इस देश में महात्मा गांधी के मूल्यों को दफन करके अपनी भूमिकाओं का भविष्य तलाशना असंभव है। गांधीवाद के दर्पण में अपना अक्स देखना ही अपनी भावी भूमिकाओं को निर्धारित करने का नया यथार्थपरक रास्ता होगा। दो वर्ष पूर्व अफ्रीकी देश इथियोपिया में शांति मंत्रालय का गठन किया गया, जो शांति स्थापना और राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ विदेशी संबंधों, पर्यावरण से जुडे़ मुद्दों और पलायन के लिए जवाबदेह है। मुफीरियत कामिल को इस मंत्रालय की कमान दी गई, जो महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानती हैं। दो साल पहले ही स्वीडन ने 'भविष्य के मामलों का मंत्रालय’ गठित किया था। क्रिस्टीना पीयर्सन ने इस मंत्रालय की जिम्मेदारी लेते हुए एक महत्वपूर्ण बात कही थी कि वर्तमान राजनीतिज्ञ केवल उन मसलों पर निर्णय लेते हैं, जो पहले ही घट चुके हैं, जबकि आज उन तमाम मसलों पर सार्थक बहस और निर्णय की जरूरत है, जिसका संबंध हम सबके बेहतर भविष्य से है। क्रिस्टीना पीयर्सन भी महात्मा गांधी से प्रेरित हैं। मुफीरियत कामिल और क्रिस्टीना पीयर्सन को हमें अपना नेता मान लेने में गर्व होना चाहिए, क्योंकि वे उन दायित्वों का वहन कर रही हैं, जिनका अधिक जवाबदेह तो हमारा अपना देश था।
गांधी के देश में शांति स्थापना का कार्य कौन कर रहा है? और क्या शांति स्थापना समाज और राज्य का संयुक्त दायित्व नहीं होना चाहिए? हमारे यहां कानून-व्यवस्था की स्थिति का नियंत्रण में होना ही शांति स्थापना का प्रमाण माना जाता है। कानून-व्यवस्था की स्थिति का सामान्य होना किसे कहा जाएगा? क्या हम छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले को शांतिपूर्ण कहना चाहेंगे? क्या हम मध्य प्रदेश के बालाघाट को अशांत जिला कहना चाहेंगे? बिहार के गया जिले को हम किस वर्गीकरण में रखना चाहते हैं? ओडिशा के कालाहांडी जिले के लिए क्या हम कोई नया वर्गीकरण गढ़ना चाहते हैं? राज्य द्वारा इनमें से हरेक जगह पर अब तक शांति स्थापना के आधे-अधूरे कार्य ही हुए हैं। भारत में कानून-व्यवस्था के सामान्य अथवा असामान्य होने का पैमाना करीब एक सदी पुराना है। ऐसे में शांति स्थापना के नए-पुराने पैमानों में आ चुकी जड़ता को खत्म करने का वक्त आ चुका है। भारत में भी हमें शांति मंत्रालय और भविष्य के मामलों के मंत्रालय की अपरिहार्यता स्वीकार करनी चाहिए। नेपाल, दक्षिण अफ्रीका, कोलंबिया, सूडान जैसे देशों में शांति स्थापना का कार्य राज्य व्यवस्था का अहम अंग है और उसकी प्रेरणा के केंद्र में महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग (जूनियर) और नेल्सन मंडेला जैसे नेता हैं।
भारत में शांति मंत्रालय की जरूरत अनेक कारणों से है। सरकारी रिपोर्टों में यह माना गया है कि लगभग एक तिहाई भौगोलिक क्षेत्र में संगठित हिंसा एक बड़ी चुनौती है। ये हिंसा सिर्फ कानून-व्यवस्था का मसला नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक अलगावों का नतीजा हैं। इस देश में हजारों ऐसे संगठन हैं, जो शांति स्थापना के प्रयासों में यकीन करते हैं। शांति मंत्रालय ऐसे तमाम संगठनों की प्रतिबद्धताओं को पूरे देश में शांति और पुनर्निर्माण के कार्यों से जोड़ सकता है। इस मंत्रालय का सर्वाधिक महत्वपूर्ण दायित्व शांति की शिक्षा को बुनियादी शिक्षा का अनिवार्य तत्व बनाने का हो सकता है। मौजूदा शिक्षा तंत्र में शांति की शिक्षा का यह बुनियादी कार्यक्रम हमें नई सोच, ऊर्जा और उत्साह के साथ आगे बढ़ने का अवसर देगा। (सप्रेस)
-लेखक एकता परिषद के राष्ट्रीय समन्वयक है।