जाट नेता, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और कुछ समय के लिए भारत के उप प्रधानमंत्री रहे दिवंगत चौधरी देवीलाल ने एक बार व्यंग्य किया था, ‘क्या चुनावी घोषणा पत्र कोई मतलब रखते हैं और अगर मुख पृष्ठ पर लिखे नामों और पार्टियों के चुनाव चिह्नों को छोड़ दें, तो क्या ये सारे एक जैसे नहीं लगते?’
7 अप्रैल से शुरू हो रहे लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं। 36 दिनों तक, नौ चरणों में होने वाले इन चुनावों में 81 करोड़ से भी ज्यादा मतदाता 28 राज्यों और सात केंद्र शासित प्रदेशों से लोकसभा के 543 सदस्यों को चुनने के लिए अपने वोट का प्रयोग करेंगे। ऐसे में यह सही मौका है जब लुभावने वायदे करते पार्टियों के घोषणा पत्रों पर बात की जाए। भारत में चुनावों का मतलब ही है, जोर-शोर से टेलीविजन पर होने वाली चुनावी चर्चाएं, कौन-सा नेता कौन-सी पार्टी छोड़ गया या फलां नेता की नाराजगी, इन सब पर गरमा-गरम बहसें, राजनेताओं के बीच होने वाले वाक्-युद्ध के अलावा मोदी लहर, राहुल गांधी की दुविधा, आप की चुनौतियां और क्षेत्रीय प्रेरणाओं के मद्देनजर प्रिंट, ऑनलाइन और सोशल मीडिया पर चलने वाला शाब्दिक संघर्ष।
राजनीति और राजनीतिक स्वांगों का ऐसा अनूठा संगम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में उत्सव जैसा माहौल पैदा कर देता है। आगामी लोकसभा चुनाव 1977 के बाद सबसे महत्वपूर्ण चुनाव माने जा रहे हैं। लेकिन दो सबसे बड़ी पार्टियों कांग्रेस और भाजपा ने अब तक अपना चुनावी घोषणा पत्र जारी नहीं किया है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को अपना घोषणा पत्र 21 मार्च को जारी करना था, लेकिन अब यह तारीख अगले हफ्ते के लिए टाल दी गई है। भाजपा सूत्रों की मानें, तो पार्टी अपना घोषणापत्र इस महीने के अंत तक ही पेश कर सकती है। राजनीति के मैदान की नई खिलाड़ी ‘आम आदमी पार्टी’ भी इस मामले में कतई पीछे नहीं है। ‘आप’ के घोषणापत्र की भी अब तक कोई तारीख तय नहीं है। राष्ट्रीय दलों में केवल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने अपना घोषणा पत्र जारी किया है, जिसमें उसने गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपाई तीसरे मोर्चे के गठन की बात दोहराई है।
सवाल उठता है कि क्या सारे चुनावी घोषणा पत्र दिखावटी होते हैं? बड़ी पार्टियों के घोषणापत्रों को लेकर सुगबुगाहट का बाजार बेशक गर्म है, लेकिन अर्थव्यवस्था के उत्थान, सामाजिक क्षेत्र में निवेश, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर इन पार्टियों का एजेंडा क्या है, यह साफ न हो पाने की वजह से हम में से ज्यादातर लोग परेशान हैं। घोषणा पत्रों में देरी के पीछे शायद यह सोच काम करती है कि भारतीय मतदाता केवल नेता चुनते हैं और गवर्नेंस की प्राथमिकताएं चुनने की जिम्मेदारी उस नेता पर ही छोड़ देते हैं। चुनावी घोषणा पत्रों को तैयार करने वाले लोगों से बात करने पर एक अलग ही नजरिया सामने आता है। दरअसल, इस बार के चुनावों में राजनीतिक घोषणा पत्र का उपयोग जनता के मिजाज को भांपने के जरिये के तौर पर करने की तैयारी की जा रही है।
चुनाव के बाद ये घोषणा पत्र उनके खिलाफ मोर्चा खोलने में प्रयोग किए जा सकते हैं, इसे लेकर भी राजनीतिक दल सचेत हैं। भारतीय आपदा प्रबंधन संघ के अध्यक्ष और भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र को तैयार करने वाली टीम से जुड़े राजेंद्र गुप्ता बताते हैं, 'आज मीडिया और लोगों की पैनी नजर को ध्यान में रखते हुए घोषणा पत्र तैयार करने में सावधानी बरतना बेहद जरूरी हो गया है। अगर ऐसा न हो तो एक साल के भीतर ही अखबार और टेलीविजन सरकार का रिपोर्ट कार्ड लेकर खड़े हो जाते हैं।'
घोषणा पत्र को तैयार करना आज गवर्नेंस के लिए पार्टी के एजेंडे को तैयार करने जैसा है। यह मतदाताओं के साथ रणनीतिक संवाद कायम करने का महत्वपूर्ण उपकरण बन गया है।
पिछले साल दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी ने घोषणा पत्र तैयार करने में लोगों से रायशुमारी के विचार का प्रदर्शन किया। इसके बाद तो राष्ट्रीय दलों में ऐसा करने की होड़ सी मच गई। हाल ही में निर्वाचन आयोग ने पहली बार घोषणा पत्र तैयार करने की प्रक्रिया का औपचारिक अवलोकन किया है। दरअसल आयोग ने इसे चुनावी आचार संहिता से जुड़ा मामला बताया है। आयोग का कहना है, 'पारदर्शिता, समानता और किए गए वायदों की विश्वसनीयता के मद्देनजर यह जरूरी है कि घोषणा पत्र में वायदों का औचित्य, इन्हें पूरा करने के उपाय और आर्थिक पहलुओं का भी जिक्र हो। तर्कसंगत वायदे ही मतदाताओं का भरोसा जीत सकते हैं।' आयोग का जोर भले ही घोषणा पत्रों में किए गए वायदों के पूरा होने पर न होकर इसे तैयार करने की प्रक्रिया पर हो, लेकिन चुनाव सुधार के नजरिये से यह जरूरी है।