हमारे देश में पाकिस्तान से आने वाले यात्रीगण और मेहमान प्रायः अजमेर शरीफ जरूर जाते हैं। उनकी सुविधा के लिए दिल्ली ट्रांसपोर्ट अंडरटेकिंग दिल्ली-लाहौर बस को अजमेर से होकर ले जाती रही है, ताकि पड़ोसी देश से आने वाले श्रद्धालु बिना अतिरिक्त प्रयास के वहां चादर चढ़ा सकें। इस प्रसंग में, कभी यह विचार क्यों नहीं होता कि हमारे देश के असंख्य श्रद्धालु भी शारदा जी मंदिर जाना चाहते हैं, जो विभाजन के बाद से पाकिस्तानी अधिकार क्षेत्र में है?
वस्तुतः कश्मीर की सबसे पुरानी पहचान देवी सरस्वती रही हैं। चारो-धाम समान पूज्य शारदाजी का यह ऐतिहासिक मंदिर श्रीनगर से लगभर सत्तर मील उत्तर-पश्चिम में स्थित है। स्वतंत्र भारत के विचित्र धर्मनिरपेक्षता का कमाल है कि आज अधिकांश हिंदू इसका नाम तक नहीं जानते!
दरअसल भारतवर्ष में देवी सरस्वती का यह सबसे प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर था। वर्ष 1148-50 में रचित महाकवि कल्हण की राजतरंगिणी में इसकी भौगोलिक अवस्थिति का उल्लेख है। कल्हण के अनुसार, भेदगिरि के पहाड़ पर एक सुंदर झील है, जहां हंस क्रीड़ा करते हैं और देवी शारदा निवास करती हैं। इसके निकट मधुमती नदी सरस्वती और कृष्णगंगा नदियों से मिलती है।
शारदाजी मंदिर से जुड़े पंडित एवं विद्वान श्रीनगर से उत्तर-पश्चिम बोलर घाटी के पार गोशपुरी ग्राम में रहते हैं। इससे आगे भगवान गणपति की आकृति की एक पहाड़ी के साथ हयग्रीव नामक ग्राम है। मातंग ऋषि के पुत्र ऋषि शांडिल्य की तपस्थली उसी मंदिर के निकट स्थित शारदावन में थी। मधुमति नदी के निकट पहाड़ी पर एक शिवमंदिर है। उसी के समीप अमरकुंड झील है। इसी अमरकुंड के साथ शारदाजी का मंदिर है।
किंवदंती के अनुसार, इसी स्थान पर मां शारदा ने ऋषि शांडिल्य को दर्शन दिए थे। तभी से कश्मीर न केवल संस्कृत भाषा और साहित्य का, बल्कि चिकित्सा, खगोलशास्त्र, ज्योतिष, दर्शन, विधि, न्यायशास्त्र, कला और भवनशिल्प विधाओं का भी प्रसिद्ध केंद्र बना। प्रसिद्ध फारसी इतिहासकार अलबरूनी भी 1030 में कश्मीर गए थे।
उनके विवरण के अनुसार, बोलर पहाड़ी (यह सिंधु नदी की ऊपरी धारा पर गिलगित और लद्दाख के बीच स्थित है) से दो या तीन दिन की यात्रा करने पर भीतरी कश्मीर में इस मंदिर तक पहुंचा जा सकता था। तब वहां मां शारदा की लकड़ी की मूर्ति स्थापित थी। प्रसिद्धि के आधार पर अलबरूनी ने शारदाजी की तुलना मुल्तान के सूर्य मंदिर, थानेश्वर के विष्णु चक्रस्वामिन और सोमनाथ के शिव मंदिर से की थी।
कालांतर में कश्मीर में राजनीतिक स्थिति खराब होने से भारत के दूरवर्ती हिस्सों से शारदापीठ का संपर्क कम होने लगा। सच यह है कि शारदाजी कश्मीर में उतनी ही पवित्र तीर्थस्थली रही है, जितना अमरनाथजी। कश्मीर का पहला नाम ही शारदापीठ था। कश्मीरी भाषा की लिपि आज भी शारदा लिपि कहलाती है। कश्मीर और शारदा जी का संबंध काशी और बाबा विश्वनाथ के संबंध से भी गहरा है। आज भी दक्षिण भारत में लोग सरस्वती वंदना में कहते हैं–नमस्ते शारदे देवी कश्मीरपुरवासिनी/ त्वमाहम प्रार्थयेर नित्यम् विद्यादानम् सा देही मे।
आज जीर्ण-शीर्ण हो जाने के बाद भी मंदिर के अवशेष देखकर उसकी भव्यता का अनुभव हो सकता है। कश्मीरी इतिहासकार पी एन के बमजई के अनुसार, मंदिर का मुख्य चबूतरा वर्गाकार 22 फुट का है। पश्चिम से प्रवेश-द्वार है। शेष तीन ओर लगभग बीस फुट ऊंचे, खुले, तोरण-द्वार हैं। मुख्य चबूतरे तक पहुंचने के लिए 63 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं। सीढ़ियों के साथ चढ़ते छोटे खंभों की जुड़ी शृंखला थी, जो खंडहर हो चुकी है।
मंदिर की बाहरी दीवारों पर आठ फुट ऊंची उठती हुई पिरामिड के आकार के तोरण जुड़े हैं। यह समूची संरचना मधुमती नदी के बहाव के दाहिने तरफ खड़ी है। उसके ऊपर चीड़ वृक्षों की सघन शृंखला चढ़ती जाती है, जो आगे कश्मीर घाटी में उतरती है।
बहरहाल आज वसंत पंचमी के पावन अवसर पर यह प्रश्न सहज उठता है कि जब पाकिस्तानी बंधुओं को अजमेर शरीफ जाने के लिए विशेष सुविधाएं दी जाती हैं, तब भारतीय हिंदुओं को शारदाजी की यात्रा करने की सामान्य अनुमति भी क्यों नहीं है? क्या पीपुल-टू-पीपुल मैत्री की बातें करने वाले भारत-पाक बुद्धिजीवी इसका जवाब देंगे?