जलवायु में आने वाले परिवर्तन से नित नए खतरे उभर रहे हैं। कैंब्रिज विश्वविद्यालय के नवीनतम अध्ययन ने इस बात की पुष्टि की है कि जलवायु में आ रहे परिवर्तनों के चलते इस सदी के अंत तक वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट आ सकती है। लांग टर्म मेक्रो इकनॉमिक इफेक्ट्स ऑफ क्लाइमेट चेंज : अ क्रॉस कंट्री एनालिसिस के अनुसार, इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था में जहां सात प्रतिशत की गिरावट आ सकती हैं, वहीं भारत की अर्थव्यवस्था 10 प्रतिशत तक कम हो सकती है।
जलवायु परिवर्तन को नकारने वाले अमेरिका को भी जीडीपी में 10.5 प्रतिशत तक का घाटा सहने के लिए तैयार रहना होगा। महामारी के कारण अर्थव्यवस्था की बदहाली के बीच आशा की किरण कृषि क्षेत्र से ही है। मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही में अपनी अर्थव्यवस्था जब 23.9 प्रतिशत तक संकुचित हो गई, तब कृषि क्षेत्र ने 3.4 फीसदी की वृद्धि दर्ज की। लेकिन आशा की यह किरण भी अब धुंधली पड़ रही है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन का असर कृषि क्षेत्र में हो रही वृद्धि को प्रभावित कर सकता है।
विगत अगस्त में जारी रिजर्व बैंक की नवीनतम वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, देश को भविष्य में भीषण सूखे और औसत बारिश में कमी का सामना कर पड़ सकता है तथा चक्रवातों के बढ़ने की भी आशंका है। अकेले 2019 में बारिश में तेज अस्थिरता के साथ आठ चक्रवातों के कारण कृषि क्षेत्र में नुकसान बढ़ा है। रिजर्व बैंक की इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि तापमान में वृद्धि फसल की पैदावार में गिरावट और संभावित आय कम करने का कारण बनी है। ग्लोबल वार्मिंग से 2008 से 2018 के बीच अपने देश में जल स्तर में गिरावट के साथ लगभग 52 प्रतिशत कुओं का भू-जल सूख गया है।
ऐसा पहली बार हुआ है कि देश के केंद्रीय बैंक ने जलवायु परिवर्तन को अपनी वार्षिक रिपोर्ट में शामिल किया है। एक अनुमान के अनुसार, देश की जीडीपी का तीन प्रतिशत जलवायु परिवर्तन का असर कम करने के लिए खर्च किया जाएगा। भारत जैसे अल्प विकसित देश के लिए यह एक बड़ी रकम होगी। जाहिर है, समय रहते आवश्यक कदम उठाकर इस तरह के खर्च से बचा जा सकता था।
चूंकि देश की अर्थव्यवस्था प्रधानतः कृषि पर ही टिकी हुई है, इसलिए इस क्षेत्र में पड़ने वाला प्रभाव समूची अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगा। रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट को आधार मानने का मतलब है भारत की संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था के लिए और बुरी खबर। यह स्थिति आगे भी चलती रहेगी, क्योंकि भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देश जलवायु परिवर्तन का शिकार होते रहेंगे और इसके बाद फसल की पैदावार कम हो जाएगी और खाद्य उत्पादन में कमी आएगी।
अगर कृषि क्षेत्र का उत्पादन गिरता है और अनिश्चितता बढ़ती है, तो मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने और अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए केंद्रीय बैंक को और कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। खाद्य कीमतों पर जलवायु परिवर्तन के दीर्घकालिक असर पर्याप्त रूप से देखे जा सकते हैं। जलवायु परिवर्तन से मिट्टी का क्षरण, भूमि गुणवत्ता का क्षरण, मरुस्थलीकरण, सूखे की बढ़ती आवृत्ति और तापमान में वृद्धि हो रही है।
भारतीय रिजर्व बैंक ने रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि चूंकि भारत पर जलवायु परिवर्तन का असर सबसे गंभीर होने की आशंका है, ऐसे में, इससे उत्पन्न वित्तीय जोखिमों की पहचान, मूल्यांकन और प्रबंधन के लिए एक उपयुक्त ढांचे की आवश्यकता है। पिछले वित्त वर्ष में भारत की आर्थिक वृद्धि में कृषि क्षेत्र का योगदान लगभग 15 प्रतिशत था, जो बैंकों के समग्र ऋण का 12.6 प्रतिशत था।
इसका मतलब है कि कृषि क्षेत्र को झटका लगने का देश की वित्तीय प्रणाली के स्वास्थ्य पर सीधा असर पड़ सकता है। वैसी स्थिति में किसानों द्वारा कृषि उपकरण और इससे जुड़े क्षेत्रों, जैसे ट्रैक्टर, मोटर पंप, बीज और उर्वरक के लिए लिया जाने वाला कर्ज न चुका पाने की आशंका ज्यादा है।
इसके अलावा, फसल के नुकसान से बैंकों पर राजनीतिक दबाव होगा कि वे कर्ज माफ करें या अनिश्चित ब्याज दरों पर ऋण की पेशकश करें। कोविड-19 के इस अनिश्चित समय में किसी समस्या को जानना उसे खत्म करने की दिशा में पहला कदम हो सकता है।