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क्या भाजपा में तैयार हो पाएंगे नए क्षत्रप

Fri, 12 Dec 2014 08:17 PM IST
भूपेंद्र चौबे
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कई विश्लेषकों की राय है कि लोकसभा चुनाव के बाद से भारतीय राजनीति हमेशा के लिए बदल गई है। इसका सेहरा भाजपा के सिर पर बांधा जा रहा है। 1980 में अपनी स्थापना के बाद से भाजपा खुद को परिवारवाद और व्यक्तिपूजा के खिलाफ रख कर आगे बढ़ी। लेकिन 2014 के आम चुनाव के बाद पार्टी नरेंद्र मोदी के ही इर्द-गिर्द घूमती दिखती है।
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इसका सबसे बड़ा प्रमाण आपको उन राज्यों में दिखेगा, जहां हाल ही में चुनाव हुए हैं या फिर होने वाले हैं। महाराष्ट्र और हरियाणा, दोनों ही प्रदेशों में पार्टी ने चुनाव प्रचार में मोदी को स्टार प्रचारक के रूप में उतारा और उसका उसे फायदा भी हुआ। महाराष्ट्र में भाजपा शिवसेना की सहयोगी पार्टी के रूप में जानी जाती थी, और हरियाणा में पार्टी का अस्तित्व लगभग न के बराबर था। लेकिन विधानसभा चुनाव में मोदी की आंधी ने सब कुछ बदल दिया। देवेंद्र फडणवीस महाराष्ट्र के और मनोहर लाल खट्टर हरियाणा के मुख्यमंत्री बने।

इसी कड़ी में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने ऐलान किया कि झारखंड में भी पार्टी किसी को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में नहीं लाएगी। यह कदम ऐसे राज्य में उठाया गया, जहां भाजपा की अपनी सरकारें रह चुकी हैं। अर्जुन मुंडा आज भले ही केंद्रीय नेतृत्व के प्रिय न हों, पर उनका राजनीतिक वजूद है। जम्मू-कश्मीर में भाजपा पहली बार खुद को प्रबल दावेदार के रूप में देख रही है। मगर वहां भी क्या मुख्यमंत्री पद के लिए वह किसी का नाम आगे करेगी? अर्थात सब मोदी शरणम गच्छामि! लेकिन अगर इस पैमाने को उत्तर प्रदेश और बिहार के संदर्भ में देखें, तो शायद यह फायदेमंद न हो। दोनों राज्यों से लोकसभा की 120 सीटें हैं, जिनमें भाजपा और उसके छोटे सहयोगियों के पास 101 सीटें हैं। इस तरह देखें, तो भाजपा को अपने दमखम पर दोनों ही प्रदेशों में सरकार बनानी चाहिए। इन दोनों प्रदेशों में नेताओं की कमी नहीं है। ऐसे में क्या यह माना जाए कि भाजपा बिहार में चुनाव से पहले सुशील कुमार मोदी को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में आगे करेगी? और क्या उत्तर प्रदेश में मोदी कोई नया फडणवीस ढूंढेंगे या फिर किसी कद्दावर नेता के एलानिया नेतृत्व में भाजपा चुनाव मैदान में उतरेगी। ऐसे समय जब प्रदेश में धर्म आधारित राजनीति को प्रोत्साहित किया जा रहा है, भाजपा किसे आगे करना चाहेगी? विधानसभा चुनावों के दौरान योगी आदित्यनाथ को आगे रखकर चुनाव लड़ने का फर्मूला नाकाम हो गया। तो क्या अखिलेश के खिलाफ मोदी ही प्रचार की कमान संभालेंगे?
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अभी दिल्ली में स्थिति दिलचस्प बनी हुई है। अरविंद केजरीवाल अब एंग्री यंग मैन की छवि को त्याग कर हंसते-खिलखिलाते नजर आ रहे हैं। कांग्रेस तो चुनाव में कहीं खड़ी दिखती ही नहीं। भाजपा के एक वर्ग की राय है कि क्यों न स्मृति ईरानी को यहां मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किया जाए। लेकिन ऐसा फैसला दिल्ली के जमे नेताओं को शायद ही रास आए। वास्तव में दिलचस्पी यह देखने में होगी कि क्या मोदी एक नया शिवराज सिंह, रमन सिंह या वसुंधरा राजे पैदा कर सकते हैं? ये तीनों कद्दावर नेता लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में उभरे। वैसे तो खुद मोदी भी आडवाणी के नेतृत्व में ही आगे आए। क्या भाजपा का नया स्वरूप राज्यों में कद्दावर नेताओं को मजबूत कर उभारेगा या फिर ऐसे नेताओं की खोज होगी, जो अपने राजनीतिक कौशल से अधिक मोदी के प्रति समर्पित हैं। यही इकलौता प्रश्न मोदी के आने वाले पांच वर्षों की दिशा तय करेगा।
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लेखक वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं
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