नन्हे प्रद्युम्न ठाकुर की दर्दनाक हत्या के बाद बच्चों की सुरक्षा, निजी स्कूलों की लापरवाही, शिक्षा का केवल व्यवसाय बन जाने को लेकर देश भर में कई महत्वपूर्ण सवाल पूछे गए हैं। यह अच्छी बात है।
दिल्ली और मुंबई में रायन इंटरनेशल स्कूलों के सामने विरोध प्रदर्शन हुए हैं। यह भी अच्छी बात है। लेकिन अब समय आ गया है सबसे महत्वपूर्ण सवाल पूछे जाने का, और वह यह है कि निजी स्कूलों में अपने बच्चों को भेजने के लिए क्यों मजबूर होते हैं गरीब से गरीब माता-पिता? यह सवाल महत्वपूर्ण इसलिए है, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘न्यू इंडिया’ की सबसे बड़ी विफलता अभी तक शिक्षा को लेकर रही है।
हमारे राज्यों में आज भाजपा की जितनी सरकारें हैं, इतनी शायद पहले कभी नहीं रही होंगी। यह कहना गलत न होगा कि पूरब और दक्षिण के कुछ बड़े राज्यों को छोड़कर सारे देश में आज सत्ता भाजपा के मुख्यमंत्रियों के हाथों में है। सो, शिक्षा नीति में वे सुधार क्यों नहीं लाए जा रहे, जिनके बिना न्यू इंडिया नहीं बनेगा, बल्कि वही पुराना इंडिया जीवित रहेगा। देश भर में सरकारी स्कूलों का इतना बुरा हाल है कि हर गांव में आज निजी स्कूल दिखते हैं, जो छोटे-छोटे कमरों में बने हुए हैं। सरकारी स्कूल भी दिखते हैं इनके आसपास, जहां अध्यापकों का वेतन निजी स्कूलों के अध्यापकों से दोगुना-तिगुना है, लेकिन अक्सर ये अध्यापक शहरों में रहते हैं और अपनी मर्जी से स्कूल आते हैं।
सोनिया-मनमोहन के दौर में नई शिक्षा नीति बनी थी, जिसके तहत शिक्षा को कानूनी अधिकार दिया गया था और निजी स्कूलों में उन बच्चों के लिए कोटा तय हुआ था, जो गरीब घरों से आते हैं। ऐसा करके सरकार ने शिक्षा दिलवाने की जिम्मेदारी अपने कंधों से उतार दी और निजी स्कूलों पर अपना बोझ डाल दिया। परिणाम यह हुआ है कि शिक्षा विभाग के अधिकारी अब निजी स्कूलों में ज्यादा दखल देते हैं और सरकारी स्कूलों में कोई सुधार नहीं हुआ है। भाजपा के मुख्यमंत्री इस रद्दी नीति को कूड़ेदान में क्यों नहीं फेंकते? उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों में आज भाजपा की सरकारें हैं, सो इन राज्यों के सरकारी स्कूलों में सुधार क्यों नहीं दिखते हैं?
ऐसा क्यों है कि आज भी अधिकतर सरकारी स्कूलों में शौचालयों जैसी बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं? ऐसा क्यों है कि अध्यापकों की मनमानी पर होती है पढ़ाई? ऐसा क्यों है कि कक्षाओं का इतना बुरा हाल है कि सरकारी स्कूलों में बच्चों के लिए मेज-कुर्सियों का भी इतना अभाव है कि बच्चों को जमीन पर बिठाकर पढ़ाया जाता है? उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों के दौरों पर मैंने ऐसे स्कूल देखे हैं, जिनकी इमारतें खंडहर बन चुकी हैं। प्रधानमंत्री अपने मुख्यमंत्रियों को आदेश क्यों नहीं दे पाए हैं अभी तक कि उनके ‘न्यू इंडिया’ में इस तरह के स्कूल नहीं होंगे? क्या प्रधानमंत्री जानते नहीं कि सरकारी स्कूलों में सुधार लाए बिना उनका ‘न्यू इंडिया’ कभी नहीं बनेगा? संघ परिवार से जुड़ी संस्थाएं पिछले तीन वर्षों में शिक्षा में सुधार लाने का प्रयास जोरों से करती रही हैं, लेकिन उनके सारे प्रयास स्कूल के बच्चों के इतिहास की किताबों में परिवर्तन लाने को लेकर रहे है, ताकि प्राचीन भारत की तस्वीर बेहतर कर दी जाए और मुगल दौर की तस्वीर इतनी बदतर कि इतिहास ही बदल जाए बच्चों के लिए। यह भी स्वीकार होता, अगर शिक्षा प्रणाली में सुधार किए गए होते।