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बिहार चुनाव के केंद्र में महिलाएं: इस बार भी आधी आबादी का रुख अहम; सभी 243 सीटों पर निर्णायक भूमिका के आसार

केएस तोमर
Updated Thu, 23 Oct 2025 05:19 AM IST

सार

बिहार में महिलाएं एक दशक से राज्य की राजनीति को आकार देती आई हैं, देखना होगा कि इस बार वे किस पर भरोसा करती हैं। 
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मतदान के लिए खड़ी महिला मतदाता। (फाइल) - फोटो : अमर उजाला / एजेंसी


सत्ता विरोधी लहर के बावजूद महिलाएं नीतीश पर भरोसा जताती रही हैं, लेकिन इस बार हो सकता है कि महिलाएं उन्हें अपना एकमात्र संरक्षक न मानें। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत बिहार की 75 लाख महिलाओं के खाते में दस-दस हजार रुपये भेजने की घोषणा इसका संकेत है कि भाजपा नीतीश कुमार के महिला वोट बैंक को अपने पाले में करना चाहती है। हालांकि, योजना मुख्यमंत्री के नाम पर है, लेकिन इसका अनावरण मोदी ने दिल्ली से किया, जिससे बिहार के विकास की कहानी पर अपनी छाप छोड़ने के भाजपा के दृढ़ संकल्प का पता चलता है।


बिहार में करीब 48 फीसदी महिला मतदाता हैं। 2020 के चुनाव के बाद हुए सर्वेक्षणों से पता चला है कि 40 फीसदी युवा महिलाओं (18-29 वर्ष) ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) को वोट दिया, जबकि पुरुषों के लिए यह आंकड़ा 33 फीसदी था, जिससे नीतीश कुमार बहुत कम अंतर से चुनाव जीत पाए।


भाजपा का महिला-केंद्रित अभियान (मुफ्त एलपीजी रिफिल, जन-धन खाते और अब सीधे नकद हस्तांतरण) मोदी को सच्चे हितैषी के रूप में पेश करना चाहता है। पूरे भारत में 11.3 करोड़ से ज्यादा महिलाओं को विभिन्न राज्य और केंद्रीय योजनाओं के तहत नियमित रूप से एक से ढाई हजार रुपये मासिक तक मिल रहे हैं। बिहार की नवीनतम घोषणा कल्याण की इसी राष्ट्रव्यापी राजनीतिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा है-जो संरचनात्मक सुधारों के बजाय राजकोषीय निर्भरता के जरिये सशक्तीकरण को पुनर्परिभाषित करती है।


नीतीश कुमार की कल्याणकारी नीतियां, जिनकी महिलाएं मुक्त कंठ से प्रशंसा करती आई हैं, जैसे-शराबबंदी, अब कमजोर हो रही है, क्योंकि शराब की तस्करी बढ़ गई है, तो महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध और स्थानीय स्वास्थ्य ढांचे के पतन से भी उनका मोहभंग हो रहा है। कई लोगों को भाजपा का सीधा लाभ पहुंचाने और मजबूत केंद्रीय योजनाओं का वादा मुख्यमंत्री के बयानों से ज्यादा विश्वसनीय लगता है।


भाजपा स्पष्ट रणनीति के साथ नीतीश की साख का फायदा उठाकर राज्य में खुद को मजबूत करने पर जोर दे रही है। पिछले चुनाव में जदयू 43 सीटों पर सिमट गया, जबकि भाजपा ने 74 सीटें जीती थीं। भाजपा का मौजूदा अभियान पूरी तरह से मोदी पर केंद्रित है और अगर पार्टी इस बार सौ सीटों के आसपास पहुंचती है, तो नीतीश को आसानी से किनारे कर युवा चेहरे को मुख्यमंत्री के रूप में आगे बढ़ा सकती है। यह पैटर्न महाराष्ट्र जैसे अन्य राज्यों में भी दिखाई दे चुका है, जहां क्षेत्रीय सहयोगियों को उनकी उपयोगिता समाप्त  होने के बाद या तो समाहित कर लिया गया या हाशिये पर डाल दिया गया। बिहार में भी ‘स्थिर शासन’ के बहाने इसी तरह का पुनर्गठन देखने को मिल सकता है।


करीब दो दशकों से सत्ता पर काबिज नीतीश कुमार की छवि को रोजगार और पलायन के अलावा सत्ता विरोधी रुझान जैसे मुद्दे कमजोर कर रहे हैं। महागठबंधन उनकी सेहत का हवाला देकर लाभ उठाना चाहता है। इसके अलावा, बिहार में जाति की राजनीति हावी रहती है। अगड़ा, पिछड़ा, अति-पिछड़ा, यादव-मुस्लिम समीकरण आदि मायने रखते हैं, पर पार्टियों की संगठनात्मक स्थिति भी चुनावी लहर को अपनी ओर मोड़ने में अहम भूमिका निभाती है। महागठबंधन में तालमेल का अभाव दिख रहा है, जबकि राजग में अपेक्षाकृत कलह कम है। भाजपा का कुशल बूथ प्रबंधन और मोदी की लोकप्रियता सत्ता विरोधी भावना को कम कर सकती है। फिर भी, महागठबंधन यदि लंबे गतिरोध से निराश महिलाओं और युवाओं को अपने पाले में करने में सफल हो जाता है, तो नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं।
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कुल मिलाकर, इस बार के चुनाव, 2020 से अलग होंगे। महिलाओं के उत्थान के लिए काम करने वाले नीतीश कुमार की छवि अब मोदी के राष्ट्रीय प्रदाता की छवि से प्रतिस्पर्धा कर रही है। भाजपा का इरादा केवल सत्ता में भागीदार बनने का नहीं, बल्कि प्रभुत्व स्थापित करने का है। नीतीश का अस्तित्व उनकी व्यक्तिगत अपील से कम और बिखरे हुए विपक्ष के गणित पर ज्यादा निर्भर करता है। महिलाओं के लिए यह चुनाव यह निर्धारित करेगा कि कल्याण के माध्यम से सशक्तीकरण वास्तविक स्वायत्तता में तब्दील होता है या सिर्फ चुनावी सुविधा बनकर रह जाता है। उनका फैसला न केवल बिहार की अगली सरकार का निर्धारण करेगा, बल्कि भारत में लैंगिक राजनीति की बदलती गतिशीलता का भी संकेत देगा। अगर इतिहास मार्गदर्शक है, तो बिहार की महिलाएं एक बार फिर पुरुषों से अधिक मतदान करेंगी।

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