वर्ष 2014-19 के दौरान देश की आर्थिक विकास दर औसतन 7.4 फीसदी की दर से बढ़ी, लेकिन तीन प्रमुख चुनौतियों के कारण इसकी अर्थव्यवस्था फिलहाल विकास की बाधाओं से जूझ रही है। पहली चुनौती है, पर्याप्त नकदी के अभाव में उपभोक्ता मांग में कमी, दूसरी है, पर्याप्त निवेश की कमी और तीसरी है, कम आर्थिक विकास के कारण सुस्ती की मनोदशा। नरेंद्र मोदी के दूसरे प्रधानमंत्री काल में एक सकारात्मक संकेत देने के लिहाज से यह बजट महत्वपूर्ण था और वित्त मंत्री ने अर्थव्यवस्था से जुड़े हर मुद्दे से निपटने का प्रयास किया है।
वैकल्पिक होने के बावजूद व्यक्तिगत आयकरदाताओं के लिए टैक्स दर में कटौती से बेशक सरकार को प्रत्यक्ष कर में 40,000 करोड़ रपये का नुकसान होगा, लेकिन इससे लोगों के हाथ में पैसा बचेगा। इसके साथ-साथ डिविडेंड डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स हटाने (यह टैक्स अब कंपनियों के बजाय करदाताओं को देना होगा) से सरकार को होने वाले 20,000 रुपये के नुकसान को जोड़ लें, तो इससे आम लोगों को कुल मिलाकर 60,000 करोड़ रुपये की राहत मिलेगी। वित्त वर्ष 2020-21 के लिए राजकोषीय घाटे को 0.5 फीसदी बढ़ाकर निवेश बढ़ाने का एक शानदार कदम उठाया गया है। आर्थिक स्थिति की गंभीरता को देखते हुए राजकोषीय घाटे में ढील देना एक विवेकपूर्ण कदम है।
इस बजट में निवेश बढ़ाने की नीतियों पर बहुत ध्यान दिया गया है। बुनियादी ढांचे में सरकारी निवेश निधि (सॉवरिन वेल्थ फंड) के लिए सौ फीसदी छूट देना एक जरूरी कदम है, क्योंकि भारत में प्रवेश के लिए लंबी अवधि के ये बड़े धन स्रोत कर अधिकारियों के अनुचित और जटिल कर बाधाओं के कारण बाधित थे। जीवन बीमा निगम को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने का काम लंबे समय से लंबित था और ऐसा करना एक सकारात्मक कदम है। इससे सार्वजनिक रूप से संचालित एक बड़े उपक्रम के प्रबंधन में दक्षता की आवश्यकता होगी और सरकार के लिए नकदी की उपलब्धता बढ़ेगी। इसके अलावा कॉरपोरेट बॉन्ड में विदेशी संस्थागत निवेश की सीमा बढ़ाकर 15 फीसदी किए जाने से बॉन्ड बाजार में मजबूती आएगी।
कृषि और सामाजिक क्षेत्र के लिए आवंटन बढ़ाया जाना भारत की आवश्यकता के अनुरूप है और यह इन क्षेत्रों के विकास के लिए सरकार की निरंतर प्रतिबद्धता का सकारात्मक संकेत है। स्टार्टअप से परे सरकार को सांख्यिकी और आयुष्मान भारत योजना के लिए राष्ट्रीय नीति में कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे तकनीकी अनुप्रयोगों के बारे में बातचीत शुरू करते हुए देखना अच्छा है।
