अपनी सहेली से बहुत दिनों बाद लंच पर मुलाकात हुई थी। वर्षों से वह इंग्लैंड में रहती है। वह पढ़ी-लिखी है और एक जमाने में कॉलेज में पढ़ा भी चुकी है। मगर वहां काम नहीं करती। उसका कहना है कि जितने पैसे बच्चे पालने के लिए आया को दो या डे केयर में खर्च करो, घर में रहना उससे बेहतर है। मेरी सहेली ने जब खाना ऑर्डर किया, तो मैं दंग रह गई। भोजन पूरी तरह मांसाहारी था। जबकि हम जब साथ पढ़ते थे, तो उसे प्याज-लहसुन भी बर्दाश्त नहीं था। मैंने अपना आश्चर्य छिपाते हुए कहा, अच्छा है, तुम वहां जाकर बदल गई हो। यूरोप में लोग शाकाहार को ज्यादा जानते भी नहीं हैं। खान-पान में खासी दिक्कत पेश आती है।
उसने कहा, यह बात तो है ही, इसकी एक और वजह है। उसके मायके का परिवार आर्य समाजी था। इसलिए घर में मांसाहारी भोजन पर पूरी तरह से प्रतिबंध था। मगर शादी के बाद पता चला कि पति मांसाहारी हैं। शुरुआत के दिनों में घर के लोग बना देते थे। मगर पति ने उससे साफ कह दिया कि तुम्हारे कारण मैं अपना खान-पान नहीं बदलूंगा। तुम्हें ही बदलना होगा। समझ में नहीं आता था कि क्या करूं। शुरू में नाक बंद करके मांसाहारी खाना पकाने की कोशिश करती थी। फिर धीरे-धीरे जो बदबू लगती थी, वह खुशबू लगने लगी। एक दिन पति के आग्रह पर थोड़ा खाया। फिर धीरे-धीरे खाने लगी। इसलिए भी खाना पड़ा कि अपने लिए कब तक अलग से पकाती। अब शाकाहारी खाना अच्छा नहीं लगता। फिर वह महंगा भी है।
अब एक दूसरी लड़की का उदाहरण सुनिए। यह आज की लड़की है। उम्र भी कोई खास नहीं। एक जानी-मानी कंपनी में इंजीनियर है। दो साल पहले उसकी शादी हुई। यह लड़की मांसाहारी है, पर जिस परिवार में उसकी शादी हुई, वहां रसोई में अंडे का प्रवेश भी मना था। ससुराल वाले किसी गुरु के शिष्य थे। हालांकि उसे इतनी छूट दी गई कि वह बाहर जाकर मांसाहार कर सकती है। लड़की का कहना था कि शुरू में उसे शाकाहारी खाना अच्छा नहीं लगता था। मगर समय गुजरने के साथ आदत पड़ गई।
बहुत-सी शादियों में यह देखा गया है कि लड़की से अपनी पसंद की कोई चीज जीवन भर के लिए छोड़ने का आग्रह किया जाता है, जैसे शादी या ससुराल कोई ऐसी जेल हो, जहां मनपसंद खाने पर रोक हो। शादी के बाद लड़कियों को ही खान-पान बदलने के लिए कहा जाता है। खाने-पीने की रुचियां उन पर लादी जाती हैं। पहले तो शादी के बाद नाम बदलने की भी परंपरा थी। कहा जाता था कि शादी के बाद औरत का दूसरा जन्म होता है। इसलिए मायके का नाम और पुरानी आदतों को वहीं पर छोड़कर आना चाहिए और भूल जाना चाहिए। सारा त्याग सिर्फ औरतों के ही हिस्से आता है। इसमें औरतों की आत्मनिर्भरता से भी कोई खास फर्क नहीं पड़ता। यह एक प्रकार से स्वाद की तानाशाही है। हर हाल में पति को जो पसंद है, वह पत्नी की भी पसंद होना चाहिए। जबकि सबके स्वाद और गंध के अच्छे लगने के मानक अलग-अलग हो सकते हैं। जैसा कि पहली स्त्री के मामले में हुआ, जहां पति ने पत्नी की रुचि की परवाह न करते हुए साफ तौर पर कह दिया कि वह खान-पान की अपनी आदत नहीं बदलेगा। इसलिए शादी को हर हाल में बचाने के लिए पत्नी को ही बदलना पड़ा। दूसरे मामले में लड़की के खान-पान पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया था। मगर बेकार में बात क्यों बढ़ाई जाए, यह सोचकर उसने खुद को बदला। वह वही खाने लगी, जो दूसरों को अच्छा लगता था। यदि आदमी या पति के बारे में सोचें, तो बहुत कम मामले ऐसे मिलेंगे, जहां पत्नी की खान-पान की आदतों के अनुरूप किसी पुरुष ने बदलने की कोशिश की।