हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के प्रमुख चालीस अर्थशास्त्रियों और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों के साथ मंथन किया। यह आयोजन नीति आयोग ने आर्थिक नीति के मसले पर किया था। इसमें कृषि क्षेत्र एवं ग्रामीण विकास, शहरी इलाकों में बुनियादी ढांचा, स्वास्थ्य व शिक्षा, रोजगार, विनिर्माण एवं निर्यात जैसे छह अहम विषयों पर विचार विमर्श किया गया।
गौरतलब है कि इसी महीने की शुरुआत में केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने चालू वित्त वर्ष 2017-18 में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 6.5 फीसदी रहने का जो अनुमान पेश किया है, उसके बाद यह बैठक हुई। पिछले वित्त वर्ष 2016-17 में जीडीपी की कुल वृद्धि दर 7.1 फीसदी थी। चालू वित्त वर्ष 2017-18 में 6.5 फीसदी विकास दर पिछले चार वित्तीय वर्ष के न्यूनतम स्तर पर होगी। घटी हुई विकास दर के मद्देनजर इस बैठक में यह बात उभरकर सामने आई कि बाजार मांग में गिरावट आई है। आशा के अनुरूप रोजगार पैदा नहीं हुआ। विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि कम रही। लोगों की क्रय शक्ति घट गई है। घरेलू खपत कमजोर पड़ने से वस्तुओं के उत्पादन और नए कारोबार मुश्किल में रहे। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से भी अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ा। सरकारी बैंकों का कुल फंसा कर्ज और बढ़ गया। ऋण वृद्धि कई दशकों के निचले स्तर पर आ गई है।
देश में रोजगार न बढ़नेे के कई कारण रहे हैं। सेवा क्षेत्र के तहत कई क्षेत्रों में नौकरियों की वृद्धि का अनुपात समान नहीं रहा। कई सेवाओं और आईटी सेक्टर में प्रौद्योगिकी और स्वचालन के कारण रोजगार घटे। विनिर्माण और कृषि जैसे अधिक रोजगार देने वाले क्षेत्र धीमी विकास गति के कारण पर्याप्त रोजगार अवसर निर्मित नहीं कर पाए। अधिकांश विशेषज्ञों का मत था कि देश का करीब 20 फीसदी शिक्षित युवा बेरोजगार है, लिहाजा नई रणनीति के केंद्र में रोजगार सृजन सबसे मुख्य मुद्दा होना चाहिए। नीति आयोग के राजीव कुमार ने कहा कि आयोग जल्द ही उस टास्क फोर्स की रिपोर्ट सामने लाएगा, जिसका गठन रोजगार सृजन पर हाई फ्रीक्वेंसी डेटा का अध्ययन करने के लिए किया गया था। निश्चित रूप से वर्तमान परिवेश में रोजगार केंद्रित विकास की रणनीति जरूरी है।
ऐसी रणनीति के तहत सरकार को बड़े रोजगार लक्ष्यों को पाने के लिए मैन्यूफैक्चरिंग, कृषि और सेवा क्षेत्र के योगदान के मौजूदा स्तर को बढ़ाना होगा। मेक इन इंडिया को गतिशील करना होगा। उन ढांचागत सुधारों पर भी जोर देना होगा, जिसमें निर्यातोन्मुखी विनिर्माण क्षेत्र को गति मिल सके। ऐसा करने से भारत में आर्थिक एवं औद्योगिक विकास के साथ रोजगार की नई संभावनाएं आकार ग्रहण कर सकती हैं।
चूंकि अमेरिका सहित दुनिया के कई देशों के उद्योग और कारोबारी संस्थान चीन में कारोबार करने में दिक्कतें बढ़ने की लगातार शिकायतें करते रहे हैं, ऐसे में कई देशों के उद्योग चीन की जगह भारत की ओर आकर्षित हो सकते हैं। इसलिए मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा देकर भारत दुनिया का नया कारखाना बन सकता है और रोजगार के नए अवसरों में वृद्धि कर सकता है। इसके साथ ही एक ओर जहां शैक्षणिक दृष्टि से पीछे रहने वाले युवाओं को कौशल विकास से प्रशिक्षित कर उन्हें रोजगारोन्मुखी पाठ्यक्रमों से शिक्षित करने पर ध्यान देना चाहिए, वहीं गांवों के गरीब, अशिक्षित और अर्ध शिक्षित लोगों को रोजगार देने के लिए निम्न तकनीक विनिर्माण में लगाना होगा। मौजूदा कमजोर बाजार मांग की दशा में सरकार के द्वारा निवेश बढ़ाने पर ही निजी निवेश भी बढ़ पाएगा।