जहां तक प्रौद्योगिकी और स्टार्टअप की बात है, तो यह बजट निराशाजनक रहा है। भले ही प्रारंभिक चरण के लिए फंड, निवेश मंजूरी और सलाहकार सेल, फाइबर कनेक्टिविटी परियोजना भारतनेट, क्वांटम टेक्नोलॉजी के लिए 8,000 करोड़ रुपये का परिव्यय, कर में छूट व विस्तार देने जैसे उपाय इस क्षेत्र के प्रति सरकार की दिलचस्पी को दर्शाते हैं, लेकिन अधिक दबाव बनाने वाली चिंताओं का समग्र निराकरण बजट में सही तरीके से नहीं किया गया है। स्टार्टअप क्षेत्र को सरकार से तीन प्रमुख उम्मीदें थीं। पहला, उच्च विकास वाली कंपनियों के निर्माताओं को धन कमाने के लिए इंप्लायी स्टॉक ऑनरशिप प्लान (ईएसओपी) जैसे मुद्दे का समाधान। ईएसओपी एक कर्मचारी लाभ योजना है, जो कर्मचारियों को संगठन में स्वामित्व प्रदान करती है। इसे वित्त मंत्री के संज्ञान में लाया गया है, लेकिन इस पर जल्दबाजी में ध्यान दिया गया है। ईएसओपी पर अब भी दो बार कर लगता है। पहली बार विकल्प का उपयोग करने पर और दूसरी बार बिक्री के समय। इसके अलावा यह केवल योग्य स्टार्टअप के लिए ही प्रासंगिक है (एक अप्रैल, 2016 के बाद बनी और इंटरनेशनल मिशन बोर्ड-आईएमबी से मान्य), जो प्रस्तावित संकल्प की शक्ति को सीमित करता है।
स्टार्टअप क्षेत्र की दूसरी चिंता पूंजीगत लाभ पर कर को लेकर थी। विदेशी निवेशकों को पूंजीगत लाभ पर और सर्वजनिक बाजार से बाहर निकलने पर 10 फीसदी कर लगता है, जबकि उच्च जोखिम वाले प्रारंभिक चरण के भारतीय निवेशकों पर, जो बड़े पैमाने पर निजी बाजार में निवेश से बाहर निकलते हैं, 28 फीसदी की गैर-प्रतिस्पर्धी दर से कर लगता है। भारत के नवाचार में निवेश करने वाले निवेशको को हतोत्साहित करने से वे डिजिटल कॉलोनी बनने वाले देश जाने को प्रेरित होंगे, जहां इसकी सबसे अच्छी युवा कंपनी काफी हद तक विदेशी पूंजी के स्वामित्व में है।
स्टार्टअप क्षेत्र की तीसरी मांग टीडीएस में कटौती की थी। इनमें से अधिकांश कंपनियों को पहले कुछ वर्षों में घाटा उठाना पड़ा, जिनमें से बहुत जरूरी पूंजी टीडीएस के माध्यम से सरकार के पास अवरुद्ध हो गई। चूंकि उद्यमशीलता और स्टार्टअप एक उच्च-विकास और उच्च प्राथमिकता वाला क्षेत्र था, इसलिए वित्त मंत्री को स्टार्टअप समुदाय की जरूरतों पर बारीकी से ध्यान देना चाहिए था। लेकिन इनमें से कोई भी मांग पूरी नहीं की गई, जो बेहद निराशाजनक है।
भारत की स्टार्टअप राजधानी बंगलूरू ट्रैफिक की भीड़ में घुट रही है और यह भारत के नवाचार में इसके योगदान और इसके विकास की गति को बाधित कर रही है। वर्ष 2018 में जिस उपनगरीय रेल परियोजना का वादा किया गया था, आखिरकार उसके लिए बजट आवंटित किया गया है और उम्मीद है कि आगे की देरी इस शहर को अपनी प्रचंड क्षमता तक पहुंचने से नहीं रोक पाएगी।
कुल मिलाकर यह बजट देश की बाध्यकारी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए एक अच्छा बजट है। हालांकि यह बजट और अच्छा हो सकता था। बजट से पहले कॉरपोरेट टैक्स में कटौती के साथ संभावित विकास और अधिक सुव्यवस्थित टैक्स ढांचे से आने वाले वर्षों में निवेश में तेजी आ सकती है और भारत अनुमानित 10 फीसदी विकास दर को हासिल कर सकता है।
-लेखक एरियन कैपिटल पार्टनर्स के चेयरमैन हैं।