लेकिन जलवायु की तुलना में जनसांख्यिकी को ज्यादा गंभीरता से देखने की वजह है, क्योंकि पिछले 15 वर्षों में जलवायु परिवर्तन की कुछ सबसे खराब स्थिति की आशंका पहले की तुलना में कम हो गई है। साथ ही, विभिन्न ताकतों, विशेष रूप से कोविड संकट ने जन्म दर को तेजी से कम किया है, जिससे बुढ़ापे का युग तेजी से बढ़ रहा है।
जलवायु परिवर्तन का असर दुनिया भर में है। पोस्टकार्ड्स फ्रॉम ए वर्ल्ड ऑन फायर में अलग-अलग देशों की 193 कहानियां बताती हैं कि फिजी में मरती प्रवाल भित्तियों से लेकर मोरक्को के नखलिस्तान तक जलवायु परिवर्तन कैसा असर डाल रहा है। अमेरिका के 45वें उप राष्ट्रपति अल गोरे को बाइडन सरकार में आशावाद के कारण दिखे, तो इसकी वजह यही है कि बाइडन ने जलवायु परिवर्तन से जुड़ी उस घोषणा का समर्थन किया, जिससे ट्रंप ने हाथ खींच लिया था। इसका मतलब यह नहीं है कि आलोचनाएं नहीं हुई हैं। उदाहरण के लिए, चार्ल्स हार्वे और कर्ट हाउस का तर्क है कि जलवायु कैप्चर तकनीक के लिए सब्सिडी अंततः बेकार साबित होगी।
इस बीच बदतर जलवायु जोखिम मापने का नक्शा भी जारी हुआ है, जिसमें किसी एक देश का चयन कर उसके जलवायु जोखिमों का विश्लेषण किया जाता है। अमेरिका के मामले में विशेषज्ञों की मदद से तैयार नक्शे बताते हैं कि कहां अत्यधिक गर्मी सबसे ज्यादा मौतों का कारण बन रही है। हालांकि इस दिशा में उम्मीदें भी पैदा हुई हैं। मसलन, ऑस्ट्रेलिया ने रूफटॉप सोलर के जरिये रास्ता दिखाया है और कार्यालयों में छोटे-छोटे बदलाव उत्सर्जन में कटौती का अच्छा तरीका साबित हो सकता है। इसके विपरीत, चीन में कम्युनिस्ट सरकार के कुख्यात सामाजिक-आर्थिक कार्यक्रम 'ग्रेट लीप फॉरवर्ड' के बाद पहली बार वहां की आबादी में आई गिरावट जनसंख्या के जोखिम के बारे में बताती है। वहां आबादी में गिरावट की संभावना लंबे समय से थी, पर 2030 के दशक से पहले ऐसी स्थिति की उम्मीद नहीं की जा रही थी। वर्ष 2022 में चीन में जन्म दर सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है।
इसका मतलब यह है कि एक महाशक्ति की तरह उभरता चीन अंधकारमय भविष्य की तरफ भी बढ़ रहा है, जहां वह अमीर बनने से पहले ही बूढ़ा और ठहराव का शिकार हो जाएगा। इस बीच उसकी छाया अब अधिकांश अमीर और कई मध्यम आय वाले देशों पर भी पड़ रही है—यानी सामान्य कठिनाइयों का बढ़ता खतरा, नवाचार और गतिशीलता की हानि, सेवानिवृत्त लोगों की बढ़ती आबादी और भारी बोझ के तले दबे युवाओं के बीच निरर्थक संघर्ष। इमैनुएल मैक्रों की सेवानिवृत्ति की आयु 62 से बढ़ाकर 64 करने की योजना पर फ्रांस में इस सप्ताह हुआ व्यापक विरोध भविष्य की झलक देता है। इसलिए आबादी में गिरावट के इस युग में कुछ नियमों पर विचार करना जरूरी है। पहला नियम यह कि समृद्ध देशों को बुजुर्गों से युवाओं तक पुनर्वितरण की जरूरत होगी।
