आजादी के बाद गांधी का मुख्य सपना ग्राम स्वराज का था। उन्होंने कहा था कि अंग्रेजों की गुलामी से तो हमें आजादी मिल गई, भारत के लाखों गांवों में अंतिम व्यक्ति तक आजादी का भान होना चाहिए। इसको आत्मसात करने के लिए 18 रचनात्मक कामों की सूची प्रस्तुत की गई थी, जिसमें बुनियादी तालीम एक महत्वपूर्ण काम था। गांधी की हत्या के बाद अखिल भारतीय नई तालीम से लेकर जयप्रकाश नारायण, विनोबा भावे के साथ हजारों सर्वोदय विचार की संस्थाओं ने बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात आदि कई राज्यों में बुनियादी शालाएं चलाई हैं, जिसे आज की शिक्षा व्यवस्था ने मरणासन्न कर दिया है।
बुनियादी तालीम की तर्ज पर उत्तराखंड के टिहरी जिले में 1977-78 से लोक जीवन विकास भारती नई तालीम विद्यापीठ चला रही है। हर वर्ष औसतन पचास से सौ बच्चे इस केंद्र पर शिक्षा ग्रहण कर रहे है। पहले इसमें बालक ही दाखिला लेते थे, पर अभी यहां सौ बालिकाएं कक्षा आठ तक की पढ़ाई कर रही हैं। यहां का पाठ्यक्रम सरकारी स्कूलों जैसा है, पर हर विषय की अलग प्रयोगशाला और किताबों के अध्याय के अनुसार ही पढ़ाई और दैनिक अभ्यास का काम होता है।
यहां सिलाई-बुनाई, खेती, बागवानी, बिजली उत्पादन, जल संरक्षण, पाक कला आदि की शिक्षा दी जाती है। पढ़ाई के साथ बच्चों में हाथ से काम करने की आदत डाली जाती है, ताकि उन्हें नौकरी के लिए सरकार का मुंह न ताकना पड़े। इससे छात्र पढ़ाई के बाद भी गांव में रहना पसंद करेंगे। जल, जंगल, जमीन को प्राकृतिक उपहार की तरह देखने और इससे चल सकने वाली आजीविका के प्रयोग विद्यापीठ में मौजूद हैं। पास में बह रही मेड नदी से 50 किलोवाट बिजली बनाकर फल प्रसंस्करण, लोहा व लकड़ी की कला, वेल्डिंग आदि कई काम किए जाते हैं। यह आवासीय विद्यालय भी है, जहां कई मौकों पर शिक्षक शिष्य बन जाते हैं और शिक्षार्थी गुरु की भूमिका में दिखाई पड़ते हैं। यहां सुबह सफाई करने से लेकर भोजन बनाना, दैनिक अभ्यास, सांस्कृतिक कार्यक्रम, छात्रावास को देखने आदि का काम सब एक साथ करते हैं। इसमें शिक्षा ग्रहण कर रहे बच्चे अतिथियों का भावपूर्ण स्वागत करते हैं और उनके अनुभवों को सुनकर अपनी डायरी में दर्ज करते हैं। दिन भर के कार्यक्रम में बच्चों द्वारा जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति के गीत, नदियों व वनों को बचाने के गीत के साथ कई तरह के नुक्कड़ नाटकों की प्रस्तुतियां होती हैं। पिछले चालीस साल में इस स्कूल से करीब एक हजार बच्चों ने कक्षा आठ तक की पढ़ाई की है। आगे चलकर वे ग्रेजुएट बनते हैं, और इनमें से कोई बेरोजगार नहीं है।
इस स्कूल के संस्थापक बिहारी लाल हैं। महात्मा गांधी द्वारा स्थापित सेवाग्राम आश्रम में नई तालीम की शिक्षा ग्रहण करने और कई जगहों पर काम करने के बाद जब वह 1977 में उत्तराखंड के अपने गांव में लौटे, तो शिक्षा और रोजगार की दृष्टि से श्रम संविदा सहकारी समिति बनाकर 200 से अधिक मजदूरों को काम देने के साथ ही उन्हें पांचवीं कक्षा उत्तीर्ण करवाया। इन्होंने भिलंगना ब्लॉक में जल संरक्षण, वन संरक्षण और छोटी पनबिजली के मॉडल खड़े किए तथा चिपको आंदोलन को अपने गांव में सविनय अवज्ञा आंदोलन के रूप में चलाया, जिसमें वन काटने वाले मजदूरों को राशन, पानी, आवागमन आदि में कोई स्थानीय सहयोग नहीं मिला, जिस कारण ठेकेदारों को अपने मजदूरों के साथ वापस लौटना पड़ा।
-लेखक उत्तराखंड सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष हैं।