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क्या अमेरिका का मन बदलेगा

मरिआना बाबर Updated Fri, 19 Jan 2018 09:42 AM IST
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डोनाल्ड ट्रंप

पाकिस्तान और अमेरिका के बीच क्या वाक् युद्ध खत्म हो गया है या वाशिंगटन की तरफ से आरोप-प्रत्यारोप और धमकियों का नया दौर शुरू होगा? क्या यह सत्तर वर्षीय द्विपक्षीय रिश्ता बच सकता है या इसे इतना नुकसान हो गया है कि इसमें सुधार नहीं किया जा सकता? जब से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खासकर अफगानिस्तान पर जोर देते हुए अपनी दक्षिण एशिया नीति घोषित की है, तब से पाकिस्तान निशाने पर रहा है। इस्लामाबाद को कहा गया कि वह पाकिस्तान में कथित तौर पर रहने वाले अफगान तालिबान के खिलाफ कार्रवाई करे और उसे सुरक्षित पनाह देना बंद करे। यही नहीं, इस्लामाबाद से यह भी कहा गया कि वह पाकिस्तान के भीतर और बाहर आतंकी घटनाओं में लिप्त रहने वाले आतंकवादी समूहों के खिलाफ कार्रवाई करे। यह मामला तब और गंभीर हो गया, जब नए वर्ष पर राष्ट्रपति ट्रंप ने ट्वीट किया कि  अमेरिका ने मू्र्खतापूर्ण तरीके से पिछले पंद्रह साल में पाकिस्तान को 33 अरब डॉलर की सहायता दी है और उसने हमसे झूठ बोला और धोखा दिया। वह सोचता है कि हमारे नेता मूर्ख हैं। वे उन आतंकवादियों को सुरक्षित पनाह देते हैं, जिन्हें हम अफगानिस्तान में खोज रहे हैं। पर यह सिलसिला अब और नहीं!



शीघ्र ही ट्रंप प्रशासन ने घोषणा की कि अमेरिका संभवतः 25 करोड़ डॉलर से ज्यादा की सहायता राशि रोक लेगा, जो आतंकी गुटों पर ज्यादा प्रभावी ढंग से कार्रवाई करने में पाकिस्तान की विफलता के कारण अगस्त में इस्लामाबाद को नहीं भेजी गई थी। वाशिंगटन की ओर से यह धमकी भी दी गई कि अगर इस्लामाबाद हक्कानी नेटवर्क के अफगान तालिबान गुट पर कार्रवाई करने से इन्कार करता है, तो अमेरिका एकतरफा कार्रवाई करेगा और पाकिस्तान के भीतर घुसकर हमला बोल देगा।


ट्रंप को शायद इसका एहसास नहीं है कि यह नब्बे का दशक नहीं है। पाकिस्तान ने अब काफी लंबा रास्ता तय कर लिया है, और आर्थिक रूप से, खासकर अरबों की चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के शुरू होने और विदेशी निवेश आने से अब वह वाशिंगटन से निर्देश नहीं लेगा। अब वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष पर भी निर्भर नहीं है। ट्रंप को बताया गया कि वह अपने 25 करोड़ डॉलर अपने पास रख सकते हैं, क्योंकि पाकिस्तान को उसकी जरूरत नहीं है।


सेना मुख्यालय, रावलपिंडी में सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने अमेरिकी राजदूत डेविड हेले से बात करते हुए कहा कि आतंकवाद के खिलाफ निरंतर युद्ध पाकिस्तान के राष्ट्रीय हित में जारी रहेगा, किसी को खुश करने के लिए नहीं। सेना के मीडिया प्रभाग द्वारा जारी एक बयान में बाजवा को यह कहते हुए उद्धृत किया गया कि 'हम अमेरिका से कोई भी सामग्री और वित्तीय मदद नहीं, बल्कि हमारे योगदान के प्रति भरोसा, समझ और स्वीकृति चाहते हैं।'


