सड़क पार कर ली, तो समझो कि भवसागर पार कर लिया। वैसे भी नई सदी की सड़कें पैदल आदमी के लिए नहीं बनी हैं। पैदल चलता आदमी फुरसतिया या फिर पूरी तरह निठल्ला होता है। उसके पास कभी कोई जरूरी काम नहीं होता। अगर जरूरी काम होता, तब क्या वह पैदल चलकर वक्त जाया करता? ऐसा आदमी समय की अहमियत नहीं समझता। 


उसका दो पैरों पर घिसटना फितूर है। ऐसा आदमी किसी भी समय वाहन की चपेट में आने के लिए उपलब्ध होता है। पैदल आदमी स्मार्ट शहर के नूरानी चेहरे पर बदनुमा दाग की तरह है। स्मार्ट सिटी में उसकी हाजिरी संगीन अपराध की तरह है। कवि नागार्जुन ने बहुत पहले कहा था, पैदल चलने वालों की तो शामत आई। आप पैदल चलने वालों में शुमार हैं, तो यह आपका दोष है, सरकार का नहीं। अगर आप पैदल चलते हैं और बरसात में चुपचाप सड़क किनारे से गुजर रहे हैं, तब अचानक तीव्र गति से कोई स्कार्पियो या मर्सिडीज आपके पास से गुजरेगी और उसमें बैठी एक खूबसूरत महिला तथा उसकी गोद में झबरे बालों वाला स्मार्ट डॉगी आपके भीतर कुत्ता होने का तेजी से एहसास जगा देगा। 


एकाएक आप उस ऊंची नस्ल वाले कुत्ते से बहुत नीचे हो जाएंगे। स्मार्ट गाड़ी उसी क्षण सड़क के गड्ढे में भरा पानी तेजी से आपके ऊपर उलीच देगी और आप ठगे-से रह जाएंगे। उस वक्त आप गंदे पानी से नहीं, बल्कि आम आदमी होने की कोफ्त से सराबोर होंगे। एयरकंडीशंड (वातानुकूलित) गाड़ियां आपकी और आपके मरने की चिंता नहीं करेंगी। उसके लिए आप आदमी नहीं, भुनगे हैं। आपको टक्कर मारकर अगर उसने हवाई उड़ान भर दी, तो आप सिवा देखते रहने या चिल्लाने के और कर भी क्या सकते हैं?


पैदल चलते आदमी की तरफ गाड़ी में बैठे आदमी का ध्यान तभी जाता है, जब किसी मोड़ पर उसे रास्ता पूछना होता है और फिर उसे हिकारत से देखता हुआ वह आगे बढ़ जाता है। वर्षों पहले जब लोग पैदल चलते हुए लंबी दूरियां तय करते थे, तब उनके प्रति लोगों में सम्मान का भाव रहता था। कड़ी धूप होती, तो उनसे ठहरने के लिए कहा जाता, पानी के लिए पूछा जाता और बिना जान-पहचान के भी दरयाफ्त करते कि उन्हें किस जगह जाना है। लेकिन स्मार्ट लोग अब बिना इधर-उधर देखे तेजी से दौड़ रहे हैं। उन्हें दूर कहीं जाना है, जहां आम आदमी की नजर भी नहीं पहुंचती। पैदल चलता आदमी अब हीनता बोध से घिरा है। वह हैरत भरी नजरों से तेजी से भागती दुनिया को देख रहा है। आधुनिक सभ्यता और तरक्की ने उसे निम्न श्रेणी का नागरिक बना दिया है। राजेश जोशी की कविता में भी पैदल चलता आदमी अब कोई सम्मानजनक दृश्य नहीं रहा।

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