प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर तथाकथित कट्टरपंथियों और हिंदुत्ववादियों से अपने को अलग करते हुए कहा है कि कुछ थोड़े से लोग सरकार की प्रतिष्ठा गिराने का काम कर रहे हैं। जबकि हमारा संविधान ही हमारा धर्मशास्त्र है और सवा करोड़ देशवासियों को साथ लेकर सबका विकास करने का हमारा संकल्प है। ऐसा पहली बार नहीं है। उन्होंने इन कट्टरपंथियों को कई अवसरों पर इनके बयानों और उद्धरणों को लेकर माफी मांगने तक के निर्देश दिए हैं, जिन पर अमल भी हुआ है। पर मुश्किल यह है कि ऐसे लोगों में से अधिकांश भाजपा और सरकार से जुड़े लोग ही हैं।
नरेंद्र मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री के रूप में जब चुनाव मैदान में उतरे थे, तो यह सावधानी अवश्य बरती गई कि उनको पुरानी छवि से अलग रखा जाए। इसलिए देश की गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, राष्ट्रीय धन के दुरुपयोग, काले धन को देश में लाकर गरीबों में बांटने तथा नवयुवकों को नौकरियां दिलाने संबंधी प्रलोभन वाले नारे दिए गए थे, और सांप्रदायिक नारों से भी बचा गया। यह भी कहा जाता है कि चुनाव अभियान में उन्होंने अल्पसंख्यकों के खिलाफ न तो कोई अभियान छेड़ा, न उनके खिलाफ कोई बयानबाजी की। आज भी मोदी देश के विकास के नारों के बल पर विदेश यात्राएं कर जनसमर्थन जुटा रहे हैं।
मोदी ने हिंदुत्ववादी कट्टरपंथियों के खिलाफ जो विचार व्यक्त किए, उसका उन वर्गों ने भी समर्थन किया, जिन्हें भाजपा का कट्टर विरोधी बताया जाता है। इसलिए अब यह सवाल उठता है कि क्या यह सारा प्रयत्न इसीलिए तो नहीं हो रहा है कि उन्हें उस धार्मिक, असहमत वर्ग को भी अपने साथ लाना है, जिससे राजनीति का स्वरूप बदले। यह ऐसा वर्ग है, जिसे कुछ लोग वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करना चाहते हैं। यदि वह विभाजित हो सके, तो मोदी का प्रभाव क्षेत्र बढ़ेगा और दीर्घकाल तक सत्ता में रहने की इच्छा भी पूरी होगी।
तो क्या मोदी का मूल लक्ष्य वास्तव में पंथ निरपेक्षता तथा सर्वधर्म समभाव वाले स्वरूप को प्रोत्साहित करना है या इन सबके पीछे भविष्य में होने वाले बिहार, बंगाल और उत्तर प्रदेश विधान सभा के चुनाव हैं? सबसे पहले बिहार के चुनाव होने जा रहे हैं। वहां अब भी राजद और जद (यू) का द्वंद्व समाप्त नहीं हो पाया है, लेकिन चुनाव जीतने के लिए लालू और नीतीश की एकता के नए प्रस्ताव आ रहे हैं। लालू और नीतीश को अल्पसंख्यकों का जो समर्थन हासिल है, अगर उसे थोड़ा भी कम किया जाए, तो उसका सीधा लाभ भाजपा को मिल सकता है। दूसरी तरफ बंगाल में भाजपा कुछ अधिक कर पाएगी, यह तो उसके नेता भी नहीं मानते, लेकिन भाजपा वहां अपना जनाधार बढ़ाना चाहती है।
उत्तर प्रदेश में मुलायम का मुख्य आधार पिछड़े और अल्पसंख्यक हैं, उसमें लखनऊ क्षेत्र में शियाओं को छोड़ा जा सकता है। इसलिए यदि यह संदेश जाए कि अगली सरकार यदि भाजपा की भी आ जाए, तो उसका नेतृत्व कट्टरपंथी हिंदुत्ववादियों को नहीं, बल्कि मोदी की नई परिकल्पनाओं पर आधारित होगा, तो उससे मुलायम ही कमजोर होंगे। इसलिए वास्तव में कट्टरपंथ और हिंदुत्वादियों के खिलाफ मोदी की बयानबाजी निरुद्देश्य नहीं, बल्कि भावी अभियान का ही अंग है।
नई स्थितियों में चुनावी राजनीति को अपने अनुकूल बनाने के लिए यदि अपने समर्थकों की ही आलोचना और निंदा करनी पड़े, तो इसे बुरा कैसे कहा जाएगा! लेकिन इस तरह भी अगर मोदी कट्टरपंथियों को नियंत्रित कर सके, तो यह एक बड़ी राजनीतिक उपलब्धि होगी।