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मुद्दा: चीता, नियम और भावनाएं... इन दिनों प्रकृति से प्रेम और उसे बचाने की जिम्मेदारी और अधिक है

क्षमा शर्मा
Updated Tue, 15 Apr 2025 04:51 AM IST

सार

अभयारण्यों में जानवरों के पास जाने के नियम होते हैं। फिर भी, भाग-दौड़ की दुनिया में कोई निरीह जानवरों के बारे में सोच रहा है, तो बड़ी बात है। 
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चीतों के प्रति संवेदनशीलता जरूरी - फोटो : अमर उजाला प्रिंट


यह वीडियो वायरल हुआ। बस फिर क्या था! बेचारे की आफत आ गई। अनुशासनात्मक कार्रवाई करके, उसे काम से हटा दिया गया। अधिकारियों का कहना था कि चीतों को जंगल में भगा दिया जाता। उन्हें पानी पिलाना ठीक नहीं था। शायद उन्हें लगा हो कि अगर कोई और ऐसा करे और चीते उस पर आक्रमण कर दें, तो क्या हो। मान लीजिए उन्हें जंगल में भगा भी दिया जाता, तो क्या जरूरी है कि उन्हें पानी का स्रोत आसपास ही मिल जाता और वे अपनी प्यास बुझा लेते। किसी प्यासे को पानी पिलाना, इसी देश में सबसे बड़ा पुण्य माना जाता है। और चीतों को पानी पिलाने के अपराध में एक युवक को नौकरी से हटाना कहां का न्याय है? 


जल-जंगल, जमीन प्रकृति ने सबके लिए सौंपे थे। मगर मनुष्य की एकाधिकार वाली प्रवृत्ति ने सबको कब्जे में कर लिया। बहुत से तालाब, कुओं, बावड़ियों को नष्ट कर दिया। नदियां इतनी प्रदूषित हो गईं कि उनका पानी पीने तो क्या, जानवरों के नहाने लायक न रहा। आखिर क्या इन सब बातों के लिए मनुष्य से इतर प्रजातियां जैसे कि पशु-पक्षी, पेड़ जिम्मेदार हैं? आखिर गर्मी के दिनों में ये पशु-पक्षी कहां जाएं? कैसे इनकी प्यास बुझे। एक दिन दोपहर में देखा कि एक गाय प्यास से तड़प रही थी, तो एक हलवाई के यहां काम करने वाले लड़के ने उसे पानी पिलाया था। लेकिन हमेशा ऐसा हो, जरूरी तो नहीं। गर्मी के दिनों में प्यास के कारण बहुत से जानवर-पक्षी बेहोश हो जाते हैं। लेकिन कानून को इन बातों से क्या मतलब! कानून भावना नहीं देखता है। उसे तो डंडा चलाने से मतलब होता है। किसी प्यासे पशु-पक्षी को बचाना जरूरी है या पहले नियमों का पालन करो, तब तक अगर वे दम तोड़ दें, तो उनकी किस्मत।


उत्तर प्रदेश का वह लड़का आरिफ तो याद ही होगा। जिसे एक प्रवासी सारस घायल अवस्था में मिला था। आरिफ ने उसकी देखभाल की। सारस उसका मित्र बन गया। आरिफ जहां जाता, सारस उसके साथ-साथ जाता। साथ ही खाता-पीता। अधिकारियों को जब इस सारस के बारे में पता चला, तो वे इसे छीनकर चिड़ियाघर ले गए। आरिफ बहुत रोया-गिड़गिड़ाया, लेकिन किसी ने उसकी एक न सुनी। बाद में वह चिड़ियाघर में सारस से मिलने गया, तो वह आरिफ को देखकर नाचने लगा। आरिफ रोता हुआ वहां से वापस आया। क्या सारस को आरिफ जैसा प्यार, चिड़ियाघर में मिल रहा होगा। बिल्कुल नहीं।


नौकरी जाने के बाद सत्यनारायण ने कहा कि उसने चीतों को पानी पिलाकर कोई गलत काम नहीं किया है, बल्कि अपने पूर्वजों की परंपरा को निभाया है। मेरे पूर्वज यहां शेरों को पानी पिलाया करते थे। उसने यह भी कहा कि चीतों को पानी पिलाकर उसने बहादुरी का काम किया है। वे प्यासे थे, इसलिए गाड़ी में रखा पानी निकालकर उन्हें पिलाया। लोगों को यह संदेश भी दिया कि इन जंगली जानवरों से डरें नहीं, वे हमारे मित्र हैं। कोई अधिकारी इतनी हिम्मत करके दिखाए, जबकि अधिकारियों का कहना था कि वीडियो बनाना और उसे प्रसारित करना गलत था। सत्यनारायण ने इस घटना के बाद अपने फोन को भी बंद कर दिया था। बाद में एक अखबार ने उससे बात की थी। हालांकि, वन विभाग की कार्रवाई की चौतरफा आलोचना होने और गुर्जर समाज द्वारा सत्यनारायण को सम्मानित करने के बाद उसे दोबारा से काम पर रख लिया गया है।


दरअसल, सत्यनारायण का काम तारीफ के योग्य है। आजकल की भाग-दौड़ की दुनिया में कोई अपने से इतर इन निरीह जानवरों के बारे में सोच रहा है, तो इसमें क्या गलत है? कायदे से तो अधिकारियों को चाहिए कि वे इस वीडियो से प्रेरणा लें और कूनो नेशनल पार्क में जगह-जगह इतने पानी के स्रोत विकसित करें कि कोई पशु-पक्षी प्यासा न रहे। ध्यान रखें कि प्यास सिर्फ मनुष्यों को ही नहीं लगती। धरती के बाकी जीवधारियों को भी प्यास लगती है।


दिल्ली के जैन पक्षी अस्पताल में गर्मी के दिनों में ऐसे बहुत-से पक्षी आते हैं, जो प्यास के कारण बीमार पड़ गए होते हैं। बेहोश हो जाते हैं। उन्हें लू लग जाती है। मानवीय सरोकारों का ध्यान कानून को क्यों नहीं रखना चाहिए? इन दिनों तो प्रकृति से प्रेम और उसे बचाने की जिम्मेदारी और अधिक है।

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