राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने बांग्लादेश की प्रधानमंत्री को सात अप्रैल से शुरू होने वाली उनकी भारत यात्रा के दौरान राष्ट्रपति भवन में रुकने का निमंत्रण दिया है। निकट द्विपक्षीय संबंधों के अलावा दोनों व्यक्ति एक दूसरे का सम्मान करते हैं। ये दोनों एक दूसरे के देश में जाना-पहचाना नाम हैं। वह प्रणब मुखर्जी ही थे, जिन्होंने केंद्रीय वित्त मंत्री रहते हुए बांग्लादेश के लिए एक अरब डॉलर का नरम ऋण पैकेज तैयार किया था। एक ही बार में इतनी बड़ी रकम का ऋण पैकेज देने का अपना रिकॉर्ड था। उससे पहले भारत ने केवल अफगानिस्तान को ही दो अरब डॉलर का ऋण पैकेज दिया था, लेकिन वह दीर्घकालीन था।
यह बहुत ही तार्किक और उचित है कि इस राशि को बढ़ाया जाएगा, क्योंकि सात वर्षों में हसीना पहली बार भारत की आधिकारिक यात्रा पर होंगी। ऐसी चर्चा है कि भारत अपनी सहायता में विस्तार कर इसे चार से पांच अरब डॉलर कर सकता है, जो किसी एक देश को दी जाने वाली सबसे बड़ी सहायता राशि होगी।
जैसे-जैसे यात्रा के दिन करीब आ रहे हैं, उम्मीदें बढ़ती जा रही हैं, पर मीडिया में इसकी चर्चा कम है। पूर्वोत्तर के चार मुख्यमंत्रियों के साथ पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बांग्लादेश यात्रा की विफलता को देखते हुए यह अच्छा ही है। तीस्ता नदी के जल बंटवारे का सौदा उस समय हुआ था, पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तैयार नहीं हुईं और वह ढाका नहीं गईं।
उन्होंने उत्तर बंगाल के अपने वोट बैंक को ध्यान में रखकर एक संकीर्ण रवैया अपनाया था कि यह सौदा पश्चिम बंगाल के हित के लिए नुकसानदेह है। उनके समर्थकों ने एक बड़ा तर्क यह दिया कि किसी भी राजनीतिक ने उनको बारीकी नहीं समझाई और न ही उन्हें मनाने की कोशिश की। तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन ने उन्हें समझाने की कोशिश की थी, लेकिन दीदी मानने को तैयार नहीं थीं कि मेनन का कद उतना बड़ा था कि वह समझ जातीं।
तीस्ता मामले में उनकी वह सोच नहीं बदली है, बल्कि अब तो वह पश्चिम बंगाल में भाजपा की बढ़ती पैठ को देखते हुए भयभीत भी हैं। उन्हें डर है कि तीस्ता जल समझौते पर राजी हो जाने से उत्तर बंगाल के तीन या चार विधानसभा क्षेत्र में वह राजनीतिक समर्थन खो देंगी। पर हसीना अगर इस समझौते पर हस्ताक्षर करने में विफल रहती हैं, तो बांग्लादेश में 18 संसदीय क्षेत्रों पर उसका असर पड़ेगा। उनके लिए नुकसान राष्ट्रव्यापी होगा, जब वह अगली बार चुनाव में जनता का सामना करेंगी। ममता बनर्जी तीस्ता जल समझौते पर सहमत तो नहीं ही हैं, इसको लेकर गंभीर संदेह है कि नई दिल्ली की तरफ से कोई राजनेता उनसे बात करेगा। इस आशंका से परेशान उन्होंने पश्चिम बंगाल के मीडिया को गुपचुप तरीके से यह बयान दिया कि वह जानती हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार उनकी उपेक्षा कर इस सौदे को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
