आज महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती है। आज भी देश और दुनिया के समक्ष जो चुनौतियां हैं, उसके समाधान के लिए लोगों का ध्यान गांधी की तरफ जाता है। इसके कई बुनियादी कारण हैं। पहला कारण तो यह है कि बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है और अमीर-गरीब के बीच खाई निरंतर चौड़ी होती जा रही है। इसके कारण समाज में अशांति फैल रही है और असंतोष गहरा होता जा रहा है। इतना ही नहीं, देश और दुनिया के सामने पर्यावरण संकट का भी एक विकट सवाल खड़ा हो गया है। पर्यावरण के संकट को अभी-अभी हमने केरल की बाढ़ के रूप में देखा है। दुनिया में जगह-जगह कई तरह की प्राकृतिक आपदाएं आती रहती हैं, वे सभी पर्यावरण संकट के कारण ही हैं।
ये संकट हमें इस दिशा में सोचने पर मजबूर कर रहे हैं कि जिस तरह से हम पर्यावरण का विनाश करके विकास कर रहे हैं, वह हमें कहां ले जाएगा! ऐसे संकटों का समाधान तलाशने वाले लोगों को गांधी याद आते हैं, क्योंकि गांधी ने कहा था कि इस धरती पर लोगों की आवश्यकताएं पूरी करने के लिए भरपूर संसाधन हैं, लेकिन एक आदमी के भी लालच को पूरा करने की क्षमता नहीं है। यानी यह जो भोगवादी दर्शन है, उसमें लोगों की कृत्रिम आवश्यकताओं को बढ़ाने का भी एक बड़ा धंधा चल रहा है। लोगों के लालच की पूर्ति के लिए प्रकृति और उसके संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हो रहा है। प्रकृति के संतुलन के लिए इन संसाधनों का सीमित उपयोग ही हमें करना चाहिए, लेकिन विकास का मौजूदा मॉडल प्रकृति के अंधाधुंध दोहन पर टिका है। नतीजतन प्रकृति का रौद्र रूप सामने आता है।
गांधी ने अपने विचारों के जरिये इन समस्याओं से निपटने का संकेत दिया है। पश्चिमी विकास मॉडल को गांधी जी ने अंधी पागल दौड़ बताते हुए कहा था कि यह हमें विनाश की ओर ले जाता है। अगर विनाश से बचना है, तो हमें विकास की दिशा बदलनी होगी। शोषण पर आधारित विकास हमें नहीं चाहिए, शोषण चाहे प्रकृति का हो या समाज के कमजोर तबकों का हो, वह हमें अंततः विनाश की तरफ ले जाएगा। पश्चिमी विकास का आदर्श राष्ट्र है अमेरिका, जिसका सबसे अधिक मुनाफा देने वाला उद्योग है शस्त्रों का निर्माण। सबसे अधिक टेक्नोलॉजी का विकास हथियारों के निर्माण में हुआ है। और जब हथियार मुनाफे का, व्यापार का प्रमुख जरिया बन जाएगा, तब उसकी खपत और उसके उपयोग की रणनीति भी बनानी पड़ेगी। ये दुनिया में जो विभिन्न रूपों में हिंसा बढ़ रही है, चाहे वह आतंकवाद के रूप में हो या एक देश का दूसरे देश से टकराव के रूप में हो, उसके पीछे हथियारों का बड़े पैमाने पर निर्माण ही है। ये समस्याएं हमें गांधी जी की तरफ देखने के लिए मजबूर कर रही हैं, क्योंकि उन्होंने हिंसा के बजाय अहिंसा का मार्ग सुझाया था।
