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सूबेदारी नहीं, भागीदारी बढ़ाएं

Fri, 05 Jun 2015 07:59 PM IST
शंकर अय्यर
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पिछले हफ्ते विवादित अध्यादेश पर आधारित संशोधित भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को तीसरी बार राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई। और पिछले हफ्ते ही उत्तर प्रदेश सरकार ने घोषणा की कि उसने लखनऊ को आगरा से जोड़ने वाले छह लेन वाले 302 किलोमीटर लंबे एक्सप्रेस-वे के लिए करीब तीन हजार हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण लगभग पूरा कर लिया है।
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यह संयोग एक संवेदनशील मुद्दे पर दोनों सरकारों के नजरिये के विरोधाभास को उजागर करता है। केंद्र सरकार कह रही है कि मौजूदा कानून के कारण विकास में देरी हो रही है। जबकि उत्तर प्रदेश सरकार का झुकाव न तो 2013 के कानून के प्रति है और न ही वह नए कानून की संकल्पित संभावनाओं का इंतजार कर रही है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि छह जिलों के 232 गांवों में लगभग पूरा अधिग्रहण आपसी समझौते यानी सहमति के जरिये हुआ। वाकई इनमें बाधाएं आईं, पर उसका समाधान संवाद के जरिये निकाला गया। और ध्यान रहे कि गंगा के मैदानी इलाकों में कई जगहों पर विकास के लिए किसानों ने अपनी बहुफसली उपजाऊ भूमि दी है। जैसा कि 2013 के कानून में गारंटी दी गई है और जिसका 2014 के विधेयक में आश्वासन दिया गया है, तीस हजार से ज्यादा किसानों को ग्रामीण क्षेत्रों में सर्कल रेट से चार गुना और शहरी क्षेत्रों में दो गुना भुगतान किया गया है, यानी 2,850 करोड़ रुपये से ज्यादा किसानों को मुआवजे के तौर पर दिए गए।

मुद्दा यह है कि किसान इस बात से अनभिज्ञ नहीं हैं कि उनके लिए अच्छा क्या है। अपने क्षेत्र में विकास कार्यों को रोकना और अपनी उन्नति से इन्कार करना वह भी नहीं चाहते। वे जमीन देने के लिए तैयार हैं, बशर्ते उनके हितों का संरक्षण किया जाए। यह संवाद एवं सम्मति की धारणा है, सहभागिता एवं भागीदारी की धारणा है, जो बहस से गायब है। जो बात सियासी दलों को समझने की जरूरत है, वह यह कि किसानों से जब भूमि अधिगृहीत की जाती है, तो वे न सिर्फ अपनी संपत्ति से हाथ धो बैठते हैं, बल्कि उनकी पहचान भी खतरे में पड़ जाती है।
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वर्ष 2013 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून को संसद में पारित कराने के लिए अपनी पूरी राजनीतिक पूंजी लगा दी थी। यह सेज योजना के तहत लूट के बाद अपनी किसान विरोधी छवि से छुटकारा पाने के लिए एक तरह का प्रायश्चित था। वर्ष 2014 में निवेश और विकास के मुद्दे पर मोदी सरकार सत्ता में आई। पिछले छह महीने से इसने 2013 के कानून के नए 'विकास के अनुकूल संस्करण' पर अपनी राजनीतिक पूंजी का निवेश किया है। वर्ष 2013 में कांग्रेस को 'विकास विरोधी' का तमगा मिला था और वर्ष 2015 में भाजपा को 'किसान विरोधी' होने का तमगा मिल रहा है।

इस समस्या की जड़ शासन के विफल मॉडल से चिपके रहना है। कांग्रेस केंद्रीकरण के विचार से जुड़ी है, जबकि मोदी सरकार सहकारी संघवाद में भरोसा करने के बावजूद कांग्रेसी विचार के साथ चिपकी हुई है, जो इसके व्यावसायिक मॉडल (जिसके लिए बिजली और प्राकृतिक संसाधनों के केंद्रीकरण की जरूरत है) के अनुकूल है। मोदी सरकार को सार्वजनिक कारणों और राजनीतिक मामले, दोनों को लेकर अपनी नीति की समीक्षा करनी चाहिए। उसे शीर्ष से नीचे की ओर वाले मॉडल के बजाय नीचे से ऊपर की ओर वाले मॉडल को अपनाना चाहिए।

