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बदल जाएगी विज्ञापन की दुनिया

Mon, 19 Nov 2012 03:51 PM IST
कुमार विजय
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देश के चार महानगरों में विगत एक नवंबर से टेलीविजन के लिए डिजिटल एड्रेसेबल सिस्टम, डीएएस, शुरू हो गया। आने वाले दिनों में चरणबद्ध तरीके से इसे पूरे देश में लागू करने की योजना है। सरकार इस बात पर जोर दे रही है कि 2014 तक पूरे देश में डीएएस शुरू हो जाना चाहिए। इसकी शुरुआत हो जाने के बाद टेलीविजन में गुणात्मक बदलाव की अपेक्षा की जा रही है, जो अस्वाभाविक नहीं है।
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उम्मीद यह भी की जा रही है कि डीएएस के शुरू हो जाने से टीवी को विज्ञापन भी आज की तुलना में बहुत अधिक मिलने लगेंगे। हमारे यहां टेलीविजन की कहानी बहुत पुरानी नहीं है। बीती सदी के 80 के दशक की शुरुआत में टेलीविजन का चलन जोर पकड़ने लगा था।

खासकर एशियाड की मेजबानी के दौरान देश में टेलीविजन का प्रसार तेजी से बढ़ा। लेकिन तब दूरदर्शन के केवल दो चैनल ही थे और विज्ञापन की दुनिया में प्रिंट मीडिया का ही वर्चस्व था। लेकिन उसके एक दशक बाद से ही टेलीविजन का दबदबा बहुत तेजी से बढ़ने लगा।
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आज देश में पंजीकृत तौर पर आठ सौ से भी अधिक चैनल हैं। लेकिन केबल नेटवर्क के जरिये सौ से सवा सौ चैनल ही देखे जा सकते हैं। डीएएस का लाभ यह होगा कि इसके जरिये उपभोक्ता नौ सौ से एक हजार तक चैनल देख पाएंगे। शुरुआती दौर में हालांकि चार महानगरों के दर्शक भी दो सौ से अधिक चैनल शायद ही देख पाएं, लेकिन बाद में इसकी संख्या बढ़ेगी।

चैनलों की संख्या में बढ़ोतरी के अलावा डीएएस के कारण तसवीरों की गुणवत्ता भी सुधर जाएगी, जिसका सकारात्मक प्रभाव टेलीविजन पर दिखने वाले विज्ञापन पर पड़ेगा। अभी हमारे देश में टेलीविजन पर विज्ञापन का कारोबार 11,500 करोड़ रुपये का है, जो पिछले साल की तुलना में 12 फीसदी अधिक है।

एक आंकड़े के मुताबिक, 2016 तक भारत के मनोरंजन और मीडिया क्षेत्र का वजूद 1,75,000 करोड़ रुपये से अधिक का होगा। टीवी और प्रिंट मीडिया का आज भी मनोरंजन और मीडिया उद्योग में प्रभुत्व कायम है। इंटरनेट एक्सेस और गेमिंग से बीते साल 14 फीसदी राजस्व की प्राप्ति हुई, जो कि 2010 में 11 फीसदी था।

दरअसल राजस्व के मामले में टेलीविजन सबसे आगे है, जिसकी सालाना विकास दर 16 प्रतिशत है। भारत का मनोरंजन और मीडिया बाजार दुनिया का 14वां सबसे बड़ा बाजार है। हमारे देश में अभी सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का 0.3 या 0.4 फीसदी ही विज्ञापन पर खर्च किया जाता है। जबकि विकसित देश अपने जीडीपी का 1.2 से 1.45 फीसदी तक विज्ञापन पर खर्च करते हैं। चूंकि भारत दुनिया के शीर्ष पांच उभरते बाजारों में एक है, ऐसे में आने वाले दौर में विज्ञापन, मनोरंजन और मीडिया पर उपभोक्ता खर्च बढ़ना तय है।

अभी भारतीय कंपनियां विज्ञापन पर अपने राजस्व का दो से चार फीसदी ही खर्च करती हैं। आने वाले वर्षों में यह खर्च स्वाभाविक तौर पर बढ़ेगा। वस्तुतः विज्ञापन की दुनिया हमेशा अति गतिशील, क्रियाशील और सदा विस्तार देने वाली रही है। चूंकि हमारा आर्थिक विकास संतोषजनक है, विकास दर में दूसरे देशों की तुलना में बहुत गिरावट नहीं आई है और युवा आबादी भी बहुमत में है, इसलिए कंपनियां इस वर्ग को अपने उत्पादों की ओर आकर्षित करने के लिए विज्ञापन का सहारा लेंगी ही। हकीकत यह है कि केवल भारत में नहीं, पूरी दुनिया में विज्ञापन युवा पीढ़ी को केंद्र में रखकर ही तैयार किए जाते हैं।

एक रिपोर्ट बताती है कि 2016 में अपने यहां विज्ञापन की दुनिया में टेलीविजन की भागीदारी 43 फीसदी और प्रिंट मीडिया की हिस्सेदारी 41 प्रतिशत होगी। जाहिर है, विज्ञापन के क्षेत्र में अगर गंभीरता से काम किया जाए, तो इस उद्योग को तो लाभ होगा ही, लोगों को बड़े पैमाने पर रोजगार का अवसर भी उपलब्ध होगा।

जिस ज्ञान आधरित अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने का लक्ष्य है, उसमें मीडिया काफी मददगार साबित हो सकता है, जिसमें, जाहिर तौर पर इंटरनेट की भूमिका भी अहम है। ऐसे में सरकार की तरफ से थोड़ी-सी भी गंभीर पहल देश में सुनहरे भविष्य के द्वार खोल सकती है।
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