साधो, दो अक्तूबर पीछे छूट गया है। इसके बावजूद झाड़ू पर विचार-विमर्श बरकरार है। मैंने एक बच्चे से झाड़ू के बारे में पूछा, तो वह बोला, झाड़ू कूड़ा बुहारने की प्राचीनतम मशीन है, जिसे हाथ से पकड़ा जाता है। पहले झाड़ू सींकों की बनाई जाती थी। फिर नारियल झाड़ू का चलन हो गया। इसके बाद फूल झाड़ू लोगों के हाथों में आ गई। अरविंद केजरीवाल ने झाड़ू को इस कदर लोकप्रिय बनाया था कि दिल्ली से कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया। बच्चा वाकई समझदार था।
दिल्ली के पिछले विधानसभा चुनाव में झंडे कम, झाड़ू ही ज्यादा थी। पोस्टरों पर एक तरफ आदमी, तो दूसरी ओर झाड़ू। आदमी और झाड़ू का ऐसा संग-साथ इतिहास में पहले शायद कभी नहीं देखा गया। लेकिन केजरीवाल जी की झाड़ू अब मोदी जी ने छीन ली है और बात-बात पर रपट लिखाने वाले केजरीवाल भौंचक्के हैं।
मोदी की सक्रियता के बाद तो अब झाड़ू लोगों के सिर चढ़कर बोलने लगी है। उन्होंने अच्छे-अच्छों के हाथों में झाड़ू थमा दी। वह मंत्री ही क्या, जो झाड़ू न लगाए। गली-कूचों में लंबे डंडे में लगी झाड़ू। रहीम होते, तो लिखते-बिन झाड़ू सब सून।
प्रधानमंत्री के आदेश से अब लोग सुबह-सवेरे झाड़ू लिए तैनात खड़े हैं। वे मीडिया का इंतजार कर रहे हैं। फोटो खिंचे, तो घर जाएं। दृश्य खत्म होने के बाद इन झाड़ुओं का क्या होगा? जो झाड़ू प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने थामी, वह ऐतिहासिक हो गई। एक आदमी बोला, इसे किसी संग्रहालय में रखा जाए, जिसके नीचे लिखा हो-उन दिनों की झाड़ू, जब देश बहुत गंदा था।
झाड़ू लगाना अब सफाई कर्म नहीं, राजनीतिक कवायद भी है। जो पार्टियां झाड़ू नहीं लगातीं, वे पिछड़ जाती हैं। झाड़ू लगाना एक कला भी है और मोदी यह कला बखूबी जानते हैं। मंगल ग्रह पर अभी आदमी नहीं पहुंचा, इसलिए वहां कूड़ा नहीं है, पर हमारे प्रधानमंत्री वहां भी झाड़ू लगाने का अभियान चला सकते हैं। वह अब देश को इतना स्वच्छ तो बना ही देंगे कि यह अमेरिका लगने लगेगा। जो लोग कभी अमेरिका नहीं गए, वे तसल्ली करें, अमेरिका यहीं आ रहा है।