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महिला विरोधी क्यों है समाज

Tue, 08 Jan 2013 12:15 AM IST
सुनील
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इधर महिलाओं के पहनावे, उनकी निजी जिंदगी और उनके व्यवहार को लेकर बहस चल पड़ी है। ऐसा लगता है, मानो सारा दोष महिलाओं का है। नसीहतें दी जाती हैं कि महिलाएं शालीन कपड़े पहनें, अंग-प्रदर्शन न करें, फैशन की होड़ और नकल में न बहें।
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लेकिन महिलाएं ही क्यों, पुरुषों पर भी यह बात क्यों न लागू हो! वैसे पहनावे का बलात्कार या छेड़खानी से कोई रिश्ता नहीं है। यह तर्क आगे जाकर परदा और घूंघट प्रथा का समर्थक बन जाता है। पहनावे के बारे में एक मर्यादा के अंदर व्यक्तिगत आजादी देनी ही होगी। कोई एक नियम नहीं बनाया जा सकता, नहीं तो हम तालिबानी समाज बन जाएंगे।

देश में जितने बलात्कार हो रहे हैं, उसमें पांच फीसदी भी ऐसे नहीं होंगे, जिनमें बलात्कार की शिकार महिला किसी दोस्त के साथ घूमने गई हो या पब में गई हो। गरीब महिला मजदूरी में जाती है, घरों में काम करने जाती है, वहां भी बलात्कार होते हैं। कई बार तो रिश्तेदार या पड़ोसी ही बलात्कार करते हैं, उसमें आप क्या कहेंगे?
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पब संस्कृति पश्चिम की बुराइयों की नकल है, लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि शहर हो या कस्बे या गांव, सभी जगह देशी-विदेशी शराब की नई-नई दुकानें खुलती जा रही हैं, जहां देर रात तक भीड़ लगी रहती है। ज्यादातर अपराध नशे में ही होते हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि महिलाएं देर शाम या रात में घर से बाहर ही नहीं निकलें।

जब महिलाएं समाज में आगे आएंगी, शिक्षित बनेंगी, नौकरी करेंगी, सार्वजनिक जीवन (व्यापार, उद्योग, खेती, मजदूरी, राजनीति, खेल, साहित्य, कला, समाजसेवा आदि) में आगे आएंगी, तो कई बार ऐसे मौके आ सकते हैं। सवाल यह है कि हम एक ऐसा समाज क्यों नहीं बना सकते, जिसमें महिलाएं आजादी के साथ सुरक्षित घूम सकें। घर में बंद रहने पर महिलाओं में हिम्मत और आत्मविश्वास नहीं आएगा, और वे आसानी से शिकार बन जाएंगी।

बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामलों में जिस पर अत्याचार हुआ हो, उसकी ही गलती निकालना और उसे ‘चालू औरत’ बता देना आम बात है। यह एक और अत्याचार है। एक गलत मानसिकता है। इससे बलात्कार को वैधता मिलती है। फिर ‘चरित्र’ के क्या मानदंड हैं? वे ही मानदंड क्या हम पुरुषों पर भी लागू करेंगे?

यह भी कहना ठीक नहीं कि लड़के-लड़कियों में मेलजोल होने से ऐसी घटनाएं होती हैं या सहशिक्षा उचित नहीं हैं। बात उल्टी है। लड़के-लड़कियां, स्त्री-पुरुष जितनी सहजता से घुलेंगे-मिलेंगे, महिलाओं को घर से बाहर निकलने की जितनी आजादी होगी, उतनी ही ऐसी घटनाएं कम होंगी। तब प्यार-मोहब्बत के वाकये होंगे, बलात्कार के नहीं।

