यहां यह उल्लेख करना रोचक होगा कि इस्लामी साम्राज्य की हिमायत करने वाले पाकिस्तानी लेखक मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी और मिस्र के विचारक सैयद कुतुब की किताबें अरसे से इस विश्वविद्यालय में पढ़ाई जाती रही हैं। दोनों लेखक इस्लामी और गैर-इस्लामी देशों में खासे विवादों में रहे हैं। सैयद कुतुब को वर्ष 1965 में मिस्र की तत्कालीन सरकार का विरोध करने के साथ-साथ राष्ट्रपति जमाल अब्दुल नासिर की हत्या की साजिश रचने का दोषी ठहराया गया था।
उसी आधार पर अदालती आदेश के बाद उन्हें 1966 में फांसी पर लटका दिया गया था। मौलाना मौदूदी भी पाकिस्तान में सैन्य शासन के कोपभाजन बने। वर्ष 1953 में उनकी पुस्तक कादियानी मसला को आधार बनाकर फौजी अदालत ने फांसी की सजा सुनाई थी। लेकिन बाद में कट्टरपंथियों के दबाव में फांसी की सजा आजीवन कारावास में तब्दील हो गई थी। इन दोनों के अतीत को आधार बनाते हुए कुछ प्रबुद्ध लोगों ने प्रधानमंत्री को एक खत लिखकर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उनकी किताबें पढ़ाने पर रोक लगाने की मांग की थी।
अब विश्वविद्यालय प्रशासन ने इन किताबों को हटाने का फैसला कर लिया है। हालांकि उसका यह भी कहना है कि दोनों लेखकों की किताबों में कुछ भी आपत्तिजनक बात नहीं थी। विश्वविद्यालय में दारा शिकोह अध्ययन केंद्र की स्थापना भी बदलाव की बयार का ही नतीजा है। दरअसल दारा शिकोह के किरदार को यहां बहुत तवज्जो नहीं दी जा रही थी। विश्वविद्यालय की गतिविधियों पर नजर रखने वाले बताते हैं कि इसकी वजह दारा की छवि है। दारा शिकोह मुगल बादशाह शाहजहां और उसकी प्रिय पत्नी मुमताज महल के बेटे थे।
अपने दौर में वह अरबी, फारसी और संस्कृत के बड़े विद्वान के रूप में जाने जाते थे। शाहजहां को दारा अपने सभी बेटों में सबसे ज्यादा प्रिय थे। 18 साल की उम्र में दारा को शाहजहां ने 1633 ईस्वी में युवराज घोषित कर दिया। यही नहीं, इलाहाबाद, लाहौर और गुजरात जैसे अहम हलकों के शासन की बागडोर भी उन्हें थमा दी गई थी। सत्ता की होड़ में औरंगजेब उस वक्त दारा से बहुत पीछे थे, लेकिन कंधार में हुई दारा की पराजय ने हालात बदल दिए।
इसके बाद तो औरंगजेब ने उन्हें काफिर घोषित करके उनकी हत्या कर दी और कटा सिर तश्तरी में अपने पिता शाहजहां को तोहफे के तौर पर पेश किया था। दारा की रुचि सूफी और वेदांत दर्शन में थी। उन्होंने सूफी संतों के जीवन पर सफीनात अल औलिया और सकीनात अल औलिया नाम की दो किताबें फारसी में लिखीं। मजमा अल बहरेन में वेदांत और सूफीवाद का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है।
दारा की सबसे अहम किताब सिर्र-ए-अकबर कही जाती है, जिसमें उन्होंने 52 उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया है। सूफीवाद, वेदांत और सर्वेश्वरवाद का हिमायती होने की वजह से मुगलों में दारा को सबसे ज्यादा उदार माना जाता है। दारा की किताबों को मानव सभ्यता के अनमोल रत्न का दर्जा दिया जाता है। दारा को कट्टरपंथियों ने कभी पसंद नहीं किया, बल्कि उन्हें काफिर भी कहा गया।
विश्वविद्यालय के आधिकारिक वेब पेज में दारा शिकोह के नाम पर बने अध्ययन केंद्र का उद्देश्य युवाओं में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और उदारवाद के साथ ही बहुलतावाद की भावना का विकास करना है। यह काफी अहम बात है। विश्वविद्यालय के दारा शिकोह अध्ययन केंद्र की गतिविधियां अभी कुछ सेमिनारों और दारा की कुछ पुस्तकों के प्रकाशन तक सीमित हैं। लेकिन धीरे-धीरे ही सही, विश्वविद्यालय में बदलाव की बयार बहने लगी है, जिसे साफ महसूस किया जा सकता है।