अवैध क्लिनिकल परीक्षण का सवाल अब नए सिरे से सुर्खियों में आया है। अभी इंदौर में आयोजित जनसुनवाई में इन परीक्षणों का शिकार हुए लोगों के क्षुब्ध परिजनों की खबर को लेकर चर्चा चल ही रही थी कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस मामले में किए गए हस्तक्षेप का समाचार आया है।
जस्टिस आर एम लोढा एवं जस्टिस ए आर दवे की पीठ ने इस मसले पर पेश जनहित याचिका पर सुनवाई में कुछ अहम बातें कहीं। हर व्यक्ति के जीवन को महत्वपूर्ण बताते हुए अदालत ने केंद्र सरकार के रुख पर नाराजगी प्रकट की, जिसने इन अवैध चिकित्सकीय परीक्षणों को लेकर ठोस कार्रवाई अब तक नहीं की है और कई मौके दिए जाने के बाद भी कमजोर कानून ही बनाए हैं।
इस सुनवाई में यह विचलित करने वाला तथ्य भी सामने आया कि वर्ष 2004 से 2008 के दरम्यान यूनियन कार्बाइड संयंत्र में हुए गैस कांड के बचे 250 लोगों पर एक विशेष दवाई का परीक्षण किया गया और लोगों को बिना बताए किए गए उस परीक्षण में भोपाल मेमोरियल अस्पताल ने 100 लाख रुपये कमाए। अगर हम अदालत में पेश किए गए आंकड़ों को देखें, तो हमें वास्तविक स्थिति का अंदाजा लग सकता है।
जनवरी, 2005 से 30 जून, 2012 के दौरान चिकित्सकीय परीक्षण के लिए 475 दवाइयों का इस्तेमाल किया गया, जिनमें से महज 17 को बाजार में उतारने की अनुमति मिली। अदालत में यह तथ्य भी पेश किया गया कि इन परीक्षणों के लिए 57,303 लोगों ने नामांकन किया था, जिनमें से 39,000 के चिकित्सकीय परीक्षण पूरे हुए। दुखद है कि इनमें से 11,972 लोगों पर गंभीर प्रतिकूल परिणाम दिखे और 2,644 लोग मर गए।
अभी ज्यादा दिन नहीं हुए, जब आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले का पिडुगुराल्ला कस्बा चर्चित हुआ था। वहां एक्सिस नामक फार्मा कंपनी के एजेंट महिलाओं को पैसे देने का वायदा करके हैदराबाद के मियांपुर ले गए, जहां उन्हें तीन दिन के लिए अलग-अलग इंजेक्शन दिए गए और फिर घर जाने को कहा गया। बाद में इस कांड का पर्दाफाश हुआ कि कितने बड़े पैमाने पर निरक्षर, गरीब महिलाओं को फंसा कर उन पर तरह-तरह की दवाओं के परीक्षण का काम चल रहा है।
टुकड़े-टुकड़े में आनेवाली इस तरह की खबरें बताती है कि न एक्सिस कोई पहली दवा कंपनी है, जो इस अनैतिक काम में लिप्त है, और न ही पिडुगुराल्ला की औरतें 'गिनीपिग' (परीक्षण चूहे) बनने की पहली मिसाल हैं। दुनिया भर में दवा कंपनियों का रिकॉर्ड यही बताता है कि वे इस अनैतिक काम में लिप्त रहती हैं। विकसित देशों की तुलना में भारत जैसे तमाम विकासशील देशों में दवा कंपनियों के दो-तिहाई परीक्षण संपन्न होते हैं।
अपने देश की बात करें, तो अनुमान यह लगाया जाता है कि दुनिया का हर चौथा परीक्षण यहां होता है, और आज चिकित्सकीय परीक्षण का बाजार यहां डेढ़ अरब डॉलर को लांघ चुका है। इसके साथ ही यह भी कटु सच्चाई है कि समूचे दवा परीक्षण उद्योग का लगभग आधा हिस्सा भारत के नियंत्रण में है।
ऐसे में कल्पना ही की जा सकती है कि चिकित्सकीय परीक्षण के उद्योग के विस्तार के साथ कितने मासूम लोग इसी तरह कालकवलित हो रहे होंगे। ढाई साल पहले संसद में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री दिनेशचन्द्र द्विवेदी ने इस विस्फोटक तथ्य को उजागर किया था कि यहां ड्रग ट्रॉयल के दौरान विगत तीन वर्षों में 1,519 लोगों की मृत्यु हुई है। दूसरे शब्दों में कहें, तो यहां हर साल पांच सौ से अधिक लोग दवा परीक्षण के दौरान ही मर जाते हैं।
इस संदर्भ में यह सवाल स्पष्ट तौर पर पूछे जाने की जरूरत है कि मुल्क के निवासियों के शरीरों को नई-नई दवाओं के परीक्षणों का अखाड़ा बनाने की इन कोशिशों को लेकर संसद अब तक मौन क्यों है? अधिक विचलित करने वाली बात यह है कि अनाधिकृत चिकित्सकीय परीक्षणों के खिलाफ मुहिम चलाना तो दूर रहा, केंद्र सरकार ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों एवं निजी इकाइयों की मांग पर पहले से चले आ रहे ‘ड्रग्स ऐंड कॉस्मेटिक्स रूल्स 2005’ के प्रावधानों को हल्का कर दिया है, जिसकी वजह से अपने देश की सरजमीं पर विदेशी दवाओं के परीक्षण का काम अधिक आसान हो गया है।