इन दोनों में फर्क करने की जरूरत है। स्त्री-पुरुष में आकर्षण एक कुदरती चीज है। बहुत ज्यादा पाबंदी लगाएंगे, कड़े नियम बनाएंगे, तो चोरी-छिपे रिश्ते बनेंगे। ज्यादा विकृतियां पैदा होंगी। खाप पंचायतों और सम्मान के लिए बेटी की हत्या जैसी क्रूरताएं होंगी। यदि अमेरिका-यूरोप एक अति है, तो तालिबानी समाज दूसरी अति है। हमें दोनों से अलग एक सहज, कुंठामुक्त संबंधों वाला समाज बनाना चाहिए। चार वर्ष की छोटी बच्ची से लेकर साठ वर्ष की वृद्ध महिलाओं तक के साथ ऐसी घटनाएं होती हैं। यह एक पागलपन है, जो उम्र, कपड़े, जाति कुछ नहीं देखता है।

दिल्ली की घटना के बाद से बलात्कारियों को फांसी देनी की बातें भी कही जा रही हैं। मगर इसके कोई सुबूत नहीं हैं कि फांसी की सजा होने से अपराधों में कमी आती है और न होने से अपराध बढ़ जाते हैं। सजा के रूप में किसी की जान लेना एक अमानवीय काम है तथा एक और अपराध है। इसलिए दुनिया के बीस देशों को छोड़कर बाकी 178 देशों में अब फांसी की सजा नहीं दी जाती।

उल्टे फांसी की सजा का प्रावधान होने से दो तरह से बलात्कारी को सजा की संभावनाएं कम हो जाएंगी- पहला, बलात्कार के साथ उस महिला को जान से खत्म करने की प्रवृत्ति बढ़ जाएगी। तब बयान देने वाला भी कोई नहीं बचेगा। दूसरा, न्यायाधीश भी सजा देने में हिचकेंगे, क्योंकि फांसी की सजा बिरले तौर पर बहुत नृशंस मामलों में तभी दी जा सकती है, जब अपराध पूरी तरह सिद्ध हो। इस तरह मुलजिम को संदेह का लाभ देकर छोड़ दिया जाएगा।
 
यह ठीक है कि कानून, पुलिस और न्याय व्यवस्था में सुधार होना चाहिए। तुरंत कार्रवाई हो, सही केस बने, जल्दी व सही न्याय हो और अपराधियों को सजा हो, तो अपराधियों में एक डर बैठेगा। इसके लिए पुलिस में सुधार बहुत जरूरी है, जो अंग्रेजों के साम्राज्य के ढर्रे पर ही चल रही है। पुलिस में भी गहरी महिला-विरोधी मानसिकता है।
यह मामला केवल कानून-व्यवस्था का नहीं है।

जैसे दहेज प्रथा को केवल कानून से नहीं रोका जा सका है (हालांकि अच्छा कानून जरूरी है), उसी तरह बलात्कार, छेड़खानी और महिलाओं पर अत्याचारों को रोकने के लिए समाज की मानसिकता, प्रवृत्तियों और समाज के मौजूदा ढांचे को बदलना जरूरी है। इसके लिए सबसे पहले तो स्त्री विरोधी मानसिकता को बदलना होगा। बलात्कार की शिकार महिला तो जीवन भर के लिए कलंकित हो जाती है, लेकिन बलात्कारी पुरुष का सामाजिक बहिष्कार भी नहीं होता।

बलात्कार करके लोग विधायक, सांसद और मंत्री भी बन जाते हैं। जैसे सारी गालियां महिलाओं के खिलाफ होती हैं, जिनका दिन-रात इस्तेमाल होता है। इनका अवचेतन पर भी असर पड़ता है। महिलाओं के खिलाफ भेदभाव की वह व्यवस्था खत्म की जाए, जो मां के पेट से भ्रूण-हत्या के रूप में शुरू हो जाती है और बचपन, जवानी, बुढ़ापे से लेकर मौत तक चलती रहती है। केवल ज्यादा पुलिस, त्वरित अदालतों, सीसीटीवी कैमरों और जीपीएस सिस्टम से यह गंभीर विकृति खत्म नहीं होगी। इसके लिए मानसिकता को बदलना होगा और एक नए समाज का निर्माण जरूरी होगा।
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