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आहार : भोजन की बर्बादी की चिंता कोई आज की नहीं, आदिकाल से यह विचार का मुद्दा

डॉ. विवेक एस अग्रवाल Published by: शिव शुक्ला Updated Thu, 26 Jun 2025 07:30 AM IST

सार

भोजन की बर्बादी की चिंता आदिकाल से चली आ रही है। महाभारत से लेकर बाइबिल और कुरान तक में इसका जिक्र है।
 
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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : istock


दुर्भाग्यवश हम स्वयं से अतिरिक्त विचार ही नहीं रखते और मानते हैं कि मात्र हमारे संवेदनशील या उत्तरदायी होने से क्या प्रभाव पड़ेगा। यथार्थ यह है कि हर कण महत्वपूर्ण होता है और कण-कण जुटकर किसी की थाली का बंदोबस्त होता है।


ऐसा नहीं है कि भोजन की बर्बादी को लेकर चिंता आज ही की जा रही है, अपितु यह विषय आदिकाल से विचारणीय रहा है। यदि हम कुरुक्षेत्र में लड़े गए महाभारत युद्ध का पुनरावलोकन करें, तो भोजन से जुड़ा एक रोचक प्रसंग मिलता है। युद्ध के दौरान भी खाद्य बर्बादी रोकने की बड़ी मिसाल कायम की गई थी। जैसा महाभारत में उद्धृत है कि जब उडुपी के राजा ने दोनों पक्षों की तरफ न रहकर अपने को तटस्थ रखने का निर्णय लिया, तो उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से अपनी भूमिका के बारे में आदेश देने के लिए कहा। निर्णय हुआ कि युद्ध के दौरान भोजन की तमाम व्यवस्था उडुपी राजा द्वारा ही की जाएगी। उस वक्त अहम प्रश्न यह था कि कितने लोगों के लिए भोजन तैयार किया जाए, क्योंकि युद्ध में तो हर दिन कई लोग मृत्यु का ग्रास बन जाते थे। साथ ही, ‘अन्न ही ब्रह्म है’ अवधारणा के साथ एक कण भी बर्बाद नहीं होना चाहिए था।


इस संख्या की गणना और निर्धारण करने के लिए भगवान कृष्ण ने उपाय स्वरूप युद्ध के पूरे 18 दिनों तक मूंगफली खाने का निर्णय किया, यह उडुपी राजा के लिए गणना का माध्यम बना। उडुपी राजा द्वारा प्रतिदिन रात्रि में मूंगफली के छिलकों की गणना कर एक हजार से गुणा कर आगामी दिन संभावित मृत सैनिकों की संख्या का आकलन किया जाता था और उसी अनुरूप भोजन एवं पानी की व्यवस्था की जाती थी। परिणामस्वरूप, इस संपूर्ण युद्ध में जहां सभी सैनिकों के लिए, चाहे वे कौरव हों या पांडव, पर्याप्त मात्रा में भोजन एवं जल उपलब्ध रहा और भोजन का एक भी कण बर्बाद नहीं हुआ। यह इस तथ्य का द्योतक है कि हजारों वर्ष पूर्व महाभारत के युद्ध में भी भोजन को बचाने को कितनी महत्ता प्रदान की गई थी। संभवतया कुरुक्षेत्र में किए गए व्यवस्थित और उपयुक्त प्रबंधन के रहते ही उडुपी और व्यंजन पर्याय बन गए। लेकिन दुर्भाग्यवश, वर्तमान में सामान्य परिस्थितियों में भी स्थिर गणना होने के बावजूद भोजन की बर्बादी सामान्य प्रक्रिया हो गई है।

धर्म कोई भी हो, भोजन के अपव्यय के प्रति सभी एकमत हैं और बर्बादी की वर्जना को धार्मिक अवहेलना से संबद्ध करते हुए बचाव एवं संयमित उपयोग की सलाह दी गई है। सनातन धर्म जहां अन्न ही ब्रह्म के जरिये सीधे-सीधे अन्न को ईश्वर स्वरूप करार देता है, तो जैन मत अपरिग्रह के सिद्धांत से आवश्यकतानुसार उपभोग का उल्लेख करता है। सिख मत में भोजन आध्यात्मिक जीवन का हिस्सा है। जैसा कि गुरु अमरदास लिखते हैं, ‘निर्माता ने सृष्टि बनाई; निर्माता इसे देखता है, और इसे सांस और पोषण के साथ आशीर्वाद देता है। अतः इसे बर्बाद करना अर्थात सृष्टि के निर्माता का अपमान करना है (एसजीजीएस, 1055)।’


इसी प्रकार इस्लाम में कुरान की आयतों और पैगंबर की शिक्षाओं में भी भोजन एवं खाद्यान्न बर्बादी के बारे में उल्लेख मिलता है। कुरान में 6:141 एवं 5:87 पर उपभोग की अति के दुष्परिणाम से आगाह करते हुए मौसम के अनुसार सेवन एवं उपज के प्रति कृतज्ञता का भाव रखने की सीख दी गई है। बाइबिल भी मानव को उत्तरदायी व्यवहार की शिक्षा देते हुए समस्त प्राकृतिक संसाधनों की देखभाल और संरक्षण का संदेश देती है। ईसाई धर्म के कुछ संप्रदायों में भोजन की बर्बादी को दूसरों के अधिकार छीनने के समकक्ष मानते हुए इस सम्मत जीवनशैली अपनाने पर जोर दिया है। सैद्धांतिक रूप से कोई भी भोजन की बर्बादी की न तो वकालत करता है, न ही कोई तर्क प्रस्तुत करता है, लेकिन व्यावहारिक रूप से आचरण पूर्णतया भिन्न होता है। खाद्य सुरक्षा के लिए आवश्यक है कि ‘मनसा वाचा कर्मणा यः समक्रीयते’ की अनुपालना करते हुए हर प्रकार से अन्न को देवतुल्य मानते हुए इसके संरक्षण में प्रत्यक्ष भागीदार बनें।
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