आज की जो अर्थव्यवस्था है, उसका पूरा ढांचा हिंसा और शोषण पर आधारित है। गांधी ने अर्थनीति को एक नया ढांचा दिया था। उनका कहना था कि मनुष्य जहां रहता है, वहीं उसकी बुनियादी जरूरतें पूरी होनी चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि आवश्यकताओं की पूर्ति के साधन भी प्रकृति के सहयोग, मनुष्य की प्रतिभा, क्षमता और उत्पादक सृजनशीलता से वहीं तैयार किए जाने चाहिए। लेकिन अभी हो यह रहा है कि कच्चे माल को कहीं दूर केंद्रीकृत कारखानों में ले जाया जाता है और वहां वस्तुओं का उत्पादन करके उन्हें मुनाफे और मिलावट के साथ लोगों के सामने परोसा जाता है। गांधी जी कहते हैं कि जहां अनाज, दलहन, तिलहन का उत्पादन होता है, वहीं उसका प्रसंस्करण क्यों नहीं होना चाहिए। अगर ऐसा होगा, तो उत्पादन लागत भी घटेगी और लोगों को रोजगार भी मिलेगा। इससे श्रमिक वर्ग को सम्मान की जिंदगी मिलेगी और ईमान की रोटी खाने का अवसर मिलेगा। गांधी तकनीक के खिलाफ नहीं थे, लेकिन वह मनुष्य को बेकार बनाने वाली तकनीक के खिलाफ थे।
गांधी उस तकनीक का स्वागत करते हैं, जिससे मनुष्य की कुशलता बढ़े, श्रम और उत्पादन करने का आनंद बढ़े। खादी ग्रामोद्योग का जो विचार-दर्शन उन्होंने दिया है, वह कृषि, ग्रामोद्योगिक, मानवीय श्रम पर आधारित है। उन्होंने अपने प्रयोग से उसे सफल करके दिखाया भी। गांधी की इस विकेंद्रित अर्थनीति को दुर्भाग्य से हमारे नीति निर्माताओं ने राष्ट्रीय योजना में शामिल नहीं किया, इसलिए बेरोजगारी और विषमता बढ़ रही है। नई प्रौद्योगिकी मनुष्य को बेकार बना रही है। बड़े-बड़े कारखानों में मनुष्य के बदले रोबोट काम कर रहे हैं, ऐसे में बेरोजगारी तो बढ़ेगी ही।
गांधी जी ने स्वराज के आंदोलन में महिलाओं की सहभागिता सुनिश्चित की थी। उन्होंने महिला समूह को आगे बढ़ाया था। ढड़साणा के नमक सत्याग्रह में उन्होंने सरोजनी नायडू को उसका नेतृत्व सौंपा था। एक बार सत्याग्रह में कस्तूरबा ने जाने की इच्छा व्यक्त की थी, तो गांधी जी ने उसकी इजाजत उन्हें दी। शराबबंदी के लिए आंदोलन चलाने का नेतृत्व भी उन्होंने महिलाओं को सौंपा। गांधी के आश्रमों में भी महिलाओं की पूरी भागीदारी रहती थी।
आज दुखद स्थिति यह है कि महिलाओं को वस्तु की तरह माना जाता है। गांधी मानते थे कि महिलाओं को संरक्षिता नहीं होनी चाहिए, बल्कि स्वरक्षिता बननी चाहिए। आज महिलाओं की जागरूकता और आत्मनिर्भरता बढ़ाने की जरूरत है और उनके प्रति संवेदनशील मानवीय दृष्टि रखने की आवश्यकता है।
गांधी का राष्ट्रवाद दूसरे मुल्कों को दुश्मन घोषित करना नहीं है। गांधी का राष्ट्रवाद व्यक्ति और परिवार से विकसित होते हुए दूसरे राष्ट्रों तक जाता है और वह व्यापक होते-होते भारत के आदि मंत्र ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ तक जाता है। गांधी का राष्ट्रवाद किसी भी राष्ट्र के प्रति हिंसा, प्रतिरोध और प्रतिक्रिया में खड़ा नहीं होता। गांधी का राष्ट्रवाद आक्रामक नहीं, मानवीय है। लेकिन आज हम राष्ट्रवाद को अत्यंत संकीर्ण रूप में देखते हैं, और यह यहां तक संकीर्ण हो गया कि हमसे जो सहमत नहीं है, वह राष्ट्रद्रोही है। यह बहुत ही गलत और राष्ट्र की भावना को क्षत-विक्षत करने वाली दृष्टि है। हमारे नेताओं को गांधी की उस व्यापक भूमिका को समझना चाहिए। दुनिया भर में जो संघर्ष चल रहे हैं, वे राष्ट्रवाद की संकीर्ण सोच के कारण हैं। उनसे तभी मुक्ति मिलेगी, जब हम व्यापक दायरे में अपनी सोच, अपने चिंतन को विकसित करेंगे।