किसी जेन गुरु से कई साधक ध्यान-साधना सीख रहे थे। ध्यान, व्यावहारिक जीवन में संयम-नियम साधकों को स्वस्थ-पुष्ट बनाए रखते थे। उन्हीं साधकों मे एक भिक्षुणी थी, ऐशुन। सादा वेश-भूषा और सिर घुटा होने के बाद भी वह बहुत सुंदर थी। अनेक भिक्षु उससे प्रेम करने लगे, पर कोई कहने का साहस नहीं जुटा पाता। आखिरकार एक ने ऐशुन को प्रेम-पत्र लिखा और एकांत में मिलने का निवेदन किया।
ऐशुन ने पत्र का उत्तर नहीं दिया। हालांकि वह पहचान चुकी थी कि पत्र किसने लिखा था। अगले दिन जेन गुरु ने भिक्षु समूह को प्रवचन दिया। प्रवचन की समाप्ति पर ऐशुन उठी और प्रेम-पत्र देनेवाले भिक्षु को संबोधित करते हुए बोली, यदि तुम सच में मुझसे प्रेम करते हो, तो आओ और मुझे आलिंगनबद्ध कर लो। लेकिन वह भिक्षु उठकर आगे आना तो दूर, जहां बैठा था, वहां से भी पीछे हट गया।
कुछ समय बाद ऐशुन ने देहत्याग करने का निश्चय कर लिया। तब उसकी उम्र चालीस वर्ष के आसपास हो गई थी। उसने कुछ भिक्षुओं से कहा कि वे मठ के प्रांगण में लकड़ियों का ढेर जमा कर दें। उस भिक्षु ने भी लकड़ियां जमा कीं, जिसने पहले भिक्षुणी को प्रेम-पत्र लिखा था। लकड़ियां जमा हुईं और चिता सजा दी गई। ऐशुन के चिता पर बैठने के बाद उसमें अग्नि भी प्रज्वलित कर दी गई।
एक भिक्षु ने चिल्लाकर पूछा, हे भिक्षुणी! क्या तुम्हें आंच लग रही है? ऐशुन ने कहा, तुम जैसे मूर्ख ही ऐसी बातों की चिंता करते हैं। ऐशुन का इतना कहना था कि उस भिक्षु ने छलांग लगा दी। चिता धधकने के साथ उसने भी ऐशुन के साथ प्राण त्याग दिए। प्रणय निवेदन करने वाला भिक्षु अब भी मुंह लटकाए चिता के पास खड़ा था।