हाल के दशकों में हमने देखा है कि कई मामलों में, चाहे वह वित्तीय संकट के तुरंत बाद आर्थिक घाटे में कमी करने की जल्दी रही हो या चीन के साथ मुक्त व्यापार के प्रभावों के बारे में अविवेकी आशावाद तक, नीति नियंता गलत साबित हुए हैं। एक बुढ़ाती दुनिया में वृद्धावस्था के अधिकारों को सुधारने की इच्छा पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो जाएगी-लंबे समय से बचत का उपयोग युवाओं को अपना परिवार, अपना व्यवसाय शुरू करने या अपना घर खरीदने में आसानी के लिए किया जाता रहा है। और जो देश इस हस्तांतरण को सफलतापूर्वक करने का रास्ता खोज लेते हैं, वे उन देशों से बहुत आगे निकल जाएंगे, जो बुढ़ापे की दुनिया में डूब जाते हैं।
दूसरा नियम यह कि नवाचार पर्याप्त नहीं है, कार्यान्वयन और नवाचार को अपनाने की चुनौती ज्यादा बड़ी होगी। यदि आप बुढ़ाती हुई दुनिया में विकास चाहते हैं, तो तकनीकी सफलताओं की जरूरत है। लेकिन जैसा कि अर्थशास्त्री एली डोरैडो ने हाल के एक लेख में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के प्रभावों के बारे में बताया कि बड़ी बाधाएं हमेशा आविष्कार को लेकर ही नहीं होती हैं: वे परीक्षण, बुनियादी ढांचे, परिनियोजन, नियामक बाधाओं में होती हैं। और चूंकि बुजुर्गों का समाज अपने पुराने रवैये के लिए नवाचारों को छोड़ सकता है, इसलिए उन बाधाओं को दूर करना नवप्रवर्तकों की प्रमुख चुनौती बन सकता है।
तीसरा नियम यह कि जनसंख्या सीमा के खिलाफ जमीनी संघर्ष चलेगा। रूस-यूक्रेन युद्ध में इसे पहले से ही देखा जा रहा है। पुतिन की लामबंदी के प्रयास वैसे ठोस नहीं हैं, जो रूस की बड़ी आबादी के युवा होने पर होती। यदि यह युद्ध वर्षों तक चलता है तो रूस से भी कम जन्मदर वाले यूक्रेन में जनसांख्यिकी का संकट गहरा जाएगा। यही स्थिति ताइवान और अन्य देशों की भी होगी। चौथा नियम यह कि बुजुर्गों के साम्राज्य में थोड़ी ज्यादा जवानी और ऊर्जा बहुत कारगर होगी और यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सच है। जो देश अपनी जन्मदर को प्रतिस्थापन (रिप्लेसमेंट) स्तर के करीब रखने या बढ़ाने का प्रबंधन करते हैं, उन्हें दक्षिण कोरिया की तरह आधे-प्रतिस्थापन-स्तर की उर्वरता वाले देशों पर दीर्घकालिक बढ़त मिलेगी। और यह समाजों के भीतर भी सच है।
पांचवां नियम यह है कि अफ्रीकी प्रवासी दुनिया को नया आकार देंगे। अमीर और मध्यम आय वाले देशों में तेजी से बुढ़ापा आता है, पर महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि अफ्रीका की जनसंख्या वर्ष 2050 में 2.5 अरब और वर्ष 2100 तक चार अरब तक पहुंचने वाली है। इस आबादी के एक अंश का भी आवागमन शायद 21वीं सदी का सबसे महत्वपूर्ण वैश्विक परिवर्तन होगा। एक तरफ जनसंख्या में बढ़ोतरी तथा दूसरी ओर अस्थिरता एवं गिरावट के बीच संतुलन यह तय करने में मदद करेगा कि जनसांख्यिकीय गिरावट पुनरोद्धार करेगी या फिर पतन होगा।