तीस्ता मामले में मोदी आज जो कर रहे हैं, वह मनमोहन सिंह को भी करना चाहिए था-यानी ममता बनर्जी की अनदेखी। मनमोहन सिंह को समझना चाहिए था कि यह राज्य के अधिकार क्षेत्र में नहीं है, क्योंकि नदी जल समवर्ती सूची में शामिल है और अंतरराष्ट्रीय संधि केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र के अधीन है।
राजनीति में शालीनता का कोई मोल नहीं होता। न केवल मनमोहन सिंह और उनकी सरकार, बल्कि भारत और बांग्लादेश, दोनों ने इसकी भारी कीमत चुकाई। अपनी उम्मीदें धूमिल होने के बाद बांग्लादेश ने बदले में भारत को उपेक्षित और पृथक पूर्वोत्तर के क्षेत्रों में अपने क्षेत्र से होकर पहुंचने की अनुमति देने से संबंधित समझौते पर हस्ताक्षर करने से इन्कार कर दिया।
इस बार माना जा रहा है कि मोदी तीस्ता समझौते पर हस्ताक्षर कर देंगे या बांग्लादेश के अधिकारों को स्वीकार करते हुए कम से कम अन्य नदियों पर एक दृढ़ प्रतिबद्धता जाहिर करेंगे-भारत और बांग्लादेश के बीच 53 नदी तंत्र का प्रवाह है। यह दक्षिण एशिया में एक नए युग का प्रतीक होगा। भारत और बांग्लादेश, दोनों के लिए यह भरोसे की एक छलांग है। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और बड़ा पड़ोसी होने के कारण भारत इतना तो बांग्लादेश के लिए कर ही सकता है। हसीना के लिए यह बड़ी बात होगी, क्योंकि अगले वर्ष उन्हें चुनाव का सामना करना है। निस्संदेह तीस्ता समझौता हसीना के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार होगा।
ऐसे भी संकेत हैं कि दोनों पक्ष गंगा बैरेज पर समझौते को अंतिम रूप देंगे। हसीना के पहले के कार्यकाल में ही भारत और बांग्लादेश के बीच तीन दशकों के विचार-विमर्श के बाद गंगा जल समझौता हुआ था। इसके अलावा भारत द्वारा बांग्लादेश को रक्षा पैकेज दिए जाने के बारे में भी खबरें हैं। हालांकि इस पर कुछ स्पष्ट नहीं है, क्योंकि इस मुद्दे से बांग्लादेश में अटकलें और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं, क्योंकि बांग्लादेश के लोगों में भारत को लेकर गलतफहमी है। वैसे भी रक्षा सौदों के बारे में भारत में कम प्रचार होता है। भारतीय पक्ष इसका भी संकेत नहीं देना चाहता कि वार्ता में गलियारे का मुद्दा शामिल होगा या नहीं, जो भारत को बांग्लादेश में प्रवेश की अनुमति देगा। लोकप्रिय बांग्लादेशी धारणा के मुताबिक, इस बात के उच्च संकेत हैं कि ढाका भारत को गलियारों की अनुमति दे सकता है, भारत भी ऐसा समान भाव दर्शा सकता है।
कुल मिलाकर हसीना बड़े पैकेज की उम्मीद कर सकती है, जो बड़ा सौदा होगा और इसका संतुलन बांग्लादेश के पक्ष में होगा। बांग्लादेशी छात्रों को ज्यादा छात्रवृत्तियां, सांस्कृतिक संबंध और अन्य मुद्दों पर यात्रा के दौरान सकारात्मक परिणाम मिलने की संभावना है। दोनों देशों को एक दूसरे की आवश्यकता है, खासकर भारत को ज्यादा। ढाका को राजनीतिक स्थिरता के लिए कुछ और वर्ष चाहिए, ताकि हसीना भारत की अपेक्षा पूरी कर सके और भारत को दक्षिण पूर्व एशिया में प्रभावी ढंग से ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी लागू करने के लिए पूर्वोत्तर क्षेत्र में पहुंच की जरूरत है।