पिछले पखवाड़े हरिद्वार में साधुओं को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि 'हमारा अभिमन्यु चक्रव्यूह में प्रवेश कर गया है और वह निश्चित रूप से उसमें से सफल होकर निकलेगा।' भागवत ने देश की राजनीतिक/नौकरशाही व्यवस्था को चक्रव्यूह बताया, जिससे मोदी जूझ रहे थे। महाभारत में चक्रव्यूह एक जटिल युद्ध संरचना है, जिसे कौरवों ने पांडवों को खत्म करने के लिए बिछाई थी।
संघ प्रमुख ईमानदारीपूर्वक चाहते हैं कि नरेंद्र मोदी इस जटिल चक्रव्यूह से सकुशल बाहर निकलें। हो सकता है, मोहन भागवत संभवतः खुद को ज्येष्ठ पांडव युधिष्ठिर के रूप में पेश करना चाहते हों, जिसने अभिमन्यु को चक्रव्यूह में प्रवेश कराने में सक्रिय भूमिका निभाई थी। मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में भागवत ने भी तो भूमिका निभाई ही।
लेकिन आज ऐसा प्रतीत हो रहा है कि भागवत और संघ परिवार के सदस्य खुद उस चक्रव्यूह का हिस्सा बन गए हैं, जिसका उद्देश्य नरेंद्र मोदी को फंसाना है। ऐसे समय में जब संसद का सत्र चल रहा है और राजग सरकार अपने आर्थिक सुधार एजेंडे से संबंधित महत्वपूर्ण विधेयकों को लाने की कोशिश कर रही है, तो संघ परिवार के लोगों द्वारा एक के बाद एक विवाद छेड़ने को भला क्या कहा जा सकता है!
बड़े पैमाने पर मुसलमानों का जबरन हिंदू धर्म में परिवर्तन जैसे सांप्रदायिक एवं विभाजनकारी मुद्दों के जरिये संसद के कामकाज को बाधित किया गया। पर प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक रूप से ऐसे कार्यों की निंदा नहीं की, क्योंकि दोषी संघ परिवार से ताल्लुक रखते हैं। भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताया। महाराष्ट्र के कट्टर हिंदुओं द्वारा गोडसे को बहुत महत्व दिया जाता है। संघ परिवार द्वारा चलाए जा रहे धर्मांतरण अभियान के संदर्भ में पूर्व सांसद एवं बजरंग दल के नेता विनय कटियार ने कहा कि उमर अब्दुल्ला का परिवार तीन पीढ़ी पहले हिंदू था। उसी दिन उत्तर प्रदेश के राज्यपाल और संघ परिवार के पुराने नेता राम नाईक ने कहा कि जितनी जल्दी संभव हो, राम मंदिर बनना चाहिए।
ध्यान दीजिए, यह सब उस वक्त हुआ, जब संसद का सत्र चल रहा था और नरेंद्र मोदी रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ शिखर वार्ता कर रहे थे! किस तरह के 'आधुनिक भारत' की छवि लेकर पुतिन रूस लौटेंगे? क्या मोहन भागवत यह समझा सकते हैं कि संघ परिवार खुद अपने 'अभिमन्यु' को चक्रव्यूह में फंसाने में योदगान दे रहा है?
गौरतलब है कि धर्मांतरण विवाद साध्वी निरंजन ज्योति के विवादित 'रामजादे' वाले बयान के बाद शुरू हुआ है। उस मसले पर भी संसद का कामकाज कुछ दिनों तक ठप रहा था, क्योंकि विपक्ष साध्वी का इस्तीफा मांग रहा था। प्रधानमंत्री ने महज उनकी 'पृष्ठभूमि' के आधार पर साध्वी को माफ कर देने के लिए कहा।
यदि भागवत और संघ परिवार अब सार्वजनिक रूप से प्रधानमंत्री को शर्मिंदा कर रहे हैं, तो यह वही है, जिसकी आशंका ज्यादातर राजनीतिक विश्लेषकों ने राजग के सत्ता में आने के बाद जताई थी। तब यह आशंका जताई गई थी कि संघ परिवार अपनी मांग मनवाने के लिए सरकार पर दबाव डालेगा। कहा गया कि कुछ समय बाद प्रकट तौर पर भले ही विकास के मोर्चे पर, लेकिन गुप्त रूप से सांप्रदायिक संदेश के आधार पर लड़े गए लोकसभा चुनाव के बाद संघ परिवार, जिसने भारी बहुमत से जीत दिलाने में मदद की, नरेंद्र मोदी को अपने जाल में फंसाएगा।
लगता है कि संघ परिवार मोदी को एक विकासोन्मुख प्रधानमंत्री की विरासत कायम करने देने के मूड में नहीं है। इसमें हैरानी की बात नहीं है, क्योंकि नरेंद्र मोदी खुद पिछड़ी जाति की राजनीति के साथ हिंदुत्व को मिलाने की संघ परिवार की एक नया सामाजिक रसायन तैयार करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा रहे हैं। पिछड़ी जाति के नेता के साथ 'हिंदू हृदय सम्राट' की छवि वाले नेता के रूप में मोदी मोहन भागवत की सोच के केंद्र में थे, जब उन्होंने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में उनका नाम आगे बढ़ाया था। लगता है कि संघ इसी विस्तृत योजना पर काम कर रहा है। यह तभी स्पष्ट हो गया, जब भाजपा सांसदों ने एक 'ओबीसी साध्वी' पर विपक्ष के हमले के विरोध में धरना दिया था। साध्वी निरंजन ज्योति की पृष्ठभूमि के आधार पर माफी मांगकर मोदी ने एक बार फिर कूट संदेश दिया। क्या मोदी उनकी पृष्ठभूमि को पिछड़ा या हिंदू प्रतीक बताना चाह रहे थे? यदि कोई ऐसे बयानों के संदेश पर गौर करे, तो साफ होता है कि संघ दलित एवं पिछड़ों को हिंदुत्व की तरफ मोड़ने की रणनीति पर काम कर रहा है। संघ परिवार के कई कट्टरपंथी संगठन, मसलन बजरंग दल अतीत में पिछड़ी जाति के नेताओं को आगे बढ़ाता रहा है। उदाहरण के लिए विनय कटियार को 1990 के दशक के राम मंदिर आंदोलन के दौरान बजरंग दल का नेता बनाया गया। इसके अलावा संघ एवं भाजपा से सहानुभूति रखने वाले बाबा रामदेव भी पिछड़ी जाति (यादव) से हैं।
संघ परिवार की इस गहरी रणनीति को नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव, लालू यादव, शरद यादव जैसे नेताओं ने समझ लिया है। इसलिए वे संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए एकजुट हुए हैं। निश्चय ही मायावती भी इसे महसूस कर रही हैं, इसलिए उन्होंने हाल ही में उत्तर प्रदेश के उपचुनाव में बहुमत से जीतने में प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी की रणनीतिक मदद की। उत्तर भारत की राजनीति में यह नया मंथन होगा।
संघ परिवार का यह व्यापक सामाजिक प्रयोग हिंसक भी हो सकता है, जिससे राजग सरकार के प्रकट विकासात्मक एजेंडे को खतरा होगा। युवा मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग अपने जीवन में बदलाव के लिए बेचैन है और मोदी से उसे काफी अपेक्षाएं हैं। उसी तरह संघ को भी अपने अंतर्निहित कार्यक्रमों को पूरा करने के लिए मोदी से भारी अपेक्षाएं हैं। यह वास्तव में एक नया चक्रव्यूह है, जिससे मोदी को निकलना होगा।