एक दिन हनुमान भक्त लालू को साधु पांडे ने चुनौती दे डाली कि इस मूरत के आगे माथा टेकने से क्या होगा? यदि वास्तव में भगवान हैं, तो उनसे बोल आधार कार्ड बनवा कर दिखाएं। जो अपना ही आधार कार्ड न बनवा सके, वह तुझे कैसा आधार देंगे। भक्त को बात ऐसी चुभी कि हनुमान जी की मूर्ती के आगे बैठ गया और बोला आप आधार कार्ड बनवाइए, वरना मैं अपनी जान दे दूंगा।
हनुमान जी बहुत परेशान हुए। मगर भक्त के प्राण तो बचाने ही थे। सो आधार कार्ड बनवाने सरकारी दफ्तर जा पहुंचे। लंबी लाइन देखकर उन्हें पसीना आ गया। समुद्र होता, तो लांघ जाते, मगर इस लाइन का क्या करें, जिसमें आगे आते ही लोग धक्का मारकर पीछे धकेल देते थे। खैर जैसे-तैसे उनका नंबर आया, सामने बैठे अधिकारी ने कहा, देखो, आधार कार्ड में तुम्हारा असली चेहरा आना चाहिए। यह स्वांग हटाओ और असली चेहरा सामने लाओ।
हनुमान जी झल्लाए और बोले, मैं राम भक्त हनुमान हूं। ऐसी ही तस्वीर लगाओ। सरकारी अफसर ने भी गुस्से में उनका वैसा ही चित्र खींच दिया। पिता का नाम पवन, बाकी कोई पता न दे पाने पर हनुमान जी को किनारे में खड़ा कर दिया गया। आखिर एक बूढ़ा यह सब देख रहा था, लेकिन उसकी नजर हनुमान जी के गले में लटकती चमचमाती माला पर थी। वह हनुमान से बोला, तुम यह माला मुझे दे दो, तो मैं तुम्हारा फॉर्म भर दूंगा। पहले तो हनुमान जी अचकचाए और फिर बोले, तुम सब जनता के सेवक हो, बिना लालच के जनता का काम करना चाहिए। सुनकर बूढ़ा पहले तो हंसा, फिर बोला, भैया बिना रिश्वत के यहां काम नहीं होता, जाओ लगे रहो लाइन में हमें क्या!
अचानक हनुमान जी को लालू के अनशन की बात याद आई, और उन्होंने माला उतार कर तुरंत उस बूढ़े व्यक्ति को दे दी। उसने भी फटाफट हनुमान जी की तस्वीर के साथ स्थायी निवास भरा, अगूंठे का निशान लिया और आधार कार्ड पर मुहर लगा दी। इस प्रकार हनुमान जी को आम आदमी का अधिकार प्राप्त हुआ और वह भक्त की जान बचाने में सफल हो पाए।