पिछले कई दशकों से पाकिस्तान ने हथियार और गोला-बारूद आयात करने में विविधता लाई है और अमेरिका के अलावा उसने चीन, रूस एवं तुर्की जैसे देशों से भी हथियार खरीदने शुरू कर दिए हैं। आज पाकिस्तान पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर नहीं है, क्योंकि वह अपनी रक्षा जरूरतों के लिए खुद भी हथियार बना रहा है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने भी ट्वीट करके आक्रोश व्यक्त किया है, 'आतंकवाद-विरोधी सहयोगी के रूप में पाकिस्तान ने अमेरिका को मुफ्त में जमीन, वायु संचार, सैन्य ठिकाने और खुफिया सहयोग प्रदान किया, जिसने पिछले सोलह वर्षों में अल-कायदा को तबाह कर दिया, लेकिन उन्होंने हमें फटकार और अविश्वास के अलावा कुछ नहीं दिया।'


आज पाकिस्तान उन सभी सेवाओं के लिए अमेरिका को भुगतान करने के लिए कह रहा है, जो उसने उसे कई दशकों तक मुफ्त में उपलब्ध कराया है। ट्रंप के एक करीबी सहयोगी मानते हैं कि वे पाकिस्तान को नहीं धमका सकते और पाकिस्तान के साथ रिश्ते खराब करने का मतलब है कि अफगानिस्तान तक पहुंचने के सभी जमीनी और समुद्री रास्ते अमेरिका के लिए पूरी तरह से बंद हो सकते हैं। अमेरिका को कराची बंदरगाह से काबुल तक दैनिक जरूरत की वस्तुएं और हथियार पहुंचाने के लिए पाकिस्तान के सड़क मार्ग की जरूरत है। अगर यह आपूर्ति बंद हो जाती है, तो हजारों अमेरिकी और नाटो सैनिक अफगानिस्तान में कैसे रह पाएंगे? अमेरिका केवल अफगानिस्तान के सुरक्षा मामलों की दृष्टि से पाकिस्तान को देखता है। जाहिर है, धीरे-धीरे वाशिंगटन का मन बदलेगा और अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ट्रंप को समझाएगा कि पाकिस्तान को धमकाने और डराने से काम नहीं चलने वाला।


अमेरिकी जनरलों की ओर से जनरल बाजवा को फोन आने शुरू हो गए हैं और उन्हीं में से एक बातचीत में अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रमुख जनरल जोसेफ वोटेल ने पाकिस्तानी सैन्य प्रमुख को आश्वस्त किया कि अमेरिका पाकिस्तान के भीतर आतंकियों पर एकतरफा हमला नहीं करेगा।
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पिछले हफ्ते ट्रंप ने विदेश मंत्रालय की कार्यवाहक सहायक सचिव एलिस वेल्स को इस्लामाबाद भेजा, जहां उन्होंने स्वीकारा कि पाकिस्तान न केवल आतंकवाद को खत्म करने में सफल रहा है, बल्कि अफगानिस्तान और इस इलाके में स्थिरता के लिए भी पाकिस्तान-अमेरिका का रिश्ता बेहद महत्वपूर्ण था। लौटते वक्त उन्होंने कहा कि एक स्थिर और समृद्ध क्षेत्र को लेकर आपसी हित के आधार पर अमेरिका पाकिस्तान के साथ एक नए रिश्ते की ओर बढ़ना चाहता है। उन्होंने पाकिस्तान सरकार को अपने क्षेत्र में हक्कानी नेटवर्क और अन्य आतंकी गुटों की निरंतर मौजूदगी से निपटने का आग्रह किया।


अब लगता है कि दोनों मुल्कों ने यह फैसला किया है कि वे क्षेत्र में स्थिरता के लिए मिलकर काम करने की इच्छा रखते हैं। लेकिन असली परीक्षा अफगानिस्तान में होगी। अगर अफगान तालिबान द्वारा अमेरिकी और नाटो सैनिकों पर हमला जारी रहता है तथा और भी क्षेत्र उनके हाथ से निकल जाते हैं, तो एक बार फिर अमेरिका पाकिस्तान पर दबाव बनाना शुरू कर देगा। 

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