सभी व्यावहारिक प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए भारत का हरेक हिस्सा राज्यों द्वारा शासित है। इसलिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया भी राज्यों द्वारा संपन्न होनी चाहिए। संविधान की सातवीं अनुसूची में भूमि-भूमि पर अधिकार, स्वामित्व, ठेका, पट्टे पर देना, और कृषि भूमि का अलगाव सहित उसे हस्तांतरित करने का अधिकार राज्यों के दायरे में है। यह सही है कि नेहरू युग में राज्यों ने वर्ष 1956 में अधिग्रहण एवं संपत्ति की मांग को समवर्ती सूची में शामिल करने की सहमति जता दी, जिससे केंद्र को इस मामले में अधिकार मिल गया। मगर, ऐसा कोई नियम तो नहीं है कि गलतियों को जारी रखा जाए।

क्यों नहीं राज्यों को अपने के लिए उचित कानून बनाने दिया जाए? इस मुद्दे पर विचार हुआ था, लेकिन भाजपा के कुछ बड़े नेताओं ने इसे नकार दिया। तर्क यह दिया गया कि किसी एक राज्य ने सहयोग नहीं किया या सहमति नहीं दी, तो चेन्नई से कोलकाता के बीच राजमार्ग का निर्माण रुक सकता है। चूंकि राज्य केंद्रीय कानूनों में संशोधन के लिए स्वतंत्र हैं, इसलिए ऐसा अब भी हो सकता है। कानूनी संरक्षण के बावजूद सिंगूर/नंदीग्राम जैसे आंदोलनों की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।

इसलिए स्थानीय सरकार को यह फैसला करने दिया जाए कि लोगों के हित में क्या है। मौजूदा केंद्रीय कानून में रक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा प्रतिष्ठान, राष्ट्रीय राजमार्ग, बंदरगाह आदि के उद्देश्य से संशोधन किया जा सकता है। बाकी बुनियादी ढांचे, उद्योग और सामाजिक विकास के लिए भूमि का अधिग्रहण, साझा, संग्रहण कैसे होगा, यह राज्यों को तय करने दिया जाए।

जहां तक राजनीतिक जोखिम की बात है, तो भाजपा अभी 11 राज्यों में शासन में है, जहां उसे किसी से समर्थन लेने की जरूरत नहीं है। मगर राज्यसभा में उसे जरूरत है। इसलिए राज्यों को उपयुक्त मॉडल अपनाने दिया जाए- चाहे उत्तर प्रदेश का आपसी सहमति का मॉडल हो या महाराष्ट्र के मगरपट्टा शहर का मॉडल या आंध्र प्रदेश का भूसंग्रहण विचार। स्थान और ढांचे पर दिशा-निर्देश का मसौदा तैयार करने में केंद्र मदद कर सकता है। जैसे, किस परियोजना के लिए कितनी भूमि की जरूरत है, ताकि कॉरपोरट भूमि बैंक पर कुंडली मारकर न बैठ जाए। यह राज्यों को अनप्रयुक्त सेज की जमीन फिर से अधिकार में लेने और औद्योगिक क्षेत्र के निर्माण के लिए परती एवं बंजर जमीनों का बैंक बनाने में वित्तीय मदद कर सकता है।

यदि भाजपा इस पर विचार करे, तो इससे अच्छा-खासा लाभांश अर्जित किया जा सकता है। महाराष्ट्र, हरियाणा, गुजरात जैसे औद्योगिक राज्यों और खनिज संसाधनों के मामले में धनी राज्यों-झारखंड, छत्तीसगढ़, गोवा में भाजपा की मौजूदगी उसे जमीनी स्तर पर विकास का ढांचा तैयार करने का मौका देती है। ग्यारह भाजपा शासित राज्य विकास के दूत बन सकते हैं।
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-अर्थशास्त्र की राजनीति के विशेषज्ञ और एक्सीडेंटल इंडिया